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Tuesday, June 16, 2026

"एक समाज, अनेक बँटवारे"

 

"एक समाज, अनेक बँटवारे"


साधारण से दिखने वाले 

समाज को चंद लोगों ने बांट दिया,अलग धड़ों मे

सर्वप्रथम बंटवारा था 

स्त्री और पुरुष का,

और इस समूह मे, 

स्त्री को रखा था 

कमजोर वर्ग मे, और 

पुरुष था डोमिनेंट, 

स्त्री पर

इसके पश्चात, 

समाज का बंटवारा हुआ, 

अमीर और गरीब के मध्य

गरीबों को वंचित रखा गया उनके अधिकारों से, 

फिर वर्ण के नाम पर 

हुआ बंटवारा, 

इस बंटवारे मे भी था 

एक और बंटवारा 

जातियों का

पुनः, समाज के नव निर्माण मे योगदान दिया, चंद विद्वानों ने, 

जिन्होंने बनाये कुछ नियम और  नियमों को दिया नाम मज़हब का.

इस तरह, साधारण से समाज को बना दिया गया 

और जटिल

जहाँ हर एक बंटवारे ने 

खड़ी की समस्या, 

जहाँ समाधान था, युद्ध 

दो अलग समूह के मध्य, 

जीता वही जिसके पास था, बल

और हारने वाली श्रेणि को हमेशा रखा गया वंचित, उनके अधिकारों से


भूपेंद्र रावत पथिक

Pathikbhupendra.co.in

Monday, June 15, 2026

इस धरा मे, सफर कितना शेष है, कोई नहीं बतायेगा

 इस धरा मे, सफर कितना शेष है, 

कोई नहीं बतायेगा


अमर रहा है क्या, कोई? 

जो तू रह जायेगा

एक दिन ये पार्थिव शरीर

इस मिट्टी के 

रंग मे मिल जायेगा

एक दिन राख बन 

चंद मुट्ठी मे समा जायेगा

फिर किस से 

अपना दर्द कहेगा

जब प्रवाह जल मे 

किया जायेगा

तेरा कर्म भी 

तेरे साथ चलेगा

अगर तू याद भी आयेगा, 

तो चंद कर्मो से जाना जायेगा

तेरा कर्म ही, 

तेरी पहचान बताएगा

कौन रखेगा तुझे याद,

 ये तो वक़्त ही बताएगा

Monday, September 8, 2025

मैं लिखूँगा तुम्हें

 मैं लिखूँगा तुम्हें


मैं गढ़ूँगा क़सीदे तुम्हारे —

तुम्हारे इतराने पर,

तुम्हारे रूठ कर चले जाने पर,

तुम्हारी मुस्कान में छुपी उजली धूप पर,

और तुम्हारे खुशी से गले लग जाने पर।


मैं लिखूँगा तुम्हें —

उस चाँदनी रात में,

जब तुम्हारी घनी ज़ुल्फ़ों में

एक मुसाफ़िर की सरसराहट

धीरे-धीरे खो जाती है।


मैं लिखूँगा तुम्हारे जज़्बातों पर,

हम दोनों के हालातों पर,

उन लम्हों पर भी

जो अनकहे रह जाते हैं।


मैं लिखूँगा हर सूक्ष्म बात,

हर नन्ही-सी अनुभूति —

जब तक कि

स्वयं का अस्तित्व नगण्य न हो जाए।

Wednesday, July 2, 2025

अब प्यार नहीं जताता कोई अब गले नहीं लगाता कोई

 अब प्यार नहीं जताता कोई

अब गले नहीं लगाता कोई


आ गए है उम्र के उस पड़ाव पर

अब अपना नहीं बनाता कोई


ये कैसी कश्मकश है मन के अंदर

अब ज़िया नहीं जलाता कोई


प्यार तो अब भी है दरमियाँ

अब वैसे नहीं जताता कोई


इस क़दर उलझ गए है जीवन के चक्रव्यूह में

महफिल मे भी तन्हा रह जाता है कोई



Thursday, June 19, 2025

नजाने किस पथ पर, चला जा रहा हूँ

 नजाने किस पथ पर, चला जा रहा हूँ

शायद कदमों को अपने, छला जा रहा हूँ

ना मंज़िल है अपनी, ना कोई ठिकाना

दाएं - बाएँ करता है, मुझे सारा ज़माना

रुक कर पथ पर, मैं बाट खोजता हूँ

आगे चलता हूँ तो, मैं फिर सोचता हूँ

चारों ओर देख कर, खुद को खरोंचता हूँ

सोचता हूँ, मंज़िल कहाँ है अपनी

चल चल कर क़दम भी अब हो गए जख्मी

नाजाने जीवन मे कैसा भ्रम है पाला

भ्रमित है जीवन, मृगतृष्णा का जाला

Monday, June 2, 2025

"पलायन"

पहाड़  हो गए खोखले,  

उनमे शेष रह गया एक जोड़ा, 

जो  ब्याह के लाया गया था, वर्षों पूर्व 

उन्होने सँजोये थे सपने 

पहाड़ को सुंदर बनाने के 

उन्होंने रचाए थे रंग

पहाड़ की मिट्टी में,

सजाया था हर पत्थर

अपनी उम्मीदों की बुनियाद से।

लेकिन वो अनभिज्ञ थे 

भविष्य के सत्य से, 

जहाँ सपनों की जड़ें

सूख जाती हैं 

बेरहम समय के सामने।

शहरों ने छीन लिए

उनके आंगन के गीत,

काम, शिक्षा, और इलाज के बहाने

पलायन कर गए उनके बीज।

उनके टूटते सपने बिखर कर 

पलायन करते रह शहरों की ओर 

काम, शिक्षा और चिकित्सा की तलाश मे, 

खेत हुए बंजर,

पानी ने छोड़ा साथ,

खेत मे शेष रह गयी 

दो सूखी टहनियाँ 

उन बुजुर्ग जोड़े की तरह 

जो अब भी देखता है 

पहाड़ों की ओर

एक नई सुबह की आस में।


भूपेंद्र रावत 

Thursday, May 29, 2025

पिता — जीवन का आधार

अंगुली पकड़कर पिता ने  चलना सिखाया,

हर ठोकर पर आगे बढ़ना सिखाया।

कंधों पे बिठा कर दुनिया को दिखाया,

हर डर को हंसी के साथ हरना सिखाया।


धूप में छाँव बने वो दरख़्त जैसे,

खुद दीपक जैसे जलकर, 

हमारे जीवन को जगमगाया । 

हर ज़िम्मेदारी को उन्होने हँसकर है निभाया,

हमारी खातिर उन्होने 

अपने सपनों को भी भुलाया।


बचपन की किलकारियों में जिनकी हँसी थी,

हर जीत में जिनकी आँखों में नमी थी।

खामोश रहकर भी बहुत कुछ कह जाते थे,

पिता... शब्दों से नहीं, अपने कर्मों से निभाते थे।


न वो कभी स्नेह जताते, न वो शिकायत करते थे,

लेकिन हर मोड़ पर हम में संबल भरते थे।

उनके कदमों के निशान ने ही तो हमें, 

हर मुश्किल से उबरना सिखाया।

जीवन की डगर में उन्होने हमें चलना सिखाया। 


पिता फ़क़त एक शब्द नहीं, 

जीवन का सार है। 

पिता हमारे जीवन का आधार है 

पिता में ही तो समाया समस्त संसार है। 



"एक समाज, अनेक बँटवारे"

  "एक समाज, अनेक बँटवारे" साधारण से दिखने वाले  समाज को चंद लोगों ने बांट दिया,अलग धड़ों मे सर्वप्रथम बंटवारा था  स्त्री और पुरुष ...