Showing posts with label कहानी. Show all posts
Showing posts with label कहानी. Show all posts

Wednesday, January 21, 2026

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा


चींटी अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके दो बच्चे थे, जो रोज़ स्कूल जाते थे।

एक दिन बच्चों ने मासूमियत से पूछा,

“पापा, हम रोज़ स्कूल क्यों जाते हैं? क्या यही ज़िंदगी है? रोज़ वही पढ़ाई, वही डाँट… अब तो कुछ नया बचा ही नहीं।”


लगातार पढ़ाई के दबाव और बड़ों की उम्मीदों से चींटी बहुत परेशान रहने लगी। उसे लगने लगा कि ज़िंदगी बस बोझ बन गई है और इससे छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं है। इन्हीं उलझनों के बीच एक दिन वह गहरी सोच में डूब गई।


उसी रात चींटी ने एक अजीब-सा सपना देखा।


सपने में उसे लगा कि वह अपने पुराने शहर से बहुत दूर, एक बिल्कुल नए शहर में पहुँच गई है। वहाँ सब कुछ अलग था—नई जगह, नए नियम, नए लोग। शुरू-शुरू में उसे यह नया शहर बहुत अच्छा लगा। कोई स्कूल नहीं, कोई डाँट नहीं, कोई पढ़ाई नहीं। उसे लगा कि यही तो वह आज़ादी है जिसकी उसे तलाश थी।


लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, हालात बदलने लगे।

नए शहर के लोग उससे सवाल करने लगे—

“तुम कौन हो? कहाँ से आई हो? यहाँ क्यों हो?”


अब उसे वहाँ तरह-तरह के काम भी करने पड़ते थे। आज़ादी अब जिम्मेदारियों में बदलने लगी। धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा कि यह जगह उतनी आसान नहीं है, जितनी शुरुआत में लगी थी।


एक दिन उस शहर में घूमने आई एक चींटी को देखकर चींटी चौंक गई।

वह उसकी पुरानी दोस्त थी!


पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। फिर हिम्मत करके उसने पूछा,

“तुम वही हो न, जो मेरे पुराने शहर में रहती हो?”


दोस्त ने मुस्कुराकर कहा,

“हाँ, मैं वही हूँ। मैं तो यहाँ घूमने आई हूँ।”


चींटी हैरान रह गई।

“घूमने? मुझे तो लगा था कि यहाँ सिर्फ वही आते हैं जो अपनी ज़िंदगी से हार मान लेते हैं।”


दोस्त ने शांत स्वर में कहा,

“नहीं चींटी, ज़िंदगी से भागना समाधान नहीं होता। हर जगह अपनी चुनौतियाँ होती हैं। फर्क बस इतना है कि हम उन्हें समझदारी से स्वीकार करते हैं या डरकर छोड़ देते हैं।”


तभी चींटी को एहसास हुआ कि वह गलत सोच रही थी।

उसे याद आया कि उसके बच्चे, उसका परिवार, और वह शहर—सब उसके अपने थे। वहाँ मुश्किलें थीं, लेकिन साथ भी था।


दोस्त ने कहा,

“चलो, अब लौटते हैं। जब समझ आ जाए, तब रास्ता हमेशा खुला होता है।”


चींटी की आँख खुल गई।

वह सपना था, लेकिन संदेश बिल्कुल साफ।


उस दिन के बाद चींटी ने बच्चों से बात की, उनकी परेशानी समझी और खुद भी समझा कि

ज़िंदगी से भागना नहीं, उसे समझकर जीना ही असली साहस है।

Wednesday, January 7, 2026

कहानी:- मैं अरावली हूँ…

 मैं अरावली हूँ…


मैं भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हूँ।

आप मुझे अरावली के नाम से जानते हैं।


मेरा जन्म तब हुआ था,

जब हिमालय ने अभी आँखें भी नहीं खोली थीं,

जब धरती जवान थी और मनुष्य का नामोनिशान तक नहीं था।


मैं दिल्ली से गुजरात तक फैली हूँ—

हरियाणा और राजस्थान मेरे आँगन हैं।

मेरी गोद में बसे गाँव,

मेरी छाया में पले लोग,

मेरी चट्टानों में छिपा जीवन—

सब मेरा परिवार हैं।


मैं ही हूँ जिसने थार मरुस्थल को रोक रखा है।

सोचो…

अगर मैं न होती तो क्या होता?


रेत की आँधियाँ दिल्ली तक पहुँच जातीं,

खेती की ज़मीन कब्रिस्तान बन जाती,

और जीवन… बस स्मृति बनकर रह जाता।


मेरे जंगलों से

वृक्ष जन्म लेते हैं,

मेरी चट्टानों से

नदियाँ निकलती हैं—

लूनी, बनास, साबरमती

मेरी धमनियाँ हैं।


मेरी मिट्टी में

बीज सिर्फ उगते नहीं,

जीवन पनपता है।


लेकिन आज…

मेरा अस्तित्व दाँव पर है।


मैंने कभी शिकायत नहीं की…


कुछ पूँजीपतियों ने

समय-समय पर

मेरा दोहन किया,

मुझे खोदा,

मुझे तोड़ा।


मैं चुप रही।


मेरे सीने पर

मशीनें चलीं,

मेरी हड्डियाँ

खनिज बनकर बिकती रहीं।


मैं फिर भी चुप रही।


मुझे गुस्सा नहीं है,

न किसी से बैर।


लेकिन मुझे डर है।


डर उन

बेबस पशु-पक्षियों का,

जिनका घर मेरी दरारों में है।


डर उन

दूर-दराज़ के गाँवों का,

जिनकी हर बूँद पानी

मुझसे होकर जाती है।


डर उन

बच्चों का,

जिनका भविष्य

मेरे अस्तित्व से जुड़ा है।


जब मुझे टुकड़ों में बाँट दिया गया…


सुना है—

100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों

को अरावली मानने से

इन्कार कर दिया गया है।


पर क्यों?


क्या मेरी पहचान

सिर्फ ऊँचाई से होती है?


क्या कोई माँ

अपने छोटे बच्चे को

परिवार से निकाल देती है?


वो पहाड़ियाँ भी

मेरे शरीर का हिस्सा हैं।

मेरी नसें हैं।

मेरी साँसें हैं।


पर कुछ तथाकथित विद्वानों ने कहा—

“ये अरावली नहीं हैं।”


नहीं…

वो विद्वान नहीं थे।


वो उद्योगपति थे।


जिन्होंने

अपने स्वार्थ के लिए

नक्शे बदले,

परिभाषाएँ बदलीं,

और प्रकृति को

कानूनी भाषा में

कमज़ोर कर दिया।


जब न्याय भी मौन हो गया…


आप पूछते हैं—

सरकार कुछ क्यों नहीं करती?


क्योंकि यह निर्णय

न्यायालय से आया है।


जिसे आप

न्याय की मूर्ति कहते हैं।


लेकिन जब

कानून

प्रकृति से बड़ा हो जाए,

तो समझो—

कुछ बहुत गलत हो रहा है।


आज

भगवान की बनाई रचना

को

इंसानों के फैसले

गलत ठहरा रहे हैं।


GSM का टूटता संतुलन


मैं सिर्फ पहाड़ नहीं हूँ।


मैं हूँ—


G – Groundwater (भूजल)


S – Soil (मिट्टी)


M – Mountain (पर्वत)


जब मुझे काटा जाता है,

तो भूजल नीचे चला जाता है।


जब मेरी मिट्टी उड़ती है,

तो खेती मर जाती है।


जब मैं टूटती हूँ,

तो पूरा पारिस्थितिक तंत्र

बिखर जाता है।


GSM का संतुलन

जब टूटता है,

तो सिर्फ जंगल नहीं मरते—

सभ्यताएँ मरती हैं।


मैं शिकायत नहीं कर रही…


मैं आपसे

लड़ने को नहीं कह रही।


मैं बस पूछ रही हूँ—


जब मैं नहीं रहूँगी,

तो आप कहाँ रहेंगे?


जब नदियाँ सूख जाएँगी,

तो विकास किस पर खड़ा होगा?


जब धरती बंजर होगी,

तो मुनाफ़ा किस काम आएगा?


मैं अरावली हूँ…


शायद आने वाली पीढ़ियाँ

मुझे किताबों में पढ़ें—


“कभी एक पर्वत श्रृंखला थी…”


काश,

उस ‘कभी’ से पहले

आप मुझे

आज बचा लें।

Thursday, November 20, 2025

एक साधारण बच्चा, जिसने दुनिया बदल दी

 एक साधारण बच्चा, जिसने दुनिया बदल दी 


हम सब विविधता से घिरे हुए हैं। हर कक्षा में हमें तरह-तरह के बच्चे देखने को मिलते हैं—कोई अमीर, कोई गरीब; कोई बहुत तेज, तो कोई थोड़ा धीमा। लेकिन इन सबके बीच एक बात समान होती है—हर बच्चा अपने भीतर एक छिपी हुई प्रतिभा लिए रहता है।

आज की कहानी भी ऐसे ही एक बच्चे की है, जिसे पढ़ाई में “आलसी” और “लापरवाह” कहकर अक्सर अनदेखा किया जाता था। उसके स्कूल में शिक्षक भी उससे परेशान रहते थे, और आखिरकार एक दिन उसे स्कूल से निकाल दिया गया।

उसकी माँ ने मजबूरी में उसे खेतों में काम पर लगा दिया। लेकिन खेती से उसे बेहद नफ़रत थी। उसका मन तो कहीं और था—इतिहास, विज्ञान और दुनिया को समझने की ओर। वह खेतों में काम करता जरूर था, लेकिन उसका मन हमेशा जिज्ञासा और सवालों से भरा रहता था।

फिर भी उसने हार नहीं मानी। परिस्थितियाँ उसके खिलाफ थीं, लेकिन उसका धैर्य उसके साथ था। धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई में रुचि बढ़ने लगी। वह देर रात तक बैठकर किताबें पढ़ता, नोट्स बनाता, और खुद से नए-नए प्रयोग करता।

समय बीतता गया और किसी तरह उसने बारहवीं की परीक्षा पास कर ली। आगे की पढ़ाई आसान नहीं थी—घर की आर्थिक हालत बहुत खराब थी। लेकिन उसकी मेहनत और लगन ने उसे हार नहीं मानने दी। उसने कॉलेज में दाखिला भी लिया और साथ ही अपने खर्चों को पूरा करने के लिए छोटे-मोटे काम भी करने लगा।

दिन में काम, रात में पढ़ाई—वह थकता जरूर था, लेकिन रुकता कभी नहीं था।

इसी बीच एक दिन एक बड़ी समस्या पूरे देश पर छा गई। हालात इतने खराब थे कि लोग भविष्य को लेकर असमंजस में थे। लेकिन वह युवक फिर भी अपने सपनों पर डटा रहा। इसी कठिन दौर में उसके मन में कई वैज्ञानिक विचार जन्म लेने लगे।

इन्हीं सोच-विचारों और अथक मेहनत के बीच उसने कुछ ऐसे अद्भुत अविष्कार किए, जिन्होंने पूरे संसार को बदल दिया।

उसने देखा—एक सेब पेड़ से गिरा…

दूसरों के लिए यह आम बात थी, लेकिन उसके भीतर सवाल उठा—आख़िर सेब नीचे ही क्यों गिरता है? ऊपर क्यों नहीं जाता?

यहीं से जन्म हुआ गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का।

उसने गणित को एक नया रूप दिया…

समस्याओं को हल करने के लिए उसने एक बिल्कुल नई शाखा बनाई—

कैलकुलस — जिसने विज्ञान, गणित और इंजीनियरिंग को नया जीवन दे दिया।

प्रकाश को समझने के नए तरीके खोजे…

उसने पाया कि सफेद प्रकाश सात रंगों का मिश्रण है।

यह खोज प्रकाशिकी (Optics) की दुनिया में क्रांति थी।

धीरे-धीरे वह साधारण सा बच्चा ऐसा वैज्ञानिक बन गया जिसने दुनिया को नया दृष्टिकोण दिया। उसकी मेहनत, जिज्ञासा और धैर्य ने असंभव को संभव बना दिया।

वह बच्चा और कोई नहीं, बल्कि सर आइज़क न्यूटन थे—जिन्होंने इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवा दिया।

कहानी की सीख


कभी-कभी सबसे साधारण दिखने वाले बच्चे भी असाधारण काम कर जाते हैं। बस जरूरत है—

✔ उनके मन की रुचि समझी जाए

✔ उन्हें सही दिशा दी जाए

✔ और उनका उत्साह कभी टूटने न दिया जाए


हर बच्चे में एक चमक होती है।

अगर हम उसे पहचान लें—

तो वही बच्चा दुनिया को रोशन कर सकता है।

Saturday, October 4, 2025

रूस की क्रांति की कहानी

बहुत समय पहले यूरोप में फ़्रांस की क्रांति हुई थी। उस क्रांति से पूरे यूरोप में बदलाव की लहर चली। लोग समझने लगे कि केवल राजा और रईसों के पास ही ताक़त क्यों हो? आम जनता को भी बराबरी और अधिकार क्यों न मिलें?


इसी समय अलग-अलग विचार सामने आए –


Conservative (रूढ़िवादी) लोग कहते थे कि पुराना ही सबसे अच्छा है। राजा और चर्च (धर्म) को छेड़ना नहीं चाहिए।


Liberal (उदारवादी) लोग चाहते थे कि राजा की ताक़त कम हो और संसद बने, जहाँ जनता की भी आवाज़ सुनी जाए।


Radical (कट्टरपंथी) लोग मानते थे कि सिर्फ़ संसद से काम नहीं चलेगा, असली बदलाव तब होगा जब अमीर-ग़रीब का फ़र्क़ मिटे और सबको बराबरी मिले।


धीरे-धीरे उद्योग (Industry) बढ़ने लगे। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियाँ बनीं। इससे एक नया वर्ग पैदा हुआ – मज़दूर वर्ग। ये लोग दिन-रात मेहनत करते थे, लेकिन मालिक अमीर होते गए और मज़दूर ग़रीब ही रहे। दूसरी ओर किसान भी बहुत परेशान थे, क्योंकि उन पर कर (tax) ज़्यादा था और जीवन कठिन था।


इन्हीं हालात में एक विचारक सामने आए – कार्ल मार्क्स (Karl Marx)। उन्होंने कहा कि असली ताक़त मेहनत करने वालों – यानी मज़दूरों और किसानों – के पास है। अगर वे मिलकर खड़े हो जाएँ तो दुनिया बदल सकती है। उनके विचारों ने रूस और यूरोप के बहुत से लोगों को प्रभावित किया।


अब रूस की तरफ़ आते हैं। वहाँ का राजा Tsar (ज़ार) कहलाता था। उसके पास पूरी ताक़त थी, लेकिन जनता ग़रीबी और भूख से जूझ रही थी। फिर आया प्रथम विश्व युद्ध (First World War, 1914)। इस युद्ध ने रूस की स्थिति और खराब कर दी। सैनिक भूखे और ठंड से मर रहे थे, घरों में अन्न की कमी थी और लोग परेशान थे।


आख़िरकार, साल 1917 में रूस की जनता सड़कों पर उतर आई। उन्होंने कहा –

“हमें रोटी चाहिए, हमें काम चाहिए और हमें बराबरी चाहिए।”


इस समय सोशलिस्ट नेताओं ने जनता का नेतृत्व किया। इनमें सबसे बड़े नेता थे लेनिन (Lenin)। उन्होंने कहा कि अब Tsar का शासन ख़त्म होगा और मज़दूरों-किसानों की सरकार बनेगी। जनता ने उनका साथ दिया और Tsar को गद्दी छोड़नी पड़ी। रूस में एक नई व्यवस्था शुरू हुई – सोवियत व्यवस्था (Soviet System), जहाँ फैक्ट्रियाँ, ज़मीन और संसाधन सबकी साझी संपत्ति मानी गईं।


लेकिन बाद में, जब स्टालिन (Stalin) नेता बने, तो उन्होंने देश को मज़बूत बनाने के लिए बहुत सख़्ती अपनाई। उन्होंने तेज़ी से उद्योग लगाए और खेती को भी सरकार के हाथ में ले लिया। कुछ लोग खुश थे कि रूस मज़बूत बन रहा है, लेकिन बहुत से लोग उनकी सख़्ती और डर से परेशान भी हुए।


इस तरह रूस की क्रांति ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि अगर जनता मिलकर खड़ी हो, तो राजा और अन्याय को हटा सकती है। यह क्रांति केवल रूस ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में समानता और अधिकारों के लिए लड़ाई की प्रेरणा बन गई।


भूपेंद्र रावत

संजय गांधी मेमोरियल सीनियर सेकेंडेरी स्कूल, लाडवा, कुरुक्षेत्र 

Monday, February 24, 2025

माँ का प्यार: सबसे बड़ा खजाना

एक दिन, एक छोटा बच्चा स्कूल से घर लौटता है। उसका चेहरा उदासी और गुस्से से भरा हुआ था। घर पहुँचते ही उसने अपनी मम्मी से शिकायत भरे लहजे में कहा,

"माँ, आज मेरे दोस्त ने मुझे बताया कि उसके मम्मी-पापा उसे हर दिन नए खिलौने दिलाते हैं। उनके पास हर वो चीज़ है जो वो चाहता है। लेकिन आप लोग हमेशा बहाने बना लेते हो या फिर कहते हो कि बाद में दिलाएँगे। उनके मम्मी-पापा कितने अच्छे हैं और आप लोग तो कभी भी मेरी बात नहीं मानते। आप लोग तो बिल्कुल भी अच्छे नहीं हो!"

यह सुनकर माँ का दिल टूट गया। गुस्से और दुख के मिलेजुले भाव से माँ ने कहा,

"अगर तुझे ऐसा लगता है कि हम अच्छे नहीं हैं, तो बेटा, तुम अपने दोस्त के घर ही चले जाओ।"

बच्चा चुपचाप अपने कमरे में चला गया। कुछ समय बाद, माँ ने देखा कि बच्चा रो रहा है। वह उसके पास गई, उसका सिर सहलाया और धीरे से बोली,

"बेटा, क्या तुम जानते हो कि हम तुम्हारे लिए कितनी मेहनत करते हैं? तुम्हारे पापा दिन-रात काम करते हैं ताकि तुम्हारी ज़रूरतें पूरी कर सकें। हम तुम्हारे हर सपने को पूरा करना चाहते हैं, लेकिन कभी-कभी हमारे पास उतने पैसे नहीं होते। इसका मतलब यह नहीं कि हम तुम्हें प्यार नहीं करते। हमारे लिए सबसे बड़ा खजाना तुम्हारी खुशी और मुस्कान है।"

बच्चा माँ की बात सुनकर चुप हो गया। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने माँ को गले लगाते हुए कहा,

"माँ, मुझे माफ कर दो। मुझे अब समझ आ गया कि आप और पापा ही सबसे अच्छे हैं। आप लोग मेरे लिए हर दिन कितनी मेहनत करते हो। मैं अब कभी ऐसी बात नहीं कहूँगा।"

माँ ने प्यार से उसे गले लगाते हुए कहा,

"बेटा, हमारा प्यार उन खिलौनों से कहीं बड़ा है जो तुम्हें कभी भी खरीद कर नहीं मिल सकता।"

______________

सीख:

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि माता-पिता का प्यार और उनकी मेहनत सबसे बड़ा उपहार होती है। भौतिक वस्तुएं तो समय के साथ खो जाती हैं, लेकिन माता-पिता का समर्पण और त्याग हमेशा हमारे जीवन में अमूल्य रहता है।

Sunday, February 23, 2025

प्रेरणादायक कहानी: आदर्शों की तस्वीरें

 प्रेरणादायक कहानी: आदर्शों की तस्वीरें    https://youtu.be/Qky6pG2cIL8



एक दिन, एक छोटा बच्चा अपने घर की दीवार पर टंगी तस्वीरों को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसने देखा कि उसके मम्मी-पापा हर दिन एक विशेष तस्वीर के सामने दीप जलाते हैं और हाथ जोड़कर पूजा करते हैं।

थोड़ी देर बाद, उसने जिज्ञासावश अपनी माँ से पूछा,

"माँ, आप लोग इस तरफ टंगी हुई फोटो की पूजा करते हो, लेकिन दूसरी तरफ टंगी हुई फोटो की क्यों नहीं करते?"

माँ और पापा दोनों ही उसके सवाल से हैरान रह गए। माँ ने प्यार से बेटे को पास बुलाया और बोली,

"बेटा, जिन तस्वीरों की हम पूजा करते हैं, वे हमारे भगवान हैं। हम उनसे आशीर्वाद मांगते हैं और उनका सम्मान करते हैं।"

बेटा फिर मासूमियत से बोला,

"और दूसरी तरफ की तस्वीरों का क्या मतलब है?"

इस बार पापा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,

"बेटा, ये तस्वीरें उन महान लोगों की हैं जो हमारे जैसे ही इंसान थे, लेकिन अब इस दुनिया में नहीं हैं।"

बच्चा थोड़ी देर तक सोच में पड़ गया और फिर पूछा,

"अगर वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, तो फिर हमने उनकी तस्वीरें घर में क्यों लगाई हैं?"

पापा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए समझाया,

"बेटा, ये लोग हमारे देश और समाज के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। इन्होंने अपने जीवन में ऐसे महान कार्य किए, जिनकी वजह से हमारा देश आगे बढ़ा। ये हमारे आदर्श हैं। उनकी तस्वीरें हमंम यह याद दिलाती हैं कि हमें भी उनके बताए रास्तों पर चलना चाहिए और अच्छा इंसान बनना चाहिए।"

बच्चा अब समझ गया था। उसने गहरी साँस लेते हुए कहा,

"तो मतलब हमें भगवान से आशीर्वाद लेना चाहिए और इन महान लोगों से प्रेरणा?"

माँ-पापा दोनों ने खुशी से सिर हिलाया।

उस दिन उस बच्चे ने न केवल तस्वीरों के महत्व को समझा, बल्कि यह भी जाना कि भगवान हमें सही मार्ग दिखाते हैं, और हमारे आदर्श हमें उस मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

सीख:

यह कहानी सिखाती है कि बच्चों की जिज्ञासाएँ कभी-कभी हमें जीवन की बड़ी सच्चाइयों को समझाने का अवसर देती हैं। यह भी बताती है कि भगवान से आशीर्वाद और आदर्शों से प्रेरणा लेकर ही हम सही मायनों में जीवन को सफल बना सकते हैं।

https://youtu.be/Qky6pG2cIL8https://youtu.be/Qky6pG2cIL8

पाथिक (भूपेंद्र)

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा चींटी अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके दो बच्चे थे, जो रोज़ स्कूल जाते थे। एक दिन बच्चों ने मासूमियत से ...