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Showing posts from October, 2025

CBSE NISHTHA Courses 2026-27: 5 New Courses for Teachers | Enrollment Last Date 31 August 2026

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 CBSE NISHTHA Courses 2026-27: 5 New Courses for Teachers | Enrollment Last Date 31 August 2026 CBSE has released Circular No. TRG-15/2026 dated 13 August 2026 regarding enrollment in NISHTHA Courses for the 2026-27 Cycle 1. Teachers and School Heads can enroll in courses such as NISHTHA FLN, ECCE, Cyber Hygiene, E-Waste, Action Research and Catch the Rain. 📅 Enrollment closes: 31 August 2026 📚 Course cycle: April–October 2026 🎓 For: Teachers & School Heads 📜 Certificate/Professional Development opportunity 👉 Want to know the complete course list, eligibility, important dates and official enrollment link? Read the full CBSE Circular on https://www.cbse.gov.in/cbsenew/documents/15_Circular_2026_13082026.pdf

“एक मछली से नहीं, कई अच्छी मछलियों से बदलता है तालाब”

“एक मछली से नहीं, कई अच्छी मछलियों से बदलता है तालाब” यह कहावत तो हम सबने सुनी है — "एक मछली सारे तालाब को मैला कर देती है" । इसका मतलब होता है कि अगर किसी समाज या समूह में एक भी व्यक्ति गलत रास्ते पर चल पड़े, तो उसके बुरे कर्मों का असर पूरे समाज पर पड़ता है। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि अगर यही कहावत उलट दी जाए? अगर "एक अच्छी मछली पूरे तालाब को साफ कर सकती है" , तो क्या समाज बेहतर नहीं बन सकता? असल में, बात केवल एक मछली की नहीं है, बात हमारे सोचने और करने के तरीके की है। हम अक्सर दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाने में तो बहुत तेज़ होते हैं, लेकिन जब अच्छाई फैलाने की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं। हम यह सोचते हैं कि "मैं अकेला क्या कर लूंगा?" — और यही सोच समाज को आगे बढ़ने से रोकती है। अगर एक नकारात्मक व्यक्ति अपने आसपास के माहौल को बिगाड़ सकता है, तो दस सकारात्मक व्यक्ति मिलकर उसे सुधार क्यों नहीं सकते? समस्या यह नहीं है कि बुराई ताकतवर है, बल्कि यह है कि अच्छे लोग अक्सर चुप रहते हैं, निष्क्रिय रहते हैं। जब अच्छाई आवाज़ नहीं उठाती, तो बुराई अपने आप हावी ...

Chapter: Democratic Rights – (Class 9 Civics)

 Chapter: Democratic Rights – (Class 9 Civics) 1. Life Without Rights Rights are what make us free and equal in a democracy. Without rights, people can be exploited, tortured, or silenced. (a) Prison in Guantanamo Bay (USA) The US government kept hundreds of prisoners (mostly from Afghanistan/Iraq) in Guantanamo Bay, a military camp. Prisoners were suspected terrorists — but no fair trial was given. They were tortured and detained for years without being proven guilty. Even their families were not informed about their location. This shows life without rights — when people are treated as if they have no human value. (b) Citizens’ Rights in Saudi Arabia Saudi Arabia is a monarchy — no elected parliament. The King is all-powerful: he can change laws and decisions at will. No freedom of speech or religion – criticism of the government is punished. Women’s rights are limited: they need permission from male guardians for many things. This shows lack of political and personal freedoms. (c...

“खोई हुई ज़मीन” — एक किसान की सीख

 “खोई हुई ज़मीन” — एक किसान की सीख एक छोटे से गाँव में सभी लोग खेती-बाड़ी कर अपना जीवन यापन करते थे। खेत ही उनका संसार थे और मिट्टी ही उनका गर्व। ज़्यादातर किसान अपने काम से संतुष्ट थे, लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिन्हें अपनी किस्मत पर हमेशा शिकवा रहता था। उनमें से एक किसान था—रामू। रामू अक्सर सोचता, “कैसी भाग्यशाली ज़िंदगी होती होगी उन लोगों की जिन्हें कोई काम नहीं करना पड़ता, जो बड़ी गाड़ियों में घूमते हैं, जिनके पास महल जैसे घर हैं!” वो हर दिन दूसरों की खुशहाली देखकर अपने जीवन से ऊब चुका था। गाँव के बुज़ुर्ग कहा करते थे, “दूसरों की थाली का खाना सबको स्वादिष्ट लगता है, पर जब वही खाना अपनी थाली में आता है तो उसमें भी कमी ढूँढ़ी जाती है।” रामू को ये बात कभी समझ नहीं आई। धीरे-धीरे उसके भीतर असंतोष और नकारात्मकता घर करने लगी। अब उसे खेती करना बोझ लगने लगा। उसे बस यही इंतज़ार था कि कोई उसकी ज़मीन खरीद ले ताकि वह इस "कठिन जीवन" से छुटकारा पा सके। और एक दिन उसकी किस्मत ने जैसे उसकी बात सुन ली—एक ज़मीन का खरीददार गाँव में आया। रामू ने बिना ज़्यादा सोचे-समझे अपनी पूरी ज़मीन बेच दी। बदले मे...

मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ

 मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ, मानो अपने ही घर में मेहमान हो गया हूँ। भाग-दौड़ की इस ज़िंदगी में दफ़न कर दीं मैंने, अपनी सारी इच्छाएँ, चलता हूँ मैं, पर भीतर से — मानो चलता-फिरता श्मशान हो गया हूँ। क्या, किसने सुनी कभी मेरी बातें यहाँ? हर जवाब में बस सन्नाटा ही पाया मैंने। मैं इस सफ़र का मुसाफ़िर अब बेजान हो गया हूँ, लोगों की सुनते-सुनते खुद अपनी आवाज़ से अनजान हो गया हूँ। टूट कर गिरा हूँ जब से इस धरा पर, तब से आसमां के लिए मेहमान हो गया हूँ। जिसने भी देखा, मुँह फेर लिया — जबसे मैं ज़रूरतमंद इंसान हो गया हूँ।

इंसानियत का असली अर्थ

 इंसानियत का असली अर्थ एक सुहावनी सुबह थी। आज घर के सभी सदस्यों की छुट्टी एक साथ पड़ी थी। सबने तय किया कि आज का दिन घर पर न बिताकर कहीं बाहर घूमने चलेंगे। काफी सोच-विचार के बाद सबने निश्चय किया कि वे आज विभिन्न धर्मस्थलों के दर्शन करने जाएंगे। सुबह-सुबह सब तैयार हुए, प्रसन्न मन से निकले और दिनभर अलग-अलग मंदिरों और तीर्थस्थलों में घूमते रहे। हर कोई अपने-अपने तरीके से आनंद ले रहा था। परंतु परिवार का सबसे छोटा सदस्य—आरव—चुपचाप सब कुछ देख रहा था। वह देख रहा था कि मंदिरों के बाहर लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों से उतरते हैं, महँगे कपड़े पहने हुए हैं, लेकिन जो गरीब और जरूरतमंद वहाँ खड़े थे, कोई उनकी ओर देखना तक पसंद नहीं करता। कुछ लोग तो उन्हें दुत्कार देते, मज़ाक उड़ाते, और बिना वजह अपमानित करते। आरव का मन यह सब देखकर बहुत बेचैन हो उठा। उसे लगा जैसे इंसानियत कहीं खो गई है। शाम को सब लोग घर लौटे। सभी खुश थे कि दिन अच्छा बीता, पर आरव का चेहरा उदास था। दादी ने पूछा, “क्या हुआ बेटा? तुम तो पूरे दिन चुप-चुप रहे, घूमने में मज़ा नहीं आया क्या?” आरव कुछ देर चुप रहा, फिर बोला — “दादी, मंदिरों में लोग भगव...

अभिभावक की भूमिका और परवरिश का प्रभाव: महाभारत से लेकर आज के युग तक

अभिभावक की भूमिका और परवरिश का प्रभाव: महाभारत से लेकर आज के युग तक समय चाहे महाभारत का हो या आज का आधुनिक युग — बच्चों के निर्माण में अभिभावक की भूमिका सदैव सबसे महत्वपूर्ण रही है। बच्चे समाज की नींव हैं, और इस नींव की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि अभिभावक उन्हें किस दिशा में और किस सोच के साथ मार्गदर्शन देते हैं। आज के समय में जब तकनीक, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता जीवन का केंद्र बन चुकी है, तब सबसे बड़ी चुनौती है — बच्चों को सही दिशा में ले जाना। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में सफलता प्राप्त करे, एक अच्छा इंसान बने और समाज में अपनी पहचान स्थापित करे। लेकिन केवल यह चाहना पर्याप्त नहीं। यह तभी संभव है जब अभिभावक अपने बच्चों का मार्गदर्शन समझदारी, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ करें। आज की परवरिश की सच्चाई अक्सर देखा जाता है कि कई अभिभावक यह मान लेते हैं कि अपने बच्चे की हर आवश्यकता पूरी कर देना — स्कूल और ट्यूशन की फीस देना, नई वस्तुएँ खरीदकर देना या उसकी हर इच्छा पर तुरंत प्रतिक्रिया देना — यही एक जिम्मेदार अभिभावक होने की निशानी है। लेकिन सच्चाई यह है कि सुविधाएँ उपलब्ध ...

"माइंड रीडिंग – विज्ञान, मनोविज्ञान या जादू?"

"माइंड रीडिंग – विज्ञान, मनोविज्ञान या जादू?"  क्या किसी का मन पढ़ा जा सकता है? क्या वास्तव में कोई व्यक्ति बिना कुछ कहे यह जान सकता है कि सामने वाला क्या सोच रहा है? अक्सर टीवी, मंच या सोशल मीडिया पर हम ऐसे दृश्य देखते हैं जहाँ कोई व्यक्ति किसी का “माइंड पढ़” लेता है। दर्शक हैरान रह जाते हैं और सोचते हैं — यह जादू है या ईश्वर का चमत्कार! लेकिन आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार, माइंड रीडिंग कोई जादू या दैवी शक्ति नहीं, बल्कि एक कला (Art) है। इसे सीखने और अभ्यास करने से कोई व्यक्ति दूसरों के विचारों, भावनाओं और इरादों को उनके व्यवहार और शरीर की भाषा से समझ सकता है। माइंड रीडिंग की असलियत माइंड रीडिंग में व्यक्ति सामने वाले के चेहरे के भाव, आँखों की हरकतें, बोलने का तरीका, शरीर की मुद्रा, और आवाज़ के उतार-चढ़ाव जैसी छोटी-छोटी बातों को ध्यान से देखता है। उदाहरण के लिए — अगर कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा है, तो वह बार-बार नज़रें चुराएगा या होंठों को दबाएगा। अगर कोई बात छिपा रहा है, तो उसके चेहरे पर असहजता दिखेगी। एक अच्छा माइंड रीडर इन सूक्ष्म संकेतों को पहचान लेता है और सामने वाले के मन की...

नाजीवाद और हिटलर का उदय, क्लास - 9

एक कक्षा में शिक्षक बच्चों को कहानी सुना रहे हैं। शिक्षक: बच्चों, आज मैं तुम्हें एक बहुत बड़ी घटना की कहानी सुनाने जा रहा हूँ—दूसरे विश्व युद्ध की। छात्रा अंजली: सर, क्या ये वही युद्ध है जिसमें हिटलर था? शिक्षक: बिल्कुल सही अंजली। लेकिन उससे पहले हमें पहले विश्व युद्ध के बारे में जानना होगा। 1914 से 1918 तक पहला बड़ा युद्ध हुआ था। उसमें जर्मनी हार गया। हारने के बाद वहाँ के लोग बहुत परेशान हो गए। छात्र रोहित: सर, क्यों परेशान हुए? शिक्षक: क्योंकि हार के बाद जर्मनी को एक समझौता करना पड़ा जिसे वर्साय की संधि कहते हैं। इस संधि में जर्मनी से बहुत पैसा माँगा गया और कई सख्त नियम थोपे गए। छात्रा नेहा: सर, क्या सब लोग चुपचाप मान गए? शिक्षक: नहीं नेहा, जर्मनी के लोग खुश नहीं थे। इसी बीच एक नया नेता आया—एडॉल्फ हिटलर। उसने कहा, "मैं जर्मनी को फिर से ताकतवर बनाऊँगा।" छात्र आदित्य: और लोग उसकी बात मान गए? शिक्षक: हाँ, बहुत से लोग मान गए। लेकिन हिटलर की सोच बहुत गलत थी। उसने कहा कि सिर्फ "शुद्ध जर्मन" ही देश में रहेंगे। उसने यहूदियों और अन्य समुदायों को सताना शुरू कर दिया। छात्रा ...

रूस की क्रांति की कहानी

बहुत समय पहले यूरोप में फ़्रांस की क्रांति हुई थी। उस क्रांति से पूरे यूरोप में बदलाव की लहर चली। लोग समझने लगे कि केवल राजा और रईसों के पास ही ताक़त क्यों हो? आम जनता को भी बराबरी और अधिकार क्यों न मिलें? इसी समय अलग-अलग विचार सामने आए – Conservative (रूढ़िवादी) लोग कहते थे कि पुराना ही सबसे अच्छा है। राजा और चर्च (धर्म) को छेड़ना नहीं चाहिए। Liberal (उदारवादी) लोग चाहते थे कि राजा की ताक़त कम हो और संसद बने, जहाँ जनता की भी आवाज़ सुनी जाए। Radical (कट्टरपंथी) लोग मानते थे कि सिर्फ़ संसद से काम नहीं चलेगा, असली बदलाव तब होगा जब अमीर-ग़रीब का फ़र्क़ मिटे और सबको बराबरी मिले। धीरे-धीरे उद्योग (Industry) बढ़ने लगे। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियाँ बनीं। इससे एक नया वर्ग पैदा हुआ – मज़दूर वर्ग। ये लोग दिन-रात मेहनत करते थे, लेकिन मालिक अमीर होते गए और मज़दूर ग़रीब ही रहे। दूसरी ओर किसान भी बहुत परेशान थे, क्योंकि उन पर कर (tax) ज़्यादा था और जीवन कठिन था। इन्हीं हालात में एक विचारक सामने आए – कार्ल मार्क्स (Karl Marx)। उन्होंने कहा कि असली ताक़त मेहनत करने वालों – यानी मज़दूरों और किसानों – के पास ह...

फ़्रांस की क्रांति की कहानी

 बहुत समय पहले की बात है। एक देश था फ़्रांस, जहाँ एक राजा रहते थे—राजा लुइस और उनकी रानी मैरी। राजा और उनका परिवार ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीते थे। वे शानदार महलों में रहते, सोने-चाँदी के बर्तन इस्तेमाल करते और स्वादिष्ट भोजन करते। लेकिन फ़्रांस का समाज तीन हिस्सों में बँटा हुआ था— पहला हिस्सा: पादरी (धार्मिक नेता), जिन्हें विशेष अधिकार थे और कर नहीं देना पड़ता था। दूसरा हिस्सा: जागीरदार और रईस लोग, जिनके पास बहुत सी जमीन और दौलत थी। तीसरा हिस्सा: आम लोग—किसान, मजदूर, व्यापारी और कारीगर। सबसे ज्यादा मेहनत यही आम लोग करते थे, लेकिन सबसे ज्यादा बोझ भी इन्हीं पर डाला जाता। उन्हें तरह-तरह के कर चुकाने पड़ते। उनकी ज़िंदगी मुश्किल और दुखों से भरी थी। इन्हीं आम लोगों में से एक किसान था पियरे। वह खेतों में दिन-रात मेहनत करता, लेकिन घर में खाने के लिए रोटी भी मुश्किल से मिलती। उसकी बेटी अक्सर पूछती— “पापा, हमारे पास रोटी क्यों नहीं है?” पियरे दुखी होकर कहता— “बेटी, राजा और अमीर लोग हमारा सारा अनाज और पैसा ले जाते हैं।” पियरे जैसे हज़ारों लोग परेशान थे, लेकिन डर के कारण कोई आवाज नहीं उठाता था। जो ...

स्त्री और मातृत्व : समाज की सोच पर पुनर्विचार

स्त्री और मातृत्व : समाज की सोच पर पुनर्विचार स्त्री का मातृत्व केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा और अनोखा अनुभव है। जब एक स्त्री नवजात शिशु को जन्म देती है, तो लोग प्रायः उस नन्हीं जान के आने का उत्सव मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग यह समझते हैं कि वास्तव में यह स्त्री का भी पुनर्जन्म होता है। वह नौ माह तक अपनी कोख में जीवन को संजोए रखती है, अपनी इच्छाओं और सुखों का त्याग करती है, अनगिनत पीड़ाओं से गुजरती है और अंततः संसार को नया जीवन देती है। फिर भी, इन त्यागों और बलिदानों को समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। उसके जीवन में दुख और यातनाएँ ऐसे जुड़े रहते हैं, मानो यह उसी के हिस्से का स्थायी सत्य हो। और यदि कोख में पल रही संतान एक लड़की हो, तो यह यातना और भी बढ़ जाती है। समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी स्त्री को इसके लिए दोषी ठहराता है, जैसे संतान का लिंग निर्धारण केवल उसी के हाथों में हो। लेकिन यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि संतान का लिंग निर्धारण पुरुष के गुणसूत्रों पर निर्भर करता है। फिर भी, स्त्री को ही दोष देने की मानसिकता हमारे समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी सोच को दर्शाती है। सवाल उठता है...

IMPORTANT QUESTIONS Class 10 Geography – Agriculture (Chapter 4)

 Class 10 Geography – Agriculture (Chapter 4) 1 Mark Questions (MCQ / VSA) Name the two staple food crops of India.  What is Jhumming agriculture? and write different name of Jhumming agriculture  Which state is the largest producer of rice in India? What is the cropping season of wheat in India? Which crop is known as "golden fibre"? Name two beverage crops grown in India. Mention any one feature of commercial farming. Who initiated Bhoodan-Gramdan movement? Bhoodan-Gramdan movement also known as_______ What is the name of person who donate his land to land-less villagers? 3 Marks Questions (Short Answer) Describe any three features of primitive subsistence farming. State the climatic conditions required for the growth of cotton. Distinguish between rabi and kharif cropping seasons. What are Zaid crops? Write three differences between intensive and Primitive farming. Explain three problems faced by Indian farmers today. 5 Marks Questions (Long Answer) Describe the geogra...