शुरुआती दौर में, निकला था, कारवाँ लेकर
1. सफर में चलते चलते थक गया हूँ मैं, नाजाने मंज़िल का अंत कहाँ पर है। शुरुआती दौर में, निकला था, कारवाँ लेकर लेकिन अब खुद में ही सिमट गया हूँ मैं, 2. सफर में कोई अपना मिल, जाये तो अच्छा है। थाम ले हाथ जो अपना, मुसाफिर वो सच्चा है। कहने को विरासत में, सबको दुनिया मिलती है। इस दुनिया के रंग में जो, ढल जाये वो अच्छा है। 3. मोहब्बत के सफर में जो, मुसाफिर टिक न पाया है अदने से सफर मे, उसने फ़क़त दर्द ही पाया है इल्लत थी सदा, उसको मुस्कुराने की इल्तिफ़ात (मित्रता) ने उसको बे ज़ेर (निर्धन) बनाया है। 4. हर गलती पर आँसू बहाना अपराध है हर बार इल्ज़ाम दूसरों पर लगाना अपराध है जो न समझे अहमियत रिश्तों की उस रिश्ते को निष्कर्ष तक ले जाना अपराध है। 5. बेमतलब कौन किसको याद करता है बेमतलब कौन किस से बात करता है यहाँ स्वार्थ का मुखौटा ओढ़े बैठे है सब वरना कौन पत्थर को खुदा मान फरियाद करता है 6. पत्थर अगर, खुदा बन जाये तो अच्छा है पत्थर अगर, जीने की कला सीखा जाये तो अच्छा है राह के पत्थर को तुच्छ समझने वालों को...