स्कूल में परामर्श और मार्गदर्शन की जरूरत क्यों है?
स्कूल में परामर्श और मार्गदर्शन की जरूरत क्यों है? अक्सर यह मान लिया जाता है कि जैसे-जैसे बच्चा उम्र के साथ शारीरिक रूप से बढ़ता है, वैसे-वैसे उसका मानसिक विकास भी अपने-आप पूरा हो जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग होती है। बच्चा बाहर से भले ही बड़ा दिखने लगे, लेकिन उसके भीतर एक लगातार संघर्ष चल रहा होता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके मन में प्रश्न, डर, असमंजस और भावनाएँ भी गहराने लगती हैं। वह इस दुविधा में रहता है कि अपने मन की बात किससे कहे, कौन उसकी बात बिना डाँटे, बिना तुलना किए, बिना जज किए समझेगा। दुर्भाग्यवश, ऐसे समय में समाज और कई बार माता-पिता भी उस पर अपनी अपेक्षाएँ थोपने लगते हैं — अच्छे अंक लाओ, प्रतियोगिता में आगे रहो, हमारी उम्मीदों पर खरे उतरो। यहाँ सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हम यह समझ ही नहीं पाते कि शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास होना अनिवार्य नहीं है। कई बच्चे मानसिक रूप से उतने मजबूत नहीं होते, जितना उनसे अपेक्षित कर लिया जाता है। परिणामस्वरूप वे चुप हो जाते हैं, भीतर-ही-भीतर घुटने लगते हैं या फिर उनका व्यवहार चिड़चिड़ा और आक्रामक हो जाता है। ऐसी स्थ...