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Saturday, December 27, 2025

रेड पेन से ग्रीन पेन तक: मूल्यांकन की बदलती सोच पर एक विमर्श

रेड पेन से ग्रीन पेन तक: मूल्यांकन की बदलती सोच पर एक विमर्श

भूमिका: एक परिचित दृश्य और एक अनकहा प्रभाव

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में वर्षों तक एक दृश्य बेहद सामान्य रहा है—छात्र की उत्तरपुस्तिका, उस पर लाल स्याही के मोटे निशान, जगह-जगह कटे हुए उत्तर और हाशिये पर लिखी गई टिप्पणियाँ। यह केवल कॉपी जाँचने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि शिक्षा की एक गहरी जमी हुई मानसिकता थी।

रेड पेन यहाँ सिर्फ एक रंग नहीं था, बल्कि सत्ता, अनुशासन और निर्णय का प्रतीक था।

आज जब सीबीएसई रेड पेन के प्रयोग से दूरी बनाने की बात करता है, तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल उठते हैं-

क्या केवल पेन का रंग बदल देने से कुछ बदल जाएगा?

जब मूल्यांकन की प्रक्रिया वही है, तो रेड पेन पर आपत्ति क्यों?

इन सवालों के उत्तर रंग में नहीं, बल्कि सोच के बदलाव में छिपे हैं।

पहले की शिक्षा व्यवस्था: डर आधारित अनुशासन

कुछ दशक पहले तक शिक्षा व्यवस्था का मूल ढाँचा बिल्कुल स्पष्ट था। शिक्षक को “अंतिम सत्य” माना जाता था और छात्र का काम था उस सत्य को बिना प्रश्न स्वीकार करना। गलती करना कमजोरी समझी जाती थी और मूल्यांकन का उद्देश्य सीख को सुधारना नहीं, बल्कि छँटनी और नियंत्रण करना था।

रेड पेन इसी सोच का औजार था।

लाल स्याही के निशान यह संदेश देते थे—

“यह गलत है, और गलत होना स्वीकार्य नहीं है।”

यह मान लिया गया था कि डर से अनुशासन आएगा और अनुशासन से सफलता। लेकिन इस प्रक्रिया में यह नहीं देखा गया कि डर के साथ-साथ बच्चे का आत्मविश्वास, जिज्ञासा और सीखने का आनंद भी खत्म हो रहा है।

वर्तमान शिक्षा दृष्टिकोण: सीख केंद्र में, छात्र केंद्र में

आज शिक्षा की दुनिया में दृष्टिकोण बदल रहा है। शिक्षक अब केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक (Facilitator) माना जा रहा है। गलती को कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा समझा जाने लगा है।

मूल्यांकन का उद्देश्य अब यह तय करना नहीं है कि कौन “अच्छा” है और कौन “कमज़ोर”, बल्कि यह देखना है कि छात्र कहाँ खड़ा है और उसे आगे कैसे बढ़ाया जा सकता है।

इसी संदर्भ में रंग और भाषा भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्योंकि वे सीधे छात्र के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं।

शोध यह स्पष्ट करता है कि

डर से सीख सीमित होती है,

जबकि सुरक्षा और प्रोत्साहन से सीख गहरी और टिकाऊ बनती है।

क्या सच में पेन का रंग फर्क डालता है?

अक्सर यह तर्क दिया जाता है—

“चेकिंग तो चेकिंग है। रेड हो या ग्रीन, गलती तो गलती ही रहेगी।”

यह तर्क तकनीकी रूप से सही, लेकिन मानसिक रूप से अधूरा है।

हाँ, गलती वही रहती है।

हाँ, अंक वही रहते हैं।

लेकिन जो बदलता है, वह है छात्र की अनुभूति।

लाल रंग अवचेतन रूप से खतरे, अस्वीकृति और असफलता का संकेत देता है। बच्चा जब अपनी कॉपी में बार-बार लाल निशान देखता है, तो उसे लगता है कि उसकी पहचान ही उसकी गलतियों से जुड़ गई है।

इसके विपरीत, हरा या नीला रंग संवाद, सुधार और मार्गदर्शन का भाव देता है। वही गलती जब सौम्य रंग और सकारात्मक भाषा में बताई जाती है, तो वह अपमान नहीं, सीख बन जाती है।

यह फर्क कागज़ पर नहीं, मन पर पड़ता है।

तो बदलाव की ज़रूरत क्यों पड़ी?

आज का छात्र केवल किताबों के बोझ से नहीं जूझ रहा, बल्कि

प्रतिस्पर्धा, सोशल प्रेशर, करियर की अनिश्चितता और अपेक्षाओं के दबाव से भी घिरा हुआ है। ऐसे में बार-बार लाल निशानों से भरी कॉपियाँ उसके भीतर यह भावना पैदा करती हैं कि वह “काबिल नहीं है”।

इसका सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। कई बच्चे सीखने के बजाय गलती छुपाने लगते हैं। डर आधारित मूल्यांकन समझ को पीछे छोड़कर रटने की संस्कृति को बढ़ावा देता है।

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) इसी समस्या को पहचानते हुए कहती है—

“Assessment should be for learning, not of learning.”

यानी मूल्यांकन सीखने के लिए हो, सीख को जज करने के लिए नहीं।


क्या यह तरीका सच में काम करेगा?

यह मान लेना भोला होगा कि केवल पेन बदल देने से शिक्षा व्यवस्था बदल जाएगी।

सच यह है कि

केवल रंग बदलने से चमत्कार नहीं होगा,

लेकिन यह सोच बदलने की शुरुआत जरूर है।

यदि भाषा वही कठोर रहे,

यदि तुलना और तिरस्कार बना रहे,

यदि ध्यान केवल गलतियों पर ही केंद्रित हो,

तो ग्रीन पेन भी रेड पेन जैसा ही असर करेगा।

लेकिन यदि शिक्षक सुधारात्मक टिप्पणी करें, प्रयास की सराहना करें और गलती के साथ दिशा भी दें, तो वही मूल्यांकन सीखने का सशक्त साधन बन सकता है।

रेड पेन का विरोध, अनुशासन का विरोध नहीं

यह समझना आवश्यक है कि रेड पेन हटाने का अर्थ ढिलापन नहीं है। यह अनुशासन को खत्म करने की नहीं, बल्कि अनुशासन से डर हटाने की कोशिश है।

अनुशासन जब समझ से आता है, तो टिकाऊ होता है।

और जब डर से आता है, तो अस्थायी।

निष्कर्ष: बहस रंग की नहीं, सोच की है

रेड पेन बनाम ग्रीन पेन की बहस दरअसल रंगों की नहीं, दृष्टिकोण की बहस है।

यह स्वीकार करना कि बच्चा मशीन नहीं है,

गलती सीखने की सीढ़ी है,

और मूल्यांकन संवाद हो सकता है—

यही इस बदलाव का असली उद्देश्य है।


“जब शिक्षा डर छोड़ देती है, तभी सीखना शुरू होता है।”

Tuesday, December 16, 2025

CBSE की नई परीक्षा नीति क्या है? (कक्षा 10) CBSE ने निर्णय लिया है कि 2026 से कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा साल में दो बार होगी।

 CBSE की नई परीक्षा नीति क्या है? (कक्षा 10)

CBSE ने निर्णय लिया है कि 2026 से कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा साल में दो बार होगी।

1️⃣ पहली परीक्षा (मुख्य परीक्षा)

  • अनिवार्य (Compulsory)
  • सभी छात्रों को इसमें बैठना होगा
  • आमतौर पर फरवरी–मार्च में होगी
  • पूरे सिलेबस पर आधारित होगी

2️⃣ दूसरी परीक्षा (वैकल्पिक / सुधार परीक्षा)

वैकल्पिक (Optional)

आमतौर पर मई–जून में होगी

इसका उद्देश्य है:

अंक सुधार (Improvement)

कम्पार्टमेंट

विशेष परिस्थितियाँ

 दोनों परीक्षाओं में से बेहतर अंक को अंतिम परिणाम माना जाएगा।

दूसरी परीक्षा में कौन बैठ सकता है?

✔ 1. अंक सुधार (Improvement) के लिए

  • जो छात्र पहली परीक्षा में पास हो चुके हैं
  • लेकिन अपने अंक बढ़ाना चाहते हैं
  • ऐसे छात्र अधिकतम 3 मुख्य विषयों (Maths, Science, SST, Languages) में दूसरी परीक्षा दे सकते हैं

✔ 2. कम्पार्टमेंट वाले छात्र

  • जो छात्र पहली परीक्षा में 1 या 2 विषयों में फेल हो गए हों
  • वे उन्हीं विषयों में दूसरी परीक्षा (Compartment) दे सकते हैं

✔ 3. विशेष परिस्थितियों वाले छात्र

  • खेल प्रतियोगिता के कारण पहली परीक्षा छूट गई हो
  • विंटर-बाउंड स्कूल (जैसे पहाड़ी क्षेत्र)
  • विशेष आवश्यकता वाले छात्र (CWSN)

ऐसे मामलों में CBSE दूसरी परीक्षा की अनुमति दे सकता है

दूसरी परीक्षा में कौन नहीं बैठ सकता?

1. जो पहली परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए

  • अगर कोई छात्र पहली परीक्षा में 3 या उससे अधिक विषयों में अनुपस्थित रहा
  • उसे Essential Repeat माना जाएगा
  • वह उसी साल दूसरी परीक्षा नहीं दे सकता

2. विषय बाँटकर परीक्षा देने वाले छात्र :- ऐसा नहीं हो सकता कि:

  • कुछ विषय पहली परीक्षा में
  • और कुछ विषय केवल दूसरी परीक्षा में दिए जाएँ

पहली परीक्षा सभी विषयों के लिए अनिवार्य है

📌 महत्वपूर्ण बातें (Exam-Oriented)

✔ पहली परीक्षा हर हाल में देनी होगी

✔ दूसरी परीक्षा केवल सुधार / कम्पार्टमेंट के लिए है

✔ दोनों परीक्षाओं का पूरा सिलेबस समान होगा

✔ बेहतर अंक को ही फाइनल रिज़ल्ट माना जाएगा

✔ इससे छात्रों पर परीक्षा का तनाव कम होगा

🧾 उदाहरण से समझिए

स्थिति                                                                                         दूसरी परीक्षा दे सकता है?

सभी विषयों में पास, अंक बढ़ाना चाहता है                                             ✅ हाँ

1–2 विषयों में फेल                                                                                     ✅ हाँ

3 या अधिक विषयों में अनुपस्थित                                                             ❌ नहीं

पहली परीक्षा पूरी तरह छोड़ दी                                                             ❌ नहीं

खेल/विशेष कारण से परीक्षा छूटी                                                             ✅ हाँ (विशेष अनुमति से)

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