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Thursday, December 25, 2025

अरावली : एक विकसित भूल

 अरावली : एक विकसित भूल


जैसे धीरे-धीरे लुप्त हो गईं

कई ऐतिहासिक धरोहरें,

उसी तरह

एक दिन खो जाएगी

अरावली भी।


पर्यावरण के विद्वानों ने

प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ

सिद्ध कर दिया—

वर्षों से स्थिर खड़ी

प्राणदायिनी अरावली

अब विकसित भारत के लिए

औषधि नहीं,

बल्कि समस्या है।


कौन कहता है

ईश्वर गलती नहीं करते?

शायद अरावली के निर्माण के समय

ईश्वर से भी

कुछ भूल हो गई—

सीमाएँ तय करने में

अरावली की।


विकसित भारत की परिभाषा

देने वाले

चंद विद्वानों ने

तथ्यों के साथ

यह सिद्ध कर दिया

कि ईश्वर भी

गलती करते हैं।


काली बाज़ारी,

खनन की चोरी,

पेड़ों की अंधी कटाई,

निर्दोष जीवों को

बेघर करना—

यही हैं आज

विकास के प्रमाण।


और अरावली—

बस एक बाधा,

जिसे मिटा देना है

तरक़्क़ी की राह से

भूपेंद्र रावत


Monday, December 1, 2025

समानता के नाम पर

 समानता के नाम पर



 निर्धारित की गई सीमाएँ—

 पुरुषों को मिला

 अनंत आकाश,

 और स्त्री के हिस्से आया

 वही आकाश का शेष टुकड़ा,

 जिसे भी

 पुरुषों ने नकार दिया। 


 खोखली मर्यादाओं ने।

समानता के नाम पर ही

 स्त्रियों के कंधों पर

 थोप दी ज़िम्मेदारियाँ—

 परिवार की, समाज की,

 और इसे कहा गया

कर्तव्यों का पालन।

आदर्शवादी समाज में

 आदर्श स्त्री को मिली परिभाषा—

 वही जो न लड़ी

 अपने अधिकारों के लिए,

 जो अपनी आवाज़ को

 विरोध की गूँज में

 बदल न सकी,

 बस उम्रभर

 सिसकियों को ओढ़ती रही।

समानता दिखने के बावजूद

 वह झेलती रही अवहेलना—

 कभी परिवार से,

 कभी समाज से।

और आज भी

 पुरुष-प्रधान दुनिया में

 आज़ाद कहलाकर भी

 कैद है वह

 विचारों की बेड़ियों में।

भूपेंद्र रावत

Friday, November 14, 2025

परंपराओं की बेड़ियों में बँधी आज़ादी

सामाजिक और सांस्कृतिक 

परंपराओं की बेड़ियों मे बांधकर 

महिलाओं को दी गयी आजादी, 

और निर्धारित की गयी 

उनकी सीमाएं। 

पंख कुतर कर उन्हे 

किया गया कमजोर और 

रखा गया वंचित 



उन्हें शिक्षा और समानता के 

उन सभी अधिकारों से जो 

दिये गए पुरुषों को जन्म से। 

घर की चार दीवारी मे 

सिमटी महिलाओं को 

कहा गया संस्कारी। 

और बैठाया गया डर 

रूढ़िवादी सोच का कि 

पढ़ने से हो जाती हैं महिलाएं, विधवा।


भूपेंद्र रावत 

Thursday, November 13, 2025

वक़्त ने कभी नहीं ओढ़े मुखोटे

 सुना है, अक्सर लोगों से, कि

समय बदल गया है, लेकिन

उन्हें कौन समझाए कि

वक़्त तो जैसा था, आज भी वैसा ही है

बदल गया है चेहरा, नियत, और इरादा इंसानो का

वक़्त ने कभी नहीं बदला अपना मार्ग तनिक सा भी

बल्कि इंसानो ने बदल लिया स्वयं को

अपनी जरूरतों के अनुसार, और दोषी ठहरा दिया, वक़्त को

वक़्त ने कभी नहीं ओढ़े मुखोटे, 

बल्कि वक़्त ने पढ़ाया पाठ

और मार्ग से भूले - बिसरे लोगों को दिखाया आईना।


भूपेंद्र रावत


Thursday, October 16, 2025

मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ

 मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ


मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ,

मानो अपने ही घर में मेहमान हो गया हूँ।


भाग-दौड़ की इस ज़िंदगी में

दफ़न कर दीं मैंने, अपनी सारी इच्छाएँ,

चलता हूँ मैं, पर भीतर से —

मानो चलता-फिरता श्मशान हो गया हूँ।


क्या, किसने सुनी कभी मेरी बातें यहाँ?

हर जवाब में बस सन्नाटा ही पाया मैंने।

मैं इस सफ़र का मुसाफ़िर अब बेजान हो गया हूँ,

लोगों की सुनते-सुनते

खुद अपनी आवाज़ से अनजान हो गया हूँ।


टूट कर गिरा हूँ जब से इस धरा पर,

तब से आसमां के लिए मेहमान हो गया हूँ।

जिसने भी देखा, मुँह फेर लिया —

जबसे मैं ज़रूरतमंद इंसान हो गया हूँ।

Thursday, September 4, 2025

शिक्षक दिवस

शिक्षक बिन जीवन नहीं 

शिक्षक बिन नहीं ज्ञान 

शिक्षक बिन अधूरा है

हम सब का सम्मान 

शिक्षक ने ही तो बढ़ाया है 

देश का मान 

शिक्षक ही तो है, हम सब की पहचान

मामूली से पाषाण को 

स्वर्ण बना दिया 

निर्थक से जीवन को 

तुमने अर्थ है दिया

तिमिर से हरकर 

राह से हमारी,

हमारे जीवन मे तुमने प्रकाश भर दिया।   



गलतियों को हमारी स्वीकार किया,

जीवन हमारा संवार दिया।

ज्ञान का दीप जलाकर तुमने,

जीवन को हमारे सार दिया।



पथ के काँटों को तुमने क्षण भर में उखाड़ दिया,

हर अंधियारे को तुमने उजाले से निखार दिया।

विषम परिस्थितियों से लड़ना सिखाया तुमने  

जीवन के हर पथ पर डटकर जीना  बताया तुमने ।


काँटों की बगिया में सदा मुस्कान सजाई तुमने,

सपनों की डगर पर राह दिखाई तुमने।

सफलता की सीढ़ी को चंद कदमों मे बदलकर 

असंभव सी दूरी सरल बनाई तुमने। 


आधार हमारा बनाया तुमने 

राह पर चलना सिखाया तुमने

डगमगाते हुए कदमों को 

पथ मे संभलना सिखाया तुमने।  


ओ गुरुदेव! तुम हमारे पथ-प्रदर्शक,

तुमसे ही जीवन बना उज्ज्वल और दर्पक।

तुम्हारे ऋण से हम उऋण न हो पाएँगे,

तुम्हारी शिक्षाएँ जीवनभर अपनाएँगे।



भूपेंद्र रावत 

Monday, August 25, 2025

जीत गए नेता जी चुनाव में

 जीत गए नेता जी चुनाव में


जीत गए नेता जी चुनाव में,

ढोल-नगाड़ों की थाप में,

नारे गूंजे, झंडे लहराए,

उम्मीदों के दीप जलाए।


बदलते आंकड़ों के संग

बदलते चेहरों की मुस्कान,

जनता सुनती रही हर बार,

मंचो से वादों की बौछार।


और अंत में...

शेष रह गए झूठे वादे, और खोखली बाते

मतदाताओं की, टूटती उम्मीदें

सड़कें वहीं, गड्ढे वहीं,

बस चुनावों में भर दिए गए काग़ज़ी गड्डे।

स्त्री का घर

 स्त्री का घर


ईंट–ईंट जोड़कर उसने,

आंसुओं से गारा बनाया,

रक्त और पसीने से गढ़ी दीवारें,

फिर भी मेहनताना मिला—

कौड़े, ताने और तिरस्कार।

तन की थकान, मन की पीड़ा,

के साथ दर्द से गूंजता, हर स्वर

फिर भी त्यागा नहीं उसने अपना घर,

क्योंकि उस घर की सांसों में

बसा था, उसका अस्तित्व ।


पुरुष हमेशा की तरह रहे केंद्र में,

स्त्री को ठुकराते, दबाते,

प्रगतिशीलता के नकाब तले

बरसाते रहे उपेक्षा की चोट।


समानता के नारे,

संसद और चैनलों में गूंजे,

पर जमीनी धरातल पर

स्त्री धकेली जाती रही गर्त में,

बनाई जाती रही

वस्तु, सिर्फ उपभोग की ।


हक़ीक़त में बदलाव था 

कल्पनाओं से परे, जैसे होती है

कहानी परियों की टूटते तारों की। 

 

इन्सानो की बस्ती मे 

बदलाव का झूठा सपना लिए

स्त्री हर बार,होती रही शिकार, 

वासना का, कभी घरों मे तो कभी समाज मे   

छलनी होते समाज मे 

बिखरती गयी उम्मीदें 

और शेष रहा, दिलासा।


जख्म से सने जिस्म, 

दबी और कुचली  हुई आवाज़ के साथ 

फिर भी उठती,  रही स्त्री हर बार 

अपने आँचल में नए सूरज की रोशनी लिए।

इतिहास गवाह है कि 

घर की नींव, समाज की आत्मा,

और भविष्य की धड़कन

वही है—स्त्री।

Wednesday, June 18, 2025

ज़िंदगी मे एक दोस्त तो, ऐसा भी होना चाहिए

ज़िंदगी मे एक दोस्त तो, ऐसा भी होना चाहिए

जिसके पास हर दर्द के लिए एक मरहम होना चाहिए

कर सको अपने मन की बात जिससे  तुम

काँधे मे सिर रख, उसके रो सको तुम

दूर हो, फिर भी दूरी का एहसास न हो

मौन हो अधर, लेकिन प्यासे जज़्बात न हो

अंदर की व्यथा को वो जान ले 

हंसी के पीछे छिपे आँसुओ को पहचान ले,

रूह की माफिक साथ खड़ा नज़र वो आए 

वक़्त की आंधियों में वो साथ निभाए,

भूपेंद्र रावत 

Monday, June 9, 2025

कदमो की मदद से लांघा है, पहाड़ों की सबसे

मैंने देखा है, पहाड़ों को

और अपने अदने से 

कदमो की मदद से 

लांघा है, पहाड़ों की सबसे 

ऊंची चोटियों को

धरातल से जुड़े हुए,

घाटी बनाते, तथा ऊबड़-खाबड़

रास्ते भी, नहीं तोड़ पाये 

कभी जज़्बा मेरा

लेकिन, पहाड़ की सबसे ऊंची 

चोंटीयां भी नहीं छू पाई

कभी आसमां  को ,

बल्कि, उन्हें भी छिपना पड़ा

बादलों की ओंट मे

गुजरते वक़्त के साथ 

कमजोर होते पहाड़

झुके, और भूस्खलन के रूप मे

आखिर मिल गए धरातल मे   

      

Thursday, May 8, 2025

अंत होगा दुनिया का लुप्त होती मानवता के

अंत होगा दुनिया का 

लुप्त होती मानवता के 

अंत के पश्चात

और इस अंत के साथ 

शुरुआत होगी 

भावनाओं से रहित 

रोबोट युग की

इस आर्टिफिशियल दुनिया मे 

जब नहीं होगा,

मानवता का अस्तित्व, 

बस शेष रहेगा इतिहास

पन्नों और अजायबघरों में


रोबोटों की दुनिया में, 

नहीं होगी भावना

नहीं होगा प्रेम, 

नहीं होगी करुणा

केवल होगी मशीनें, 

जो करेंगी काम

बिना थके, बिना रुके.


क्या होगा मानवता का भविष्य?

क्या होगा हमारे अस्तित्व का परिणाम?

क्या हम खो जाएंगे 

होमो सेपियंस की भाँति

इस आर्टिफिशियल दुनिया में?

या हम ढूंढ पाएंगे अपना स्थान?


मानवता को बचाने के लिए

ढूँढने होंगे,

इन सवालों के जवाब, 

मानव को

आर्टिफिशियल दुनिया में, 

हमें बनाना होगा अपना रास्ता

और करने होंगे प्रयास

मानवता को बचाने के लिए, 

ताकि हम बचा सकें 

अपना अस्तित्व

रोबोट की दुनिया में।

Friday, April 25, 2025

मेरी हर सांस की, माँ शुरुआत हो तुम

 मैं जो भी हूँ, जहाँ भी हूँ 

उसकी बुनियाद हो तुम

मेरी हर सांस की, 

माँ शुरुआत हो तुम


माँ, तुम्हारी अंगुली पकड़ कर मैने पहली बार चलना सीखा

हर गिरते क़दम पर माँ,मैंने संभलना सीखा


मेरे सपनों की रखवाली कर 

माँ रातों की नींद तुमने त्यागी

अपना निवाला देकर मुझको

भूखी, प्यासी तुम कई रात जागी


तुमने न सिर्फ जन्म दिया, 

बल्कि जीना भी सिखाया है

हर दर्द और डर को

अपने आँचल मे छुपाया है


माँ, तुम सिर्फ एक शब्द नहीं

एक पूरी किताब हो

संघर्षों की गाथा मे माँ तुम एक विश्वास हो


इस धरा पर ईश्वर ने

एक सच्ची मूर्त बनाई

माँ के वजूद मे ही तो

ईश्वर की परछाई समाई

Wednesday, April 23, 2025

"मज़हब के नाम पर"

ये पहली बार नहीं, 

आतंकियों ने जब 

बेगुनाहों को मारा है। 

क्या, वो कोई पैगंबर है?

निर्दोषों को जो 

मौत के घाट उतारा है।

ये कायराना हरकत है,जो 

निहत्थों पर वार किया

मज़हब का रखवाला बन 

मज़हब को अपने शर्मसार किया। 

कौन सी शिक्षा मज़हब की तुम

धरा पर फैलाने आए थे। 

निर्दोषों को मारा तुमने 

कलंक मज़हब पर लगाए थे।

माना खुदा के बंदे हो तुम 

खुदा के परवदिगार हो 

क्या, अपने मज़हब के तुम 

इकलौते पहरेदार हो?

शांतिदूत हो तुम खुदा के 

क्या, मज़हब तुम्हारा हथियार है?

मौत के घाट निर्दोषों को उतारना 

क्या, तुम्हारा व्यपार है?


     


Thursday, March 6, 2025

सेवानिवृत हो गए बापू जी अपने कार्य से परंतु वह नहीं हुए सेवानिवृत अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों से

सेवानिवृत हो गए 

बापू जी अपने कार्य से

परंतु वह नहीं हुए सेवानिवृत 

अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों से



कर्तव्यों के बोझ तले 

बापू जी के कन्धों मे है जिम्मेदारियां, 

बूढ़े हो चुके माता - पिता की 

वर्षों पूर्व ब्याह के लायी गयी माँ की

और अपने सपने त्याग कर 

बच्चों के सपनों को पंख देने की

अपने लिए नहीं मिला समय 

बापू जी को कभी 

चेहरे की शिकन पर उन्होंने 

ओढ़ ली हंसी की चादर

जिम्मेदारियों के दरिया मे डूबे हुए

बापू जी ने नहीं होने दिया 

एहसास गहराइयों का

उन्होने जीवन मे 

कभी नहीं मानी हार

बापू जी हमेशा खड़े रहे 

पहाड़ की तरह

Wednesday, March 5, 2025

युद्ध और शांति

 युद्ध और शांति


युद्ध नहीं होते शांति के प्रतीक,

ना ही युद्ध से मिलती है शांति।

बल्कि युद्ध तब्दील कर देते है,

शोर को मौन मे 

शहर तब्दील हो जाते है, 

श्मशान मे 

जहाँ कभी गूंजती थी हँसी,

वहाँ शेष रह जाता है 

मलबा और अवशेष, 

सभ्यताओं का मिट जाता है, 

नामोनिशान,

इसके साथ  ही लुप्त हो जाती है,

सभ्यताएं 

बस शेष रह जाती है

जलती हुई लपटें 

धधकती हुई राख की चादर के साथ।

चारों ओर बिछ जाती है लाशें और 

शहर बदल जाते हैं, 

श्मशान में, 

और फिर मुर्दा के टीले मे  

जन्म लेती है, ख़ौफ़नाक शांति  


भूपेंद्र रावत 

Friday, February 14, 2025

हार तब नहीं होती, जब हार जाते है

हार तब नहीं होती, 

जब हार जाते है 

बल्कि हार तब होती है, 

जब हार मान जाते है। 

निराश हो कर 

हार मान जाना 

सफलता के रास्ते 

बंद कर देता है

सपने और लक्ष्यों को 

मंझधार मे छोड़ देता है

हार मानने से पहले 

पुनः प्रयास करो

आशावादी बनो और 

अभ्यास करो    




भूपेंद्र रावत 

 


Thursday, February 13, 2025

हार मान जाओगे तो जीतोगे कैसे?

हार मान जाओगे तो 
जीतोगे कैसे?
किताब अपनी किस्मत की 
लिखोगे कैसे?
प्रयास करने पर ही तो 
द्वार सफलता का खुलता है 
किस्मत वालों का नहीं 
मेहनत करने वालों का
भाग्य बदलता है
प्रयास अगर 
विफल हो भी जाये तो, 
संयम रखना होता है 
राह के कांटो को कुचल
आगे चलना होता है 
हार अंतिम 
परिणाम नहीं 
स्वीकार करों
उठो और अंतिम 
सांस तक प्रयास करों 

भूपेंद्र रावत 

 

Wednesday, February 12, 2025

खुशी और गम के साथ मैंने जिया है, जीवन को

खुशी और गम के साथ 
मैंने जिया है, जीवन को

गम के दिनों से 
मैं हुआ रूबरू
हँसते हुए,
जीवन की चुनौतियों से 
मैंने नहीं मानी हार 
बल्कि मैंने ज़िंदगी के 
हर पल का उठाया 
भरपूर लुत्फ 
जीने की, कि कोशिश 


जीवन की राह पर 
मैंने देखें कई मोड
नकाब ओढ़े हुए 
और बदलते हुए 
चेहरे के साथ  
लेकिन नहीं मानी
मैंने हार 

आशाओं से भरे 
जीवन मे 
मैंने सीखा 
ज़िंदगी को जीना
क्योंकि मुझे पता था 
अभी बहुत कुछ 
है शेष, जीवन में  

Tuesday, February 11, 2025

पुरुष जो मंडराते रहे भौरों की तरह हर एक स्त्री पर

पुरुष जो मंडराते रहे 

भौरों की तरह 

हर एक स्त्री पर, 

उनकी नज़रे चिपकी रहती है 

स्त्री की हर अदा पर 



वे स्त्री के पास मंडराते है 

जैसे भौरें  फूलों के आसपास,

उनकी बातें मीठी और मधुर होती है 

लेकिन उनके इरादे क्या होते है?

क्या उनके इरादे होते है, प्रेम के? 

क्या वे स्त्री का सम्मान करते है?

या बस अपने स्वार्थ के लिए

या  फिर शारीरिक संतुष्टि के लिए 

करते है उनका उपयोग ?


स्त्री को सावधान रहना चाहिए 

ऐसे पुरुषों से 

जो मंडराते रहते है

उनके इर्द-गिर्द 

उनकी नज़रों मे 

छुपा होता है 

एक खतरा जो 

पहुंचा सकता है

नुकसान स्त्री को। 


 

भूपेंद्र रावत 

Sunday, February 9, 2025

मैंने देखा है विशाल पर्वतों को सूक्ष्म होते हुए।




मैंने सुना है, बुजुर्गों से 

पहाड़ नहीं होते बूढ़े 

वो कल भी अटल थे 

आज भी अटल है 

और भविष्य मे भी ऐसे ही रहेंगे 

लेकिन मैंने महसूस की है 

उजड़ते हुए पहाड़ की पीड़ा 

कभी नहीं देखा मैंने 

खोखले होते पहाड़ को चीखते

और चिल्लाते हुए 

बल्कि मैंने देखा है उन्हें   

भूस्खलन के रूप मे 

नीचे खिसकते हुए

समतल बनते हुए 

मैंने देखा है 

विशाल पर्वतों को 

सूक्ष्म होते हुए।  

 



भूपेंद्र रावत 


 

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा चींटी अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके दो बच्चे थे, जो रोज़ स्कूल जाते थे। एक दिन बच्चों ने मासूमियत से ...