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Showing posts from January, 2025

बोर्ड परीक्षा मे बैठने जा रहे छात्रों के लिए दिशा निर्देश

फरवरी माह से लगभग सभी राज्य की बोर्ड परीक्षाएं शुरू होने जा रही है। इस दौरान परीक्षा केंद्र मे जाने से पूर्व छात्रों, खास तौर पर वह छात्र जो कि पहली बार बोर्ड की परीक्षा मे बैठने जा रहे है और उनके अभिभावक के मन मे कई तरह के संदेह रहते है। उनके मन मे डर रहता है कि परीक्षा केंद्र मे जाने से पूर्व या प्रवेश करते समय कौन से डोक्यूमेंट ले जाने जरूरी है। छात्रों के मन मे बैठे डर और संदेह को दूर करने के लिए बोर्ड द्वारा कई तरह के दिशा निर्देश जारी किए गए है। आज हम इस लेख के माध्यम से बताएँगे कि छात्रों को परीक्षा केंद्र मे जाने से पूर्व किस तरह कि सावधानी बरतनी चाहिए और प्रवेश करते समय कौन कौन से डोक्यूमेंट अपने साथ ले जाने आवश्यक है।  बोर्ड द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड  :- रेगुलर स्टूडेंट्स के लिए - स्कूल यूनिफ़ोर्म  प्राइवेट स्टूडेंट्स के लिए - लाइट कलर के हल्के कपड़े   बोर्ड परीक्षा में जाने से पूर्व, परीक्षा केंद्र मे प्रवेश करते समय छात्रों को निम्न चीजों को लाने की होगी अनुमति :-  प्रवेश पत्र और स्कूल पहचान पत्र (रेग्यूलर छात्रों के लिए) एडमिट कार्ड और वैलिड आईड...

ये दर्द है की सब कुछ भूला देता है

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1 ये  दर्द  है  की  सब  कुछ  भूला  देता  है  जख्मों  को  भी  सीना  सीखा  देता  है जो  सीख  ले  जीना  इन  पलों  को  जिंदगी की राह मे वो तबस्सुम  खिला देता है   2  तेरे संग मुझे सहारा मिल जाता है  जैसे सफीने को किनारा मिल जाता है तुझसे मिलते ही बंज़र जिंदगी  मे  मेरी  मानो जैसे  गुलिस्तां  खिल  जाता  है      

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा नीति

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स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा के गिरते हुए स्तर में सुधार लाने के लिए सत्ताधीश सरकार द्वारा समय समय पर कई प्रयास किये गए । शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करने के लिए कई सारी नीतियां लागू की गई । इन नीतियों को लागू करने का मुख्य उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना था। लेकिन आधुनिकता, वैश्वीकरण,पाश्चात्य सभ्यता के इस युग में भारतीय शिक्षा पद्धति,तथा संस्कृति का पतन होता गया । जिसका बुरा असर हमारे आज के समाज पर साफ तौर पर देखा जा सकता है। अपनी मातृभाषा को त्याग कर विदेशी भाषा को भी भारतीय संविधान में जोड़ दिया गया। मैकाले द्वारा बनाई गई वर्तमान शिक्षा प्रणाली ने भारतीय समाज की एकता को नष्ट करने तथा वर्णाश्रित कर्म के प्रति घृणा उत्पन्न करने का एक काम किया। मैकाले की शिक्षा पद्धति का मुख्य उद्देश्य भारत देश मे – संस्कृत, फारसी तथा लोक भाषाओं के वर्चस्व को तोड़कर अंग्रेजी का वर्चस्व कायम करना तथा इसके साथ ही सरकार चलाने के लिए देश के युवा अंग्रेजों को तैयार करना था । मैकाले की इस शिक्षा प्रणाली के जरिए वंशानुगत कर्म के प्रति घृणा पैदा करने और परस्पर विद्वेष फैलाने की भी कोशिश की ग...

अंधेरे की ओट मे ये जो दिया जलता है

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अंधेरे  की  ओट  मे,  ये  जो  दीया जलता  है दुनिया को रोशन करने की चाह मे खुद को वो छलता है नजाने  किस  भ्रम  मे  वो  रखता  है  खुद  को  जल  कर  खुद  कतरा  कतरा  पिघलता  है   

इंसानियत को परखने के लिए बदन का लिबास नहीं देखा जाता

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 घर पर आये मुसाफिर को खाली हाथ नहीं भेजा जाता सौदों  मे  हर  बार  स्वार्थ  नहीं  देखा  जाता ज़िंदगी की राह पर मुसाफिर मिल ही जाते है इंसानियत को परखने के लिए बदन का लिबास नहीं देखा जाता. https://draft.blogger.com/blog/post/edit/3204513329264443755/4287435210650540058

बच्चे का व्यवहार, माता-पिता के व्यवहार का प्रतिबिंब

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15 वर्षों के शिक्षण के दौरान, अक्सर मैंने यह अनुभव किया है कि, आजकल के अधिकतर अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों से शिकायत रहती है कि, उनका बच्चा उनकी बातें नहीं सुनता या फिर उन्हें इगनोर कर देता है। अपने से बड़ों के साथ उनका व्यवहार तथा बातचीत का तरीका सही नहीं है, वह दिनभर फोन चलाता रहता है या फिर खाना खाने मे आनाकानी करता है, आदि। इसके अतिरिक्त भी कई तरह के सोच रखने वाले  अभिभावकों से समय समय पर मिलना-जुलना  लगा रहता है और सभी कि राय या फिर शिकायत कहे आदि सुनने को मिलती रहती है। उनके पास बच्चों के व्यवहार से संबन्धित समस्याएँ तो अनगिनत रहती है लेकिन समाधान के नाम पर उनके पास होता है,एक तरह का डोमिनेटिंग बिहेवियर, उनका मानना है कि बच्चों को डांट या शारीरिक दंड इत्यादि से सुधारा जा सकता है। इसके अलावा समाधान के नाम पर अभिभावक अपने बच्चे कि तुलना उसके हम उम्र बच्चों से करने लगते है। वो ऐसा इसलिए करते है, क्योंकि शायद उन्हें लगता है कि इस तरह एक दूसरे से तुलना करके या फिर शारीरिक दंड आदि से  उनका बच्चा सुधार जाएगा या फिर मोटीवेट  होगा। लेकिन आज वर्तमान समय मे देखा गया है कि ...

बोर्ड परीक्षा के दौरान छात्रों के बेहतर प्रदर्शन तथा तनाव दूर करने मे अभिभावकों की भूमिका अहम

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देशभर के सभी राज्यों मे बोर्ड परीक्षा की शुरुआत होने वाली है। परीक्षा का यह समय छात्रों के साथ अभिभावक और शिक्षक के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। एक ओर जहां छात्रों के ऊपर उत्तीर्ण होने के साथ अच्छे मार्क्स लाने का दबाव होता है , वही दूसरी ओर शिक्षक और अभिभावक के ऊपर यह दबाव रहता है कि उनके छात्र और बच्चे अच्छा प्रदर्शन करें। लेकिन परीक्षा से पूर्व छात्रों के मन मे कई तरह के प्रश्न आते है , जिससे उनका नर्वस होना सवाभाविक है। इसके कारण उनका प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में अभिभावक और शिक्षक का दायित्व बनता है कि छात्रों की मानसिक स्थिति को समझकर उचित मार्गदर्शन और काउन्सलिंग  करें। जिससे उनके प्रदर्शन में किसी किसी तरह का नकारात्मक प्रभाव ना पड़े और वे सकारात्मक सोच के साथ अपनी परीक्षाएं देकर सफल हो। इसलिए बोर्ड परीक्षा के दौरान होने वाले  तनाव को कम करने और अच्छे प्रदर्शन के लिए हम छात्रों और अभिभावकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण टिप्स सांझा कर रहे है।      1.    टाइम मैनेजमेंट : -  परीक्षा समाप्त होने के बाद अक्सर कई बार छात्र यह कहते है कि...

उलझा हूँ,जिंदगी की हर एक गुत्थियाँ सुलझाने मे

उलझा हूँ,जिंदगी की हर एक गुत्थियाँ सुलझाने मे  जब  से  दस्तक   दी   है  दर्द  ने  मेरे  सिराने  मे  बड़ी   मशक्कत   से   पाला   था   मैंने   एक   भ्रम  ठोकरों ने बताया ,कोई नहीं होता अपना इस जमाने मे  दोस्ती इतनी अच्छी भी नहीं कि भूल बैठो खुद को  दोस्त ही वार करता है,पीछे से जख्म को सहलाने मे  बेस्वार्थ  प्यार  कि   डोर  से    जुड़ी   हुई है,   माँ  वरना सवार्थ कि डोर से जुड़ा है, हर रिश्ता जमाने मे माँ की गोद ने भूला दिया जहाँ के दर्द को  कोई  जादू  हो  जैसे  माँ  के  सिराने  मे   भूपेंद्र रावत 

सफलता.......प्रयासों का अंतिम परिणाम

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सफलता चूमती है,  उनके कदमों को  जिन्होने किए है, प्रयास  एक नहीं, दो नहीं  बल्कि, उस अंतिम पायदान तक  जहाँ असफलताओं ने  मान ली हार और  कांटो से भरे उस सेज़ में  सजा दिये पुष्प  कुछ प्रयास करने के पश्चात  जिन मुसाफिरों ने  मान ली हार और  उस परिणाम को ही  मान लिया, अंतिम परिणाम उन लोगों के लिए "अ" उपसर्ग ने  शब्द के साथ जुड़कर  सफलता का अर्थ  कर दिया असफलता  किस्मत के भरोसे  बैठकर उन लोगों ने  लगा दिये अपनी  किस्मत के ताले 

एक अज़नबी जो मिल के गया

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 एक अज़नबी जो  मिल के   गया मुरझाया फूल, फिर खिल सा गया दिल  लगाने की  कला मे माहिर  है, वो मिला तो, जैसे मिश्री जैसा घुल सा गया गुलाब  के खिले  हुए काँटों को उस  राह  मे  मसल  सा  गया गुजरा जिस राह से वो मुसाफिर  चश्म - ए - चराग़ जल सा गया पाकीज़ा पैगाम लेकर आया है,अज़नबी अपरिचित,चश्म-ओ-चिराग़  बन सा गया भूपेंद्र रावत

बुढ़ापा एक संघर्ष

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 कौन रखेगा ख्याल  बुजुर्ग होते उन लोगों का जिनकी संतान ने  अपनी मजबूरी गिना कर  छोड़ दिया साथ अपने बुजुर्ग माता पिता का और छोड़ दिया  उन्हें, उनके हालातों पर पाई - पाई जोड़ कर  जिन्होंने लगा दी थी अपनी उम्र भर की कमाई संतानों की परवरिश पर कर दिये थे, खाली  अपने सेविंग एकाउंट  बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की  कामना हेतू शायद वो अनभिज्ञ थे,  इस बात से कि बुजुर्ग होते ही दूसरी ओर कर रहा है  उनका इंतज़ार,"अंधेरा" जो उन्हें बना देगा मोहताज़ जीवन के इस कडवे सत्य ने उन्हें परिचित करवाया उन अन्छुए पहलुओं से जो उनकी कल्पना से थे परे.

दम तोड़ते रिश्तों की वजह

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रिश्ते अक्सर कच्चे धागे की डोर के समान होते है। अगर रिश्तों की नींव कमजोर हो तो वह रिश्ता अधिक दिनों तक टिक नहीं सकता। भारतीय समाज और संस्कृति की इन रिश्तों की कड़ी मे पति और पत्नी का रिश्ता सभी रिश्तों मे से एक पवित्र रिश्ता माना गया है और यह नाजुक कड़ी के समान होता है। लेकिन मानो आज के भारतीय समाज के रिश्तों को पाश्चत्य स्भ्यता की नज़र सी लग गयी हो। आधुनिक और सव्वालंबी, बनने की इस दौड़ मे आज रिश्ते पीछे छूटते जा रहे है और बच रहा है, एक टूटा परिवार लेकिन,जहाँ एक ओर विवाह से पूर्व कई तरह की जानकारी एकत्रित या छान-बिन की जाती है। उसके बावजूद रिश्ते कुछ ही दिनों या वर्षों मे टूट जाते है। लेकिन इतनी सावधानी बरतने के पश्चात भी आखिरकार, ऐसा क्यों हो रहा है?  रिश्तों को मजबूत बनाने वाली सबसे मजबूत कड़ी का नाम है  "विश्वास"  और इस विश्वास की कड़ी को कमजोर बनाता है संदेह करने की बीमारी या आदत। किसी रिश्ते के बीच अगर संदेह उत्पन्न हो जाये तो समय के साथ धीरे धीरे वो रिश्ता कमजोर होने लगता है। जिसकी वजह से रिश्ते एक दूसरे मे बोझ बन जाते है। और उन बोझ से लदे हुए रिश्तों को ज्यादा दूर तक ले...

जख्म पर मरहम का लेप लगाने वाले

नहीं मिलता यां कोई गम समेटने के लिए बैठे रहते है, सब दर्द ए गम बेचने के लिए जख्म पर मरहम का लेप लगाने वाले  अक़्सर होते है खरीददार यहाँ उन जख्मों को सींचने के लिए

अपने दर्द की आजमाइश न कर

अपने दर्द की आजमाइश न कर हालातों की लिए फरमाइश न कर लूट लेंगे कश्ती तेरे अपने ही अब अपने दर्द  की और नुमाइश न कर

तकनीकी युग मे स्वयं को यंत्रो से बचाने के उपाय

आधुनिक युग के यंत्रो ने हमे जिस तरह से अपने अधीन कर लिया है। ऐसी स्थिति मे इन यंत्रो से दूरी बनाए रख पाना अपने आप मे एक चुनौती है। जहां एक ओर यह यंत्र वरदान साबित हुए है वही दूसरी ओर अभिशाप बनकर भी उभरे है। उपकरणों के लंबे समय तक निरंतर प्रयोग करने से यह भी देखा गया है कि इनके प्रभाव हमारे सोचने कि शक्ति और शारीरिक गतिविधियों पर नाकारात्मक पड़े है। आधुनिक तकनीक हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करने के साथ मस्तिष्क के काम करने के तरीके को भी बदल रही है। दिन प्रतिदिन यंत्रो के जरूरत से अधिक प्रयोग ने हमारी अधिगम क्षमता और ध्यान कि शक्ति को भी क्षीण कर दिया है। इन तकनीक के अपने ऊपर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव को जानते हुए भी हम सब इससे अनभिज्ञ है। इन सबके फलस्वरूप हम सब अपनी इन आदतों से छुटकारा तो पाना चाहते है लेकिन अथक प्रयासो के बावजूद भी यंत्रो के अधिक प्रयोगों से छुटकारा पाना हमारे लिए मुश्किल होता जा रहा है। अक्सर, यह देखा गया है कि, जिस काम मे हमारी रूचि नहीं होती हम वो कार्य करना कदापि पसंद नहीं करते, जिसके कारण हम अपनी बुरी आदतों का त्याग नहीं कर पाने मे असक्षम होते हैं। और हमारी यह कमजोरी ...