Posts

Showing posts with the label ग़ज़ल

मैंने इंसानी लिबास मे शैतान देखें है

Image
मैंने इंसानी लिबास मे शैतान देखें है इंसान नहीं मैंने तो हैवान देखें है डगमगाता रहा ईमान इंसानों का इंसानी वेश भूषा मे बेमान देखें है लूट रहा है इंसान ही बस्ती इंसानों की इन्सानों से ही मैंने इंसान पशेमान देखें है ढूंढ रहा था कूँचों मे भगवान को दैर-ओ-हरम के नाम पर मैंने श्मशान देखें है कौन करेगा पछतावा अपने कर्मों का इबादत पर ही होते मैंने इंतेकाम देखें है इल्म है उस्तादों को, इबादत का उन काजी के हाथों मे मैंने जंगी समान देखें है लिबास ओढ़े खुतबा दे रहे थे खुदा पर, “भूपेंद्र” जो जुबां से मैंने उनकी, निकलते खूनी फरमान देखें है

उलझा हूँ,जिंदगी की हर एक गुत्थियाँ सुलझाने मे

उलझा हूँ,जिंदगी की हर एक गुत्थियाँ सुलझाने मे  जब  से  दस्तक   दी   है  दर्द  ने  मेरे  सिराने  मे  बड़ी   मशक्कत   से   पाला   था   मैंने   एक   भ्रम  ठोकरों ने बताया ,कोई नहीं होता अपना इस जमाने मे  दोस्ती इतनी अच्छी भी नहीं कि भूल बैठो खुद को  दोस्त ही वार करता है,पीछे से जख्म को सहलाने मे  बेस्वार्थ  प्यार  कि   डोर  से    जुड़ी   हुई है,   माँ  वरना सवार्थ कि डोर से जुड़ा है, हर रिश्ता जमाने मे माँ की गोद ने भूला दिया जहाँ के दर्द को  कोई  जादू  हो  जैसे  माँ  के  सिराने  मे   भूपेंद्र रावत 

एक अज़नबी जो मिल के गया

Image
 एक अज़नबी जो  मिल के   गया मुरझाया फूल, फिर खिल सा गया दिल  लगाने की  कला मे माहिर  है, वो मिला तो, जैसे मिश्री जैसा घुल सा गया गुलाब  के खिले  हुए काँटों को उस  राह  मे  मसल  सा  गया गुजरा जिस राह से वो मुसाफिर  चश्म - ए - चराग़ जल सा गया पाकीज़ा पैगाम लेकर आया है,अज़नबी अपरिचित,चश्म-ओ-चिराग़  बन सा गया भूपेंद्र रावत