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Wednesday, January 7, 2026

एनसीईआरटी(NCERT) को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा: भारतीय शिक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम

 एनसीईआरटी को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा: भारतीय शिक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम


राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) अब तक देश में स्कूली शिक्षा की रीढ़ मानी जाती रही है। पाठ्यक्रम निर्माण, शैक्षिक अनुसंधान, शिक्षकों के प्रशिक्षण और कक्षा 1 से 12 तक की गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से एनसीईआरटी ने दशकों से भारतीय शिक्षा को दिशा दी है। अब भारत सरकार द्वारा एनसीईआरटी को डीम्ड विश्वविद्यालय (Deemed to be University) का दर्जा दिया जाना शिक्षा व्यवस्था में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।


एनसीईआरटी की भूमिका में ऐतिहासिक विस्तार

डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद एनसीईआरटी अब केवल पाठ्यपुस्तकें तैयार करने वाली संस्था नहीं रहेगी, बल्कि यह उच्च शिक्षा और पेशेवर पाठ्यक्रमों के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा सकेगी। इससे पहले जो पाठ्यक्रम देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तक सीमित थे, अब उन्हें एनसीईआरटी जैसे राष्ट्रीय स्तर के शैक्षिक निकाय द्वारा संचालित किया जा सकेगा।


नए पाठ्यक्रमों की संभावनाएँ

  • इस नए दर्जे के साथ एनसीईआरटी अब:
  • शिक्षक शिक्षा (Teacher Education) में डिग्री और डिप्लोमा कोर्स
  • शिक्षा में शोध आधारित स्नातकोत्तर कार्यक्रम
  • पाठ्यक्रम विकास, मूल्यांकन, शैक्षिक तकनीक और डिजिटल शिक्षा से जुड़े कोर्स
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप बहुविषयक (Multidisciplinary) कार्यक्रम
  • शुरू कर सकेगी। इससे शिक्षा के क्षेत्र में व्यावहारिक, शोध-आधारित और नीति-संगत मानव संसाधन तैयार होगा।
  • शिक्षा की गुणवत्ता और एकरूपता को मजबूती
  • एनसीईआरटी का मूल उद्देश्य पूरे देश में शिक्षा के स्तर को समान और गुणवत्तापूर्ण बनाना रहा है। डीम्ड विश्वविद्यालय बनने से यह उद्देश्य और मजबूत होगा क्योंकि:
  • शिक्षक और शिक्षाविद सीधे उसी संस्था से प्रशिक्षित होंगे जो पाठ्यक्रम बनाती है
  • सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई कम होगी
  • शिक्षा सुधार से जुड़े निर्णय अधिक शोध-आधारित और ज़मीनी हकीकत से जुड़े होंगे
  • छात्रों और शिक्षकों के लिए लाभ
  • यह निर्णय विशेष रूप से उन छात्रों और शिक्षकों के लिए लाभकारी है जो:
  • शिक्षा को करियर के रूप में अपनाना चाहते हैं
  • शैक्षिक शोध और नीति निर्माण में योगदान देना चाहते हैं
  • विश्वसनीय, राष्ट्रीय स्तर की संस्था से डिग्री प्राप्त करना चाहते हैं
  • साथ ही, इससे निजी संस्थानों पर निर्भरता भी कम होगी और शिक्षा अधिक सुलभ व किफायती बन सकेगी।

निष्कर्ष

एनसीईआरटी को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भविष्य में निवेश है। यह कदम शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण को एक ही मंच पर लाकर भारत को वैश्विक शैक्षिक मानचित्र पर और सशक्त बनाएगा। निश्चित ही, आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव देश की कक्षाओं से लेकर नीति-निर्माण तक स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।

Wednesday, December 31, 2025

शिक्षक के जीवन का चक्र

 शिक्षक के जीवन का चक्र


शिक्षक का जीवन एक ऐसे मार्ग की तरह होता है जो स्वयं अपनी जगह स्थिर रहता है, लेकिन अपने छात्रों को उनके गंतव्य तक पहुँचा देता है। उसका जीवन चक्र लगभग जीवन भर एक-सा चलता रहता है—निरंतर, शांत और समर्पित।


हर दिन वह भी एक छात्र की तरह अपना झोला उठाकर विद्यालय जाता है। वहाँ बच्चों को पढ़ाता है, उन्हें दिशा देता है और दिन के अंत में उनसे कुछ न कुछ सीखकर ही लौटता है। क्योंकि शिक्षण केवल सिखाने का नहीं, बल्कि सीखते रहने का भी व्यवसाय है। जो शिक्षक सीखना छोड़ देता है, वह अपने पेशे में अधिक समय तक टिक नहीं सकता।


शिक्षक और छात्र का संबंध रेलवे की दो पटरियों जैसा है—दोनों साथ-साथ चलते हैं। यदि एक भी पटरी कमजोर हो जाए, तो पूरी गाड़ी पटरी से उतर सकती है। इसी तरह शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक, छात्र, अभिभावक और समाज—सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं।


जब कोई छात्र असफल होता है, तो उस असफलता की जिम्मेदारी अक्सर एक-दूसरे पर डाल दी जाती है। कई बार अभिभावक अपने बच्चे की असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं, जबकि उन्हें पूरे छात्र समुदाय की चिंता नहीं होती—सिर्फ अपने बच्चे की होती है।


लेकिन शिक्षक ही एक ऐसा व्यक्ति है जो हर छात्र को समान रूप से अपनी जिम्मेदारी मानता है। एक भी बच्चे की असफलता उसे भीतर तक खटकती है। वह स्वयं से प्रश्न करता है—शायद मैं उसे ठीक से समझ नहीं पाया, शायद कहीं मेरी ही कमी रह गई।


विडंबना यह है कि छात्र की असफलता का दोष तो अक्सर शिक्षक को दे दिया जाता है, लेकिन उसकी सफलता का श्रेय शिक्षक को जीवन भर नहीं मिल पाता। वह सम्मान का अधिकारी होते हुए भी समाज, अभिभावकों और व्यवस्था से तिरस्कार ही पाता है।


आज के समय में, जब शिक्षण को कुछ लोग केवल “चुटकी बजाने” जितना आसान समझने लगे हैं, तब शिक्षक का संघर्ष और अधिक गहरा हो गया है। फिर भी वह बिना शिकायत किए, निस्वार्थ भाव से, पीढ़ियों को गढ़ने का कार्य करता रहता है।


शायद यही शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान है—

खुद पीछे रहकर, दूसरों को आगे बढ़ाना।

Sunday, December 28, 2025

अरावली पर्वत श्रृंखला : इतिहास, जीवन, पर्यावरण और वर्तमान चुनौतियाँ

 अरावली पर्वत श्रृंखला : इतिहास, जीवन, पर्यावरण और वर्तमान चुनौतियाँ

अरावली पर्वत श्रृंखला का इतिहास

अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत प्रणालियों में से एक मानी जाती है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार इसकी उत्पत्ति लगभग 250 से 300 करोड़ वर्ष पहले हुई थी, जब पृथ्वी की सतह अभी अपने प्रारंभिक विकास के चरण में थी। यह पर्वतमाला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली हुई है। प्राचीन काल में अरावली पर्वत न केवल एक प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करता था, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु, वर्षा व्यवस्था और नदियों के प्रवाह को भी नियंत्रित करता था। इतिहास में यह क्षेत्र अनेक सभ्यताओं, जनजातियों और राजवंशों का आश्रय रहा है। अरावली के आसपास बसे क्षेत्र प्राचीन व्यापार मार्गों, सांस्कृतिक संपर्कों और युद्धों के साक्षी रहे हैं।


अरावली पर लोगों की निर्भरता

अरावली पर्वत श्रृंखला पर और इसके आसपास रहने वाले लोगों का जीवन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़ा हुआ है। ग्रामीण समुदायों की आजीविका खेती, पशुपालन, वनोपज संग्रह और पारंपरिक जल स्रोतों पर निर्भर रही है। अरावली की पहाड़ियों में मौजूद जंगल ईंधन, चारा, औषधीय पौधे और छोटी लकड़ी प्रदान करते हैं। यहाँ की चट्टानें वर्षा जल को रोककर धीरे-धीरे भूजल में परिवर्तित करती हैं, जिससे कुएँ, बावड़ियाँ और हैंडपंप लंबे समय तक जलयुक्त रहते हैं। शहरों में रहने वाले लोग भी अरावली से मिलने वाली स्वच्छ हवा, भूजल पुनर्भरण और तापमान संतुलन का लाभ उठाते हैं, भले ही उन्हें इसका प्रत्यक्ष एहसास न हो।


पर्यावरण के लिए अरावली का महत्व

अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ मानी जाती है। यह मरुस्थलीकरण को रोकने में एक प्राकृतिक दीवार की तरह कार्य करती है और थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है। अरावली के जंगल जैव विविधता का भंडार हैं, जहाँ अनेक पक्षी, पशु, सरीसृप और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। यह पर्वतमाला दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्रों के लिए एक प्राकृतिक ‘ग्रीन लंग’ की तरह काम करती है, जो वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक है। इसके अतिरिक्त, अरावली मानसून के दौरान वर्षा जल को रोककर बाढ़ और मृदा अपरदन को नियंत्रित करती है।


सरकार द्वारा अरावली क्षेत्र में कटान और खनन के कारण

सरकार द्वारा अरावली क्षेत्र में पहाड़ियों की कटाई या खनन की अनुमति दिए जाने के पीछे मुख्य तर्क विकास, आधारभूत ढांचे की आवश्यकता और खनिज संसाधनों का उपयोग बताया जाता है। सरकार का कहना है कि कई स्थानों पर अरावली की ऊँचाई 100 मीटर से कम है, इसलिए उन्हें कानूनी रूप से ‘पर्वत’ की श्रेणी में नहीं माना जाता। इसके आधार पर निर्माण कार्य, सड़कें, रियल एस्टेट परियोजनाएँ और खनन गतिविधियाँ वैध ठहराई जाती हैं। इसके अलावा, शहरीकरण, आवासीय जरूरतों और रोजगार सृजन को भी एक प्रमुख कारण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।


अरावली के कटान से स्थानीय लोगों को होने वाला नुकसान

अरावली की पहाड़ियों के कटने से सबसे अधिक प्रभाव स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी समुदायों पर पड़ता है। जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे खेती और पशुपालन संकट में आ जाते हैं। जंगलों के नष्ट होने से ईंधन, चारा और पारंपरिक आजीविका के साधन समाप्त हो जाते हैं। भूमि का कटाव बढ़ता है, जिससे खेत बंजर होने लगते हैं और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। सामाजिक असंतुलन और आर्थिक असुरक्षा भी इसी प्रक्रिया का परिणाम होती है।


पर्यावरण और पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव

हालाँकि अरावली की अधिकांश पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम ऊँची हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका पर्यावरणीय महत्व कम है। ये छोटी-छोटी पहाड़ियाँ मिलकर एक विशाल पारिस्थितिक तंत्र बनाती हैं। इनके नष्ट होने से भूजल स्तर तेजी से गिरता है, तापमान बढ़ता है और वायु प्रदूषण में वृद्धि होती है। लंबे समय में यह जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को और तेज कर सकता है। अरावली के कमजोर होने से थार मरुस्थल का विस्तार हो सकता है, जिसका प्रभाव केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की जलवायु पर पड़ेगा।


अरावली को बचाने के लिए लोगों के प्रयास

अरावली को बचाने के लिए पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों, स्थानीय समुदायों और कुछ जागरूक नागरिकों द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कई जन आंदोलन अवैध खनन और जंगलों की कटाई के खिलाफ खड़े हुए हैं। न्यायालयों में जनहित याचिकाएँ दायर की गई हैं, जिनके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में खनन पर रोक भी लगी है। वृक्षारोपण अभियान, जनजागरूकता कार्यक्रम और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक मंचों पर अरावली के महत्व को लेकर चर्चा बढ़ रही है, जो भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है।


निष्कर्ष

अरावली पर्वत श्रृंखला केवल चट्टानों और पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत के जीवन, संस्कृति और पर्यावरण की आधारशिला है। अल्पकालिक विकास और आर्थिक लाभ के लिए इसके दीर्घकालिक महत्व को नजरअंदाज करना पृथ्वी और मानव समाज दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि अरावली आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवनदायिनी बनी रहे।

Saturday, December 13, 2025

परीक्षा तनाव : कारण, पहचान और समाधान

परीक्षा तनाव : कारण, पहचान और समाधान

छात्रों में परीक्षा के दौरान तनाव होना स्वाभाविक है। यह तनाव इस बात का संकेत भी है कि छात्र अपने भविष्य को लेकर गंभीर है। लेकिन यह बिल्कुल भी सत्य नहीं है कि इस तनाव से निपटा नहीं जा सकता। यदि छात्र पूरी तैयारी, सही मार्गदर्शन और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़े, तो वह इस तनाव को सरलता से नियंत्रित कर सकता है।
परंतु कई बार यह तनाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि अर्थ का अनर्थ हो जाता है और वहीं से उन सपनों के टूटने की शुरुआत हो जाती है, जिन्हें छात्र और उनके अभिभावक वर्षों से संजोते आए होते हैं।

आज के वर्तमान युग में तनाव की बात तो सभी करते हैं, लेकिन इसके वास्तविक कारणों और समाधान पर खुलकर चर्चा बहुत कम होती है। विशेष रूप से वे अभिभावक, जो अपने बच्चों की रुचि, क्षमता और मानसिक स्थिति को समझे बिना समाज के दबाव में उन्हें शिक्षा और प्रतियोगिता की फैक्ट्रियों में एक मशीन की तरह झोंक देते हैं।
ऐसे अभिभावकों को बच्चों से एक प्रॉडक्ट की तरह सबसे अधिक अंकों की अपेक्षा होती है। अभिभावकों के अधूरे सपनों का बोझ ढोते-ढोते बच्चे घुटन और तनाव में जीने को मजबूर हो जाते हैं, जिसका परिणाम कई बार अत्यंत घातक रूप में सामने आता है।
यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि अपने सपनों का बोझ बच्चों पर थोपना कहाँ तक उचित है? इसका उत्तर वे अभिभावक बेहतर दे सकते हैं जिन्होंने इसका दुष्परिणाम स्वयं झेला है।

छात्रों में तनाव के मुख्य कारण

आधुनिक तकनीक का अत्यधिक उपयोग – मोबाइल, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम पढ़ाई से ध्यान भटकाते हैं।

समय पर तैयारी न करना – पाठ्यक्रम को अंतिम समय के लिए छोड़ देना।

टालमटोल की आदत – आज का काम कल पर छोड़ने की प्रवृत्ति।

बढ़ती प्रतिस्पर्धा – हर क्षेत्र में तीव्र प्रतियोगिता।

अभिभावकों और शिक्षकों का नकारात्मक रवैया – बार-बार तुलना और ताने।

अत्यधिक अपेक्षाएँ – बच्चे की क्षमता से अधिक उम्मीदें रखना।

तनाव की पहचान कैसे करें

बार-बार चिड़चिड़ापन या गुस्सा

नींद न आना या अधिक सोना

पढ़ाई से डर या अरुचि

आत्मविश्वास में कमी

सिरदर्द, पेट दर्द या थकान

खुद को दूसरों से कमतर समझना

यदि समय रहते इन संकेतों को पहचाना जाए, तो बड़ी समस्या से बचा जा सकता है।

तनाव से निपटने के समाधान

समय प्रबंधन – नियमित अध्ययन योजना बनाना।

वास्तविक लक्ष्य निर्धारण – क्षमता के अनुसार लक्ष्य तय करना।

ब्रेक और विश्राम – पढ़ाई के साथ खेल, योग और मनोरंजन।

सकारात्मक सोच – असफलता को सीख के रूप में स्वीकार करना।

संवाद – अपनी समस्या किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करना।

स्वस्थ दिनचर्या – संतुलित आहार और पर्याप्त नींद।

अभिभावकों के लिए सुझाव

बच्चों की तुलना दूसरों से न करें।

उनकी रुचि और क्षमता को समझें।

अंकों से अधिक प्रयास और ईमानदारी को महत्व दें।

असफलता में भी बच्चे का साथ दें।

संवाद का वातावरण बनाए रखें, डर का नहीं।

शिक्षकों के लिए सुझाव

छात्रों के प्रति संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखें।

केवल परिणाम नहीं, बल्कि प्रक्रिया को महत्व दें।

कमजोर छात्रों को हतोत्साहित नहीं, प्रेरित करें।

पढ़ाई को बोझ नहीं, सीखने का आनंद बनाएं।

निष्कर्ष

परीक्षा जीवन का एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन यही जीवन नहीं है। यदि छात्र, अभिभावक और शिक्षक मिलकर सकारात्मक वातावरण बनाएं, तो परीक्षा का तनाव एक समस्या नहीं बल्कि आत्मविकास का अवसर बन सकता है।
याद रखें—सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन।

Wednesday, November 26, 2025

अच्छी आदतें निर्माण में अभिभावकों की भूमिका

 अच्छी आदतें निर्माण में अभिभावकों की भूमिका

— बच्चे वही बनते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं


अभिभावक हमेशा चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे गुणों वाले, सभ्य, जिम्मेदार और समाज के योग्य नागरिक बनें। वे यह भी उम्मीद करते हैं कि बच्चे भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना मजबूती से कर सकें और स्वयं को सुरक्षित रख सकें। लेकिन यह सोचने वाली बात है कि क्या यह सब बिना अभिभावकों के सहयोग और मार्गदर्शन के संभव है? इसका उत्तर स्पष्ट रूप से—नहीं है।


बच्चा एक कोरा पन्ना होता है


हर बच्चा जन्म के समय एक कोरे पन्ने की तरह होता है। उस पन्ने पर कैसी बातें लिखी जाएँगी, किस प्रकार की आदतें और व्यवहार उसमें विकसित किए जाएँगे—यह बहुत हद तक अभिभावकों पर निर्भर करता है।

हालाँकि यह भी सच है कि बच्चे अपने आस-पास के वातावरण से बहुत कुछ सीखते हैं, लेकिन घर उनके मूल संस्कारों की पहली पाठशाला होता है।


बच्चों को रोकना समाधान नहीं, समझाना आवश्यक है


आज के समय में बच्चों को हर जगह जाने या हर चीज़ देखने से रोक पाना संभव नहीं है। परंतु सही समय पर सही बातों को समझाकर हम उन्हें उन आदतों से बचा सकते हैं जो उनके व्यवहार और व्यक्तित्व पर गलत प्रभाव डाल सकती हैं।

सिर्फ परिणाम बताना काफी नहीं होता—उन्हें परिणाम + उससे बचने के तरीके दोनों बताने चाहिए।


पहले अभिभावक स्वयं आदर्श बनें


यह सुनिश्चित करना बहुत आवश्यक है कि जिस आदत के बारे में अभिभावक अपने बच्चों को समझा रहे हैं, वे स्वयं उस आदत से दूर रहें।

अक्सर देखने में आता है कि:


अभिभावक बच्चों से बार-बार कहते हैं—“पढ़ाई करो”, लेकिन स्वयं किताबें नहीं पढ़ते।


बच्चे को फोन से दूर रहने की सलाह देते हैं, लेकिन खुद घंटों मोबाइल में व्यस्त रहते हैं।


ऐसी स्थितियों में बच्चे यह सोचते हैं कि जो काम बड़े कर रहे हैं, वही सही है। यदि अभिभावक स्वयं ही अच्छी आदतों को नहीं अपनाएँगे, तो बच्चों में अच्छी आदतें कैसे विकसित होंगी?


बच्चे उदाहरण से सीखते हैं, निर्देश से नहीं


यह याद रखने की ज़रूरत है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं, न कि जो वे सुनते हैं।

वही पौधा सही दिशा में बढ़ता है जिसकी देखभाल माली सही ढंग से करता है।

इसी प्रकार बच्चे भी तभी आदर्श बनते हैं जब अभिभावक स्वयं आदर्श प्रस्तुत करें।


यदि हम चाहते हैं कि बच्चे अच्छे नागरिक बनें, जीवन की चुनौतियों को समझदारी से संभालें और सही रास्ता चुनें, तो पहले हमें—अभिभावकों को—अपने व्यवहार, आदतों और दिनचर्या को सुधारना होगा।

बच्चों के सपनों को पंख देने के लिए पहले हमें अपना आकाश साफ करना होगा।

Saturday, November 22, 2025

मानसिक शोषण, आत्महत्या और हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी

 मानसिक शोषण, आत्महत्या और हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी


हाल ही में दिल्ली मेट्रो में घटी उस दर्दनाक घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया, जिसमें मात्र 14 वर्ष के एक बच्चे ने मेट्रो के सामने कूदकर अपनी जान दे दी। यह घटना न सिर्फ भयावह है, बल्कि कई गहरे प्रश्न भी छोड़ जाती है। किसी मासूम बच्चे को आख़िर ऐसा कौन-सा दुःख, दबाव या मानसिक बोझ ने घेर लिया होगा कि उसने जीवन जैसा अनमोल उपहार छोड़ने का फैसला कर लिया?

मरने से पहले छोड़े गए पत्र में बच्चे ने अपने स्कूल, अध्यापक और प्रिंसिपल को ज़िम्मेदार ठहराया। उसने लिखा कि उसे पिछले कुछ महीनों से मानसिक शोषण का सामना करना पड़ रहा था।


लेकिन यहाँ एक गंभीर प्रश्न उठता है—

क्या किसी बच्चे की गलत हरकतों को रोकना, उसे अनुशासन में रखना या समझाना मानसिक शोषण कहलाता है?

या फिर इस मामले में वास्तव में बच्चा किसी गहरी तकलीफ़ से गुज़र रहा था, जिसे समय रहते समझा ही नहीं गया?

कहां कमी रह गई?

इस घटना की सबसे दुखद सच्चाई यह है कि न तो स्कूल, न शिक्षक, न अभिभावक और न ही समाज—कोई भी अपनी ज़िम्मेदारी से पूरी तरह बच नहीं सकता।


1. स्कूल और शिक्षकों की भूमिका

यदि बच्चे ने कई महीनों तक मानसिक तनाव की बात कही थी, तो

क्या स्कूल ने उसे सही समय पर काउंसलिंग दी?

क्या उसकी मानसिक स्थिति को समझकर उपयुक्त कार्रवाई की गई?

क्या अनुशासन के नाम पर कहीं अनजाने में उस पर अत्यधिक दबाव तो नहीं डाला गया?

शिक्षक सिर्फ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि बच्चों की भावनात्मक अवस्था के सबसे बड़े पर्यवेक्षक होते हैं।


2. अभिभावकों की ज़िम्मेदारी

यदि बच्चा परेशान था, शिकायत करता था या व्यवहार में बदलाव दिखा रहा था, तो अभिभावकों ने समय रहते गंभीरता क्यों नहीं दिखाई?

क्या उन्होंने स्कूल से खुलकर बात की?

क्या उन्होंने बच्चे के संकेतों को समझा?

अक्सर माता-पिता बच्चे की चिंता को “नखरा”, “बहाना” या “छोटी बात” मानकर टाल देते हैं — और यही अनदेखी कई बार जानलेवा बन जाती है।

3. सामाजिक दबाव और आज के बच्चों की मानसिकता

आज के बच्चे तकनीक, तुलना, प्रतियोगिता और अपेक्षाओं के दोधारी तलवार के बीच पल रहे हैं।

उनके अंदर भावनात्मक सहनशीलता (emotional resilience) पहले की तुलना में कम हो गई है।

सोशल मीडिया, दोस्तों का दबाव, परिवार की उम्मीदें, स्कूल की रैंकिंग—इन सबके बीच बच्चों की मानसिक थकावट पहले से कहीं अधिक है।

क्या सच में आज के बच्चे मानसिक रूप से कमजोर हो रहे हैं?

इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" भी है और "नहीं" भी।

हाँ, जब बच्चों को भावनाएं सँभालना नहीं सिखाया जाता।

हाँ, जब असफलता को अपराध और सफलता को अनिवार्य मान लिया जाता है।

और नहीं, अगर हम उन्हें सही समय पर भावनात्मक प्रशिक्षण दें।

नहीं, अगर हम घर और स्कूल दोनों स्थानों पर उन्हें सुरक्षित वातावरण दें।

शिक्षा में इमोशनल इंटेलिजेंस (Emotional Intelligence) की अनिवार्यता

यदि हम बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाना चाहते हैं, तो सिर्फ गणित, विज्ञान या भाषा ही नहीं, बल्कि भावनाओं को समझने, संभालने और व्यक्त करने की कला भी सिखानी होगी।

स्कूलों में निम्नलिखित विषयों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए—


✔ इमोशनल इंटेलिजेंस की शिक्षा

अपनी भावनाओं को पहचानना


क्रोध, दुख, डर जैसे भावों को नियंत्रित करना


सहानुभूति विकसित करना


संवाद और सहयोग की कला


✔ जीवन कौशल (Life Skills)

  • निर्णय लेना
  • समस्या समाधान
  • तनाव प्रबंधन
  • समय प्रबंधन
  • रिश्तों को संभालना

✔ असफलता को स्वीकारने की कला

  • बच्चों को यह सीखाने की सबसे ज्यादा ज़रूरत है कि—
  • असफल होना गलत नहीं है
  • असफलता जीवन का हिस्सा है, जीवन का अंत नहीं
  • सफल होने के लिए असफलताओं को समझना और उनसे सीखना आवश्यक है
  • बच्चों को यह महसूस कराना होगा कि उनका मूल्य केवल अंकों, पुरस्कारों या प्रतियोगिताओं से तय नहीं होता।
  • क्या किया जाना चाहिए? (सामूहिक समाधान)

1. स्कूल में सक्रिय काउंसलिंग सिस्टम

हर बच्चे का नियमित मानसिक स्वास्थ्य आकलन होना चाहिए।

काउंसलर को शिक्षक की तरह अनिवार्य भूमिका दी जानी चाहिए।

2. अभिभावकों के लिए वर्कशॉप

बच्चों के व्यवहार में बदलाव कैसे पहचानें?

तनाव या अवसाद के संकेत क्या होते हैं?

बच्चों से खुले संवाद का महत्व

इन सभी पर माता-पिता को जागरूक बनाए जाने की जरूरत है।

3. शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण

संवेदनशील संवाद की कला

अनुशासन बनाम मानसिक दबाव का संतुलन

छात्रों की भावनात्मक जरूरतों को पहचानना

4. समाज में सकारात्मक वातावरण

अति-प्रतिस्पर्धा, तुलना, शर्मिंदा करने की संस्कृति और अवास्तविक उम्मीदों को कम करना होगा।

निष्कर्ष

इस दर्दनाक घटना में दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं है।

यह हमारे पूरे समाज की सामूहिक असफलता है—

हम बच्चे के छोटे-छोटे संकेतों को समझ नहीं पाए।

हमने उसकी चुप्पी को गंभीरता से नहीं लिया।


आज आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि समाधान की है।

हमें ऐसे माहौल का निर्माण करना होगा जहाँ एक बच्चा बिना डर, बिना दबाव और बिना शर्म के अपनी बात कह सके।


मानसिक रूप से मजबूत बच्चे खुद नहीं बनते—हम मिलकर उन्हें बनाते हैं।

Wednesday, November 19, 2025

आज के समय में बच्चों का बढ़ता संवेदनशील व्यवहार – कारण और समाधान

 आज के समय में बच्चों का बढ़ता संवेदनशील व्यवहार – कारण और समाधान


आज के परिवेश में बच्चों का अत्यधिक संवेदनशील होना एक गंभीर और सोचने योग्य विषय बन गया है। छोटी-सी बात पर उनका गुस्सा हो जाना, गलत व्यवहार करना, गाली-गलौज करना या हिंसक प्रतिक्रिया देना — ये सब उस उम्र में हो रहा है, जो उनके खेलने-कूदने, सीखने और खुश रहने की उम्र है।

लेकिन ऐसा क्या बदल गया है?

बच्चे तो वही हैं, पर उनके व्यवहार में इतना बड़ा अंतर क्यों?

पुराने समय का वातावरण – एक सीख

  • कुछ वर्ष पहले का समय देखें, तो बच्चे अधिकांश समय अपने परिवार के साथ बिताते थे।
  • उनके जीवन में प्रतियोगिता कम थी
  • सामाजिक संबंध गहरे थे
  • परिवार में बातचीत अधिक होती थी
  • माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत था

बच्चों को प्यार, अनुशासन और सुरक्षा तीनों एक साथ मिलते थे।


आज का बदलता युग – बदलते व्यवहार की जड़


समय ने तेजी से करवट बदली है।

  • जीवनशैली बदली
  • व्यस्तता बढ़ी
  • तकनीक जीवन का केंद्र बन गई
  • प्रतियोगिता का दबाव बढ़ गया
  • परिवार में साथ बैठकर समय बिताना कम हो गया

नतीजतन, बच्चों के लिए भावनाएँ संभालना, असफलता से निपटना और छोटी बातों को सहन करना कठिन होता जा रहा है।

आज के समय में यदि स्कूल में शिक्षक, कोई पड़ोसी या परिवार का सदस्य उन्हें कुछ समझा दे, तो बच्चों का गुस्सा तुरंत भड़क जाता है। उन्हें सामने वाला व्यक्ति गलत या दुश्मन जैसा लगने लगता है। गुस्से में वे सही–गलत का अंतर भूल जाते हैं और कई बार गलत निर्णय भी ले बैठते हैं।

ज़िम्मेदारी किसकी है?

  • यह सवाल आसान नहीं, पर साफ है कि
  • बच्चे बदल नहीं रहे, वातावरण बदल रहा है।
  • और इस बदलते वातावरण की ज़िम्मेदारी समाज, परिवार और शिक्षा—तीनों की है।

1. परिवार

आज के माता-पिता के पास समय कम है, पर उम्मीदें बहुत ज़्यादा।

बच्चों से बड़े-बड़े लक्ष्य की अपेक्षा तो की जाती है, लेकिन उनके भावनात्मक स्वास्थ्य पर ध्यान कम दिया जाता है।

2. समाज

आधुनिकता के नाम पर जो जीवनशैली बच्चों के सामने आ रही है, वह चमकदार है, पर स्थिर नहीं।

बच्चों को सही रोल मॉडल मिलना कम होता जा रहा है।

3. शिक्षा व्यवस्था

शिक्षा केवल किताबों तक सीमित होती जा रही है।

भावनात्मक शिक्षा, नैतिक शिक्षा और जीवन कौशल पर वह ध्यान नहीं मिल रहा, जिसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है।

तो समाधान क्या है?


1. बच्चों को समय दें

वे आपकी बातें सुनेंगे, यदि आप पहले उनकी बातें सुनेंगे।

हर दिन कुछ समय बिना मोबाइल, बिना टीवी—सिर्फ बातचीत में बिताएँ।


2. भावनात्मक शिक्षा को महत्व दें

बच्चों को गुस्सा, दुख, असफलता और तनाव को समझना सिखाएँ।

भावनाओं को दबाने के बजाय व्यक्त करने का सही तरीका बताएँ।


3. तुलना और अनावश्यक दबाव से बचें


हर बच्चा अलग है।

तुलना उसके मन में हीन भावना और गुस्सा दोनों एक साथ पैदा करती है।


4. शिक्षक और अभिभावक दोनों मिलकर काम करें


यदि बच्चा गलत हो, तो घर और स्कूल एक-दूसरे को दोष देने के बजाय समाधान ढूँढें।

बच्चे सिर्फ अनुशासन से नहीं, प्यार और सम्मान से भी सीखते हैं।


5. सकारात्मक वातावरण बनाएं


टीवी, मोबाइल और सोशल मीडिया पर आने वाली हिंसक, नकारात्मक सामग्री बच्चों की सोच को प्रभावित करती है।

उनके आसपास भाषा, व्यवहार और माहौल जितना अच्छा होगा, बच्चे उतने संतुलित बनेंगे।


बच्चों का संवेदनशील होना उनकी गलती नहीं, बल्कि समय की चुनौती है।

वे फूलों की तरह कोमल हैं—उन पर वातावरण का असर बहुत जल्दी होता है।


यदि समाज, परिवार और शिक्षा तीनों मिलकर उन्हें सही दिशा दें,

तो वही बच्चे आगे चलकर समझदार, जिम्मेदार और मजबूत नागरिक बनेंगे।


बच्चों को बदलने से पहले हमें अपने व्यवहार और समय को बदलना होगा।

क्योंकि भविष्य वही है, जो आज हम उन्हें सिखाते हैं।

Monday, November 17, 2025

शिक्षक की असुरक्षित दुनिया: जिम्मेदार कौन?

 शिक्षक की असुरक्षित दुनिया: जिम्मेदार कौन?

1. प्रस्तावना : “शिक्षक”—एक शब्द, कई अर्थ

“शिक्षक”—यह शब्द सुनने में जितना सरल, सम्माननीय और पवित्र लगता है, उसके भीतर उससे कहीं अधिक भार, अपेक्षा और त्याग छिपा है। शिक्षक समाज और विश्व के निर्माता माने जाते हैं, पर आज का वास्तविक परिदृश्य इससे बिल्कुल उलट दिखाई देता है। विशेष रूप से प्राइवेट स्कूलों में कार्यरत शिक्षक अपनी ही सुरक्षा और अस्तित्व के लिए संघर्ष करते दिखते हैं।

2. वर्तमान परिप्रेक्ष्य : शिक्षक बने असुरक्षा के प्रतीक

आज शिक्षक होना जितना सम्मानजनक है, उतना ही जोखिम भरा भी।

स्कूलों में शिक्षकों पर बढ़ते हमले,

गाली-गलौज,

अभद्र व्यवहार,

और कई मामलों में हथियारों से हमला—

अब दुर्लभ घटनाएँ नहीं रहीं, बल्कि एक खतरनाक सामान्य-सी बात बन गई हैं।

वे स्कूल जहाँ बच्चों का भविष्य सुरक्षित होना चाहिए, वहाँ शिक्षक स्वयं असुरक्षित हो चुके हैं।


3. शिक्षक से अपेक्षा: “चुप रहो… क्योंकि तुम शिक्षक हो”

समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है—

अपराध का शिकार शिक्षक होता है,

और चुप रहने की अपेक्षा भी उसी से की जाती है।

उसे कहा जाता है:

“तुम शिक्षक हो, सब सहो।”

“तुम्हें गुस्सा नहीं करना चाहिए।”

“तुम्हें ही शांत रहना होगा।”

मानो शिक्षक इंसान नहीं, सिर्फ बलिदान देने वाला कोई जीव हो।

आर्थिक, सामाजिक और शारीरिक—तीनों स्तरों पर उसका शोषण सामान्य माना जाने लगा है।


4. अपराध और नाबालिग का भ्रम: क्या अपराध उम्र देखकर कम हो जाता है?

जब अपराधी कोई नाबालिग छात्र होता है, तो समाज का एक बड़ा वर्ग अचानक ढाल बनकर उसके साथ खड़ा हो जाता है।

उसे “बच्चा” कहकर अपराध को हल्का किया जाता है।

शिक्षक के दर्द को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

और उसके परिवार को सिर्फ औपचारिक सांत्वना देकर छोड़ दिया जाता है।

लेकिन सवाल है—

यदि एक नाबालिग को अपराध करने की समझ है,

तो उसे यह क्यों न समझाया जाए कि उसके परिणाम भी होंगे?

अपराध को उम्र देखकर नहीं, इच्छा और कृत्य देखकर परखा जाना चाहिए।

5. कानूनी और संस्थागत उदासीनता : शिक्षक अकेला क्यों रह जाता है?

दुखद सच्चाई यह है कि—

सरकार

स्कूल प्रबंधन

सामाजिक संस्थाएँ

लगभग सभी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं।

अपराध के बाद शिक्षक—जो पीड़ित है—कानूनी, सामाजिक और मानसिक रूप से अकेला छोड़ दिया जाता है।

उसके पास ना सुरक्षा होती है, ना आर्थिक सहायता, ना ही कोई विशेष कानूनी संरक्षण।

6. कहाँ है शिक्षक-सुरक्षा कानून?

हर वर्ष समाज में नई-नई नीतियाँ और कानून बनते हैं,

लेकिन शिक्षक सुरक्षा के लिए कोई ठोस, राष्ट्रीय स्तर का कानून आज तक नहीं बनाया गया।

विशेषकर प्राइवेट स्कूलों में—

न नौकरी सुरक्षित है,

न वेतन,

न ही शारीरिक सुरक्षा।

यह विडंबना है कि जिस व्यक्ति पर भविष्य निर्माण की जिम्मेदारी है, वही अपने वर्तमान को सुरक्षित नहीं कर पाता।

7. जिम्मेदार कौन?

इस दुर्दशा के कई जिम्मेदार हैं—

सरकार, जिसने शिक्षक सुरक्षा को कभी प्राथमिकता नहीं दी।

स्कूल प्रबंधन, जो अपने कर्मचारियों के लिए सुरक्षा ढांचा नहीं बनाता।

अभिभावक, जो बच्चों की गलती को दोष आने पर स्कूल के ऊपर डाल देते हैं।

समाज, जो अपराधी को “बच्चा” कहकर छिपाता है लेकिन पीड़ित शिक्षक के साथ खड़ा नहीं होता।

कानून व्यवस्था, जिसमें शिक्षक के अधिकारों को विशेष महत्व नहीं दिया गया।

8. समाधान की दिशा में: क्या होना चाहिए?

समस्या का समाधान तभी संभव है जब शिक्षक की सुरक्षा को प्राथमिकता के रूप में स्वीकार किया जाए।

आवश्यक कदम—

राष्ट्रीय शिक्षक सुरक्षा कानून

स्कूलों में सुरक्षा प्रोटोकॉल और CCTV निगरानी

शिक्षक पर हमले को गंभीर गैर-जमानती अपराध घोषित करना

प्राइवेट शिक्षकों के लिए स्थायी वेतन और बीमा का प्रावधान

अभिभावकों और छात्रों में नैतिक शिक्षा एवं कानूनी जागरूकता

9. निष्कर्ष : शिक्षक की सुरक्षा, समाज का भविष्य

यदि शिक्षक ही सुरक्षित नहीं रहेगा, तो शिक्षा, मूल्य और भविष्य कैसे सुरक्षित रहेंगे?

शिक्षक सिर्फ एक पेशा नहीं—एक समाज का आधारस्तंभ है।

इस आधार को हिलने देना पूरे समाज को कमजोर करना है।

आवश्यक है कि हम शिक्षक को केवल अपेक्षाओं का बोझ न दें,

बल्कि सुरक्षा, सम्मान और अधिकार भी दें—

तभी वह दूसरों का भविष्य बनाने की शक्ति जुटा पाएगा।

Sunday, November 16, 2025

अभिभावकों की अपेक्षाएँ और बदलता परिदृश्य

 अभिभावकों की अपेक्षाएँ और बदलता परिदृश्य

आज के सामाजिक परिदृश्य में एक विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है—अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों के प्रति नकारात्मक रवैया रखते हुए भी उनसे अत्यधिक अपेक्षाएँ पाल लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन अपेक्षाओं की कोई सीमा नहीं होती। पढ़ाई हो, खेल-कूद हो, या फिर किसी भी प्रतियोगिता में भागीदारी—हर क्षेत्र में वे बच्चों से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद करते हैं।

लेकिन जब बच्चा किसी कारणवश अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता, अपने सहपाठियों से पीछे रह जाता है या पढ़ाई में उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं ला पाता, तो जिम्मेदारी लेने की बजाय अभिभावक दोष सीधे स्कूल और अध्यापकों के सिर मढ़ देते हैं। बच्चों की हर असफलता का ठीकरा शिक्षक के सिर पर फोड़ना आज बहुत आम हो गया है।

अभिभावकों का अक्सर यही तर्क होता है—

“हम फीस देते हैं, ट्यूशन भेजते हैं, इतना पैसा खर्च करते हैं, फिर भी बच्चा अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर पा रहा?”

लेकिन इस तर्क में एक महत्वपूर्ण सच्चाई गुम हो जाती है—

पैसा शिक्षा खरीद सकता है, पर संस्कार नहीं। साधन उपलब्ध करा सकता है, पर सीख नहीं।

बच्चों के भीतर अच्छे गुणों, आदतों और शिष्टाचार का निर्माण केवल स्कूल या शिक्षक की जिम्मेदारी नहीं है। इन आदतों और चरित्र निर्माण की नींव घर पर रखी जाती है। परिवार के वातावरण, अभिभावकों के व्यवहार, और घर के सदस्यों की आपसी समझ—ये सभी मिलकर बच्चों की सोच और व्यक्तित्व को आकार देते हैं।

अभिभावक चाहें तो अपने कर्तव्यों की जिम्मेदारी से बचने के लिए स्कूल को सहयोगी संस्था मान सकते हैं, लेकिन अपनी भूमिका किसी भी कीमत पर किसी और पर नहीं डाल सकते।

घर बच्चों का पहला विद्यालय है, और माता-पिता उनके पहले शिक्षक।

स्कूल, शिक्षक और समाज की अन्य संस्थाएँ बच्चे के विकास में निश्चित रूप से समर्थन दे सकती हैं, लेकिन बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण की प्राथमिक जिम्मेदारी अभिभावकों की ही होती है। यदि वे स्वयं सकारात्मक वातावरण, अनुशासन, आदर्श आचरण और समय देने का प्रयास नहीं करेंगे, तो केवल पैसे के बल पर वह विकास संभव नहीं है जिसकी वे उम्मीद करते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावक स्वयं आत्ममंथन करें—

क्या वे केवल अपेक्षाएँ कर रहे हैं, या उन अपेक्षाओं के अनुरूप अपने दायित्व भी निभा रहे हैं?

क्या वे बच्चों की असफलताओं को समझने की कोशिश करते हैं, या सिर्फ आरोप लगाने में जल्दी करते हैं?

क्या वे बच्चों को प्रेरणा देते हैं, या दबाव डालते हैं?


यही सवाल अभिभावकों को समझना होगा, तभी बच्चों का वास्तविक और संतुलित विकास संभव है।

Saturday, November 8, 2025

"पीढ़ियों के बीच संवाद की ज़रूरत"

 "पीढ़ियों के बीच संवाद की ज़रूरत"


आज के समय में अक्सर माता-पिता और शिक्षक यह शिकायत करते नज़र आते हैं कि “आजकल के बच्चे बड़ों की बात नहीं मानते।” घर में भी यही स्थिति होती है और स्कूल में भी। कभी कोई छात्र माता-पिता की बातों को अनसुना कर देता है, तो कभी शिक्षक की सलाह को हल्के में ले लेता है।

ऐसे में बड़े अकसर यह तुलना करने लगते हैं — “हमारे ज़माने में तो हम बड़ों की आज्ञा का पालन करते थे, इतने बदतमीज़ नहीं थे।” पर क्या यह तुलना सचमुच उचित है? क्या हमने अपने युवावस्था के दिनों को भुला दिया है?


युवावस्था – एक उफनता सागर

हर इंसान अपने किशोर या युवा दिनों में एक अलग ही दुनिया में जीता है — जहाँ जोश होता है, सपने होते हैं, और खुद को समझने की चाह होती है। इस उम्र में बच्चा सिर्फ़ “ना” सुनना नहीं चाहता, वह यह जानना चाहता है कि “क्यों ना?”वह सवाल करता है, बहस करता है, और अपनी पहचान तलाशता है। यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक मानसिक विकास की प्रक्रिया है।


घर का वातावरण – पहली पाठशाला

माता-पिता का रोल यहाँ सबसे अहम है। अगर बच्चा आपकी बात नहीं सुन रहा, तो शायद उसने सुना ही नहीं —

क्योंकि आपने “कहा” ज़्यादा और “सुना” कम। बच्चों से संवाद केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि सुनने और समझने से बनता है। अगर माता-पिता बच्चों के विचार जानने की कोशिश करें, तो वे पाएँगे कि उनके भीतर भी संवेदनाएँ, विचार और सम्मान है — बस उसे सही दिशा दिखाने की ज़रूरत है।


शिक्षक – मार्गदर्शक, न कि केवल अनुशासक

शिक्षक के लिए भी यह समझना आवश्यक है कि आज का छात्र केवल किताबों से नहीं, बल्कि मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया से भी सीखता है। इसलिए पारंपरिक “डांटने वाली शिक्षा” अब प्रभावी नहीं रही। शिक्षक अगर अपने विद्यार्थियों से संवाद का रिश्ता बनाएँ, तो बच्चे उन्हें “डरने वाला गुरु” नहीं बल्कि “विश्वास करने वाला मित्र” मानने लगते हैं। और वहीं से शुरू होती है सच्ची शिक्षा।


समझ से जन्मता है सम्मान

किसी भी बच्चे के भीतर बड़ों के प्रति सम्मान तब ही टिकता है जब उसे महसूस होता है कि बड़े भी उसे समझते हैं।

सिर्फ़ आदेश देने से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, अपने उदाहरणों और अपने स्नेह से हम बच्चों को सही और गलत में अंतर करना सिखा सकते हैं।


यह कहना अनुचित नहीं होगा कि आज कि पीढ़ी हम जैसी ही है बस अंतर यह है कि उनके सोचने का तरीका के वर्तमान समय के अनुरूप है। हमें उन्हें अपने जैसे बनाने की ज़रूरत नहीं, बल्कि उन्हें अपने तरीके से सही दिशा देने की ज़रूरत है। जब माता-पिता, शिक्षक और छात्र — तीनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझेंगे, तभी एक ऐसा समाज बनेगा जहाँ संवाद ही अनुशासन की पहली सीढ़ी होगा।

Wednesday, November 5, 2025

"बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं"

 "बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं"


अक्सर हम सभी यह चाहते हैं कि हमारे बच्चे संस्कारी, जिम्मेदार और अच्छी आदतों वाले बनें। हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा जीवन में सफलता प्राप्त करे और समाज में सम्मान पाए। पर क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचा है कि जिन अच्छी आदतों को हम अपने बच्चों में विकसित करना चाहते हैं, क्या हम स्वयं उन आदतों का पालन करते हैं?


यह बात समझना बहुत आवश्यक है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं, न कि जो उन्हें केवल सिखाया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई माता-पिता अपने बच्चे को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं लेकिन खुद छोटी-छोटी बातों में झूठ बोलते हैं — जैसे फोन पर कहना “बोल देना मैं घर पर नहीं हूँ” — तो बच्चा इसे एक स्वाभाविक व्यवहार मान लेता है।


आजकल एक जीवंत उदाहरण आम देखने को मिलता है — कई माता-पिता अपने कार्य स्वयं नहीं करते, पर वही कार्य अपने छोटे बच्चों पर थोप देते हैं। प्रारंभ में बच्चा प्यार या डर के कारण वह काम कर देता है, पर जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, वह यह महसूस करने लगता है कि उसके माता-पिता तो आराम से बैठकर फोन चला रहे हैं और उस पर काम का बोझ डाल रहे हैं। धीरे-धीरे उसके मन में यह धारणा बन जाती है कि "बड़े होने का मतलब है — दूसरों से काम करवाना।"


इस तरह, अनजाने में ही माता-पिता अपने बच्चे के भीतर ग़लत व्यवहार की नींव डाल देते हैं। बाद में वही माता-पिता उस बच्चे की तुलना अपने बचपन या दूसरों के बच्चों से करने लगते हैं — "देखो, वो कितना आज्ञाकारी है, और हमारा बेटा तो सुनता ही नहीं!"

परंतु वे यह भूल जाते हैं कि बच्चे का पहला शिक्षक उसका घर और उसके माता-पिता होते हैं।


बच्चा केवल वह नहीं सीखता जो उसे कहा जाता है, बल्कि वह वह सब सीखता है जो वह अपने चारों ओर घटते हुए देखता है। यदि घर का वातावरण सकारात्मक होगा — जहाँ काम बाँटकर किए जाएँ, एक-दूसरे की मदद की जाए, और बड़ों का आचरण आदर्श हो — तो बच्चा भी वैसा ही बनेगा।


लेकिन यदि घर में उपेक्षा, असमानता और केवल आदेश देने की प्रवृत्ति होगी, तो वही बच्चा आगे चलकर वही रवैया अपनाएगा। इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह व्यवहार चलता चला जाता है, और किसी को इसका मूल कारण समझने की फुर्सत नहीं होती।


इसलिए, अगर हमें अपने बच्चों में अच्छी आदतों का निर्माण करना है, तो पहले हमें खुद अपने आचरण में सुधार लाना होगा।

बच्चे को उपदेश देने से अधिक प्रभावी होता है — उदाहरण प्रस्तुत करना।

क्योंकि अंततः,


“बच्चे वही बनते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं, न कि जो वे अपने माता-पिता के मुँह से सुनते हैं।”

Wednesday, October 8, 2025

अभिभावक की भूमिका और परवरिश का प्रभाव: महाभारत से लेकर आज के युग तक


अभिभावक की भूमिका और परवरिश का प्रभाव: महाभारत से लेकर आज के युग तक


समय चाहे महाभारत का हो या आज का आधुनिक युग — बच्चों के निर्माण में अभिभावक की भूमिका सदैव सबसे महत्वपूर्ण रही है। बच्चे समाज की नींव हैं, और इस नींव की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि अभिभावक उन्हें किस दिशा में और किस सोच के साथ मार्गदर्शन देते हैं। आज के समय में


जब तकनीक, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता जीवन का केंद्र बन चुकी है, तब सबसे बड़ी चुनौती है — बच्चों को सही दिशा में ले जाना।


हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में सफलता प्राप्त करे, एक अच्छा इंसान बने और समाज में अपनी पहचान स्थापित करे। लेकिन केवल यह चाहना पर्याप्त नहीं।

यह तभी संभव है जब अभिभावक अपने बच्चों का मार्गदर्शन समझदारी, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ करें।



आज की परवरिश की सच्चाई

अक्सर देखा जाता है कि कई अभिभावक यह मान लेते हैं कि अपने बच्चे की हर आवश्यकता पूरी कर देना — स्कूल और ट्यूशन की फीस देना, नई वस्तुएँ खरीदकर देना या उसकी हर इच्छा पर तुरंत प्रतिक्रिया देना — यही एक जिम्मेदार अभिभावक होने की निशानी है। लेकिन सच्चाई यह है कि सुविधाएँ उपलब्ध कराना परवरिश नहीं, केवल पालन-पोषण का एक हिस्सा है।

बच्चे की हर माँग को बिना समझे पूरी कर देना उसे जीवन के संघर्षों से दूर कर देता है। यह सोच धीरे-धीरे बच्चे के भीतर यह भावना पैदा करती है कि उसे बिना प्रयास के सब कुछ मिलना चाहिए। यही सोच आगे चलकर अहंकार, असंवेदनशीलता और निर्भरता में बदल जाती है।


महाभारत से सीख: परवरिश का अंतर


यदि हम महाभारत की कथा देखें तो वहाँ भी दो परवरिशें थीं — एक उदाहरण और एक चेतावनी।

एक ओर थे पांडु के पुत्र, जिन्हें सत्य, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा मिली। दूसरी ओर थे धृतराष्ट्र के पुत्र, जिन्हें बिना सीमाओं के लाड़-प्यार और पक्षपातपूर्ण संरक्षण मिला।


धृतराष्ट्र अपने पुत्रों, विशेषकर दुर्योधन, से अत्यधिक मोह रखते थे। वे उसकी गलतियों को कभी रोकते नहीं थे। परिणामस्वरूप, दुर्योधन के भीतर अहंकार, ईर्ष्या और असहिष्णुता पनपने लगी। उसे विश्वास था कि जो चाहे वह पा सकता है, चाहे वह न्यायोचित हो या नहीं।


इसके विपरीत, पांडवों को बचपन से ही संयम, मेहनत और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया गया। उनकी माता कुंती ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने बच्चों को विनम्रता और सच्चाई के मूल्य सिखाए। गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह ने उन्हें जीवन के शस्त्र और शास्त्र दोनों का ज्ञान दिया।


परिणाम यह हुआ कि जब दुर्योधन ने छल और अन्याय का मार्ग अपनाया, तब युधिष्ठिर ने हर परिस्थिति में धर्म का साथ दिया।  कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल सत्ता का नहीं, बल्कि दो भिन्न परवरिशों के टकराव का प्रतीक था — एक ने अहंकार को जन्म दिया, दूसरी ने आदर्श को।


वर्तमान समय के लिए संदेश


आज के अभिभावक भी अक्सर “धृतराष्ट्र जैसी गलती” कर बैठते हैं —

वे अपने बच्चों को गलतियों से बचाने की कोशिश में उन्हें जिम्मेदारी से दूर कर देते हैं। बच्चों को हर बार जीत की आदत डाल देना, असफलता से बचाना, या “मेरे बच्चे को कुछ मत कहो” कहना — ये सब उन्हें कमजोर बना देता है।


इसके विपरीत, अगर बच्चे को यह सिखाया जाए कि हर कार्य के पीछे कारण समझना जरूरी है, कि सफलता प्रयास से मिलती है और कि सम्मान कमाया जाता है, तो वही बच्चा भविष्य में युधिष्ठिर या अर्जुन की तरह दृढ़ और विवेकशील बनेगा।


बच्चों से छोटे-छोटे काम करवाना, जैसे घर की व्यवस्था में सहयोग देना या अपनी चीज़ें स्वयं संभालना, न केवल जिम्मेदारी का भाव जगाता है बल्कि उनमें आत्मनिर्भरता और संवेदनशीलता भी पैदा करता है।


अंततः — सच्ची परवरिश क्या है?

सच्ची परवरिश का अर्थ बच्चों को केवल सुविधाएँ देना नहीं, बल्कि उन्हें यह सिखाना है कि जीवन में हर परिस्थिति से कैसे जूझना है।

एक जिम्मेदार अभिभावक वह नहीं जो हर समस्या को बच्चे के रास्ते से हटा दे, बल्कि वह है जो बच्चे को सिखाए कि समस्याओं से कैसे निपटना है।


महाभारत की तरह आज भी यही सत्य है —


“सही परवरिश ही बच्चे का भविष्य तय करती है।”

अगर आज अभिभावक अपने बच्चों में सही सोच, जिम्मेदारी और आत्मसंयम के संस्कार बोते हैं, तो भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा।


क्योंकि, बच्चों को सही दिशा देना ही सबसे बड़ा प्रेम है — और यही सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।

Wednesday, October 1, 2025

स्त्री और मातृत्व : समाज की सोच पर पुनर्विचार

स्त्री और मातृत्व : समाज की सोच पर पुनर्विचार


स्त्री का मातृत्व केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गहरा और अनोखा अनुभव है। जब एक स्त्री नवजात शिशु को जन्म देती है, तो लोग प्रायः उस नन्हीं जान के आने का उत्सव मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग यह समझते हैं कि वास्तव में यह स्त्री का भी पुनर्जन्म होता है। वह नौ माह तक अपनी कोख में जीवन को संजोए रखती है, अपनी इच्छाओं और सुखों का त्याग करती है, अनगिनत पीड़ाओं से गुजरती है और अंततः संसार को नया जीवन देती है।


फिर भी, इन त्यागों और बलिदानों को समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। उसके जीवन में दुख और यातनाएँ ऐसे जुड़े रहते हैं, मानो यह उसी के हिस्से का स्थायी सत्य हो। और यदि कोख में पल रही संतान एक लड़की हो, तो यह यातना और भी बढ़ जाती है। समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी स्त्री को इसके लिए दोषी ठहराता है, जैसे संतान का लिंग निर्धारण केवल उसी के हाथों में हो।


लेकिन यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि संतान का लिंग निर्धारण पुरुष के गुणसूत्रों पर निर्भर करता है। फिर भी, स्त्री को ही दोष देने की मानसिकता हमारे समाज की गहरी जड़ें जमा चुकी सोच को दर्शाती है। सवाल उठता है कि जब संतानोत्पत्ति की प्रक्रिया में पुरुष और स्त्री दोनों की भूमिका समान है, तो सारा दोष केवल स्त्री पर क्यों मढ़ा जाता है?


असल में, यह स्थिति केवल व्यक्तिगत सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे की असमानताओं को उजागर करती है। समाज की बागडोर लंबे समय से पुरुषों के हाथों में रही है। पुरुष प्रधान मानसिकता के कारण स्त्री को हर स्थिति में दोषी ठहराना मानो परंपरा बन गई है। यह प्रवृत्ति न केवल स्त्री का अपमान है, बल्कि ईश्वर की उस मंशा के भी विपरीत है जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों को समान और पूरक के रूप में बनाया गया है।


शारीरिक विभिन्नताओं के आधार पर स्त्री को हीन या दोषी ठहराना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायोचित नहीं है। समय की मांग है कि समाज इस संकीर्ण सोच से बाहर निकले और यह स्वीकार करे कि संतानोत्पत्ति में स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से सहभागी हैं।


स्त्री केवल जीवन देने वाली नहीं, बल्कि वह परिवार और समाज की धुरी है। उसके बिना न तो जीवन संभव है और न ही समाज का अस्तित्व। इसलिए अब यह आवश्यक है कि हम स्त्री को दोषमुक्त दृष्टि से देखें, उसे उसके वास्तविक सम्मान और अधिकार दें। यही एक स्वस्थ, संतुलित और समान समाज की ओर पहला कदम होगा।

Saturday, August 23, 2025

इंसानियत को तार-तार करने वाले जघन्य अपराध और समाज की ज़िम्मेदारी

 इंसानियत को तार-तार करने वाले जघन्य अपराध और समाज की ज़िम्मेदारी

आज के समय में जब हम अख़बार खोलते हैं या न्यूज़ चैनल देखते हैं, तो कई बार दिल दहला देने वाली खबरें सामने आती हैं। नाबालिग बच्चों के साथ बलात्कार, अपने स्वार्थ के लिए किसी की बेरहमी से हत्या, और तरह-तरह के अपराध... ये सब इंसानियत को शर्मसार कर देते हैं। सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसे अपराध किस श्रेणी में आते हैं? इनके लिए कैसी सज़ा होनी चाहिए ताकि अपराधी अपराध करने से पहले हज़ार बार सोचें? और सबसे ज़रूरी – क्या हम और आप, समाज के नागरिक होने के नाते, इन अपराधों को रोक सकते हैं?

1. ये अपराध किस श्रेणी में आते हैं?

  • ऐसे अपराध जघन्य अपराध (Heinous Crimes) कहलाते हैं।
  • नाबालिगों से रेप
  • किसी का स्वार्थ के लिए मर्डर
  • या दूसरों को शारीरिक व मानसिक रूप से गंभीर हानि पहुँचाना
  • ये सभी ऐसे अपराध हैं जो न केवल एक व्यक्ति के खिलाफ होते हैं, बल्कि पूरे समाज और उसकी नैतिकता को चोट पहुँचाते हैं।

2. कैसी होनी चाहिए सज़ा?

  • लोग अक्सर कहते हैं कि “कड़ी सज़ा होनी चाहिए”। पर सवाल है, कैसी सज़ा?
  • कठोर दंड – रेप और मर्डर जैसे अपराधों में मृत्युदंड या आजीवन कारावास।
  • तुरंत फैसला – सालों मुकदमा चलने की बजाय फास्ट-ट्रैक कोर्ट में न्याय।
  • सामाजिक निंदा – अपराधी की पहचान उजागर करना ताकि समाज उसे स्वीकार न करे।
  • जब अपराधी को तुरंत और कठोर सज़ा मिलती है, तो बाकी लोग भी अपराध करने से पहले डरते हैं।

3. क्या ऐसे अपराध रोके जा सकते हैं?

  • पूरी तरह अपराध मिटाना शायद मुश्किल हो, लेकिन इन्हें बहुत हद तक कम ज़रूर किया जा सकता है।
  • परिवार और शिक्षा – बच्चों को अच्छे संस्कार, सहानुभूति और दूसरों की इज़्ज़त करना सिखाना।
  • कानून का सख़्ती से पालन – अपराधी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे बचाना नहीं।
  • जागरूकता – समाज को समझना होगा कि चुप रहना अपराधी को ताक़त देना है।
  • टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल – CCTV, हेल्पलाइन नंबर, सुरक्षा ऐप्स जैसे साधन अपनाना।

4. हर व्यक्ति की भूमिका

  • अब सवाल आता है – हम और आप क्या कर सकते हैं?
  • अगर किसी के साथ अन्याय दिखे तो रिपोर्ट करें, चुप न रहें।
  • पीड़ित को न्याय दिलाने में सहयोग दें।
  • अपने बच्चों और अगली पीढ़ी को सही-गलत का ज्ञान दें।
  • पड़ोस, स्कूल और समाज में बच्चों व महिलाओं की सुरक्षा पर ध्यान दें।

5. पहले के युगों में अपराध और सज़ा:- हमारे धर्मग्रंथों में भी अलग-अलग युगों में अपराध और दंड की व्यवस्था का ज़िक्र मिलता है।

  • सतयुग – उस समय धर्म इतना प्रबल था कि अपराध लगभग होते ही नहीं थे। समाज ही अनुशासन से चलता था।
  • त्रेतायुग – रामराज्य का उदाहरण लें, जहाँ न्याय तुरंत और निष्पक्ष होता था। अपराधी को तत्काल दंड मिलता था।
  • द्वापरयुग – महाभारत काल में भी अन्याय को रोकने के लिए युद्ध और कठोर दंड ही रास्ता बने।
  • कलियुग (आज का समय) – यहाँ कानून, पुलिस और न्यायपालिका ही सबसे बड़े साधन हैं। साथ ही, समाज और नागरिकों की ज़िम्मेदारी भी।


अपराधों को रोकने के लिए किसी तरह का कानून बना देना या फिर सिर्फ़ सरकार पर निर्भर रहना काफ़ी नहीं है। ज़रूरी है कि हम सब एक जिम्मेदार नागरिक कि भांति अपनी जिम्मेदारी निभाएँ। अगर हर नागरिक यह ठान ले कि न तो खुद अपराध करेगा, न अपराधी को बचाएगा, बल्कि पीड़ित का साथ देगा, तो अपराधों को बहुत हद तक रोका जा सकता है।

समाज को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि हम सब हरेक के प्रति सहानुभूति का भाव रखते हुए अपने अंदर इंसान को जिंदा रखें। क्योंकि, समाज तभी सुरक्षित रहेगा, जब इंसानियत बची रहेगी,  

कक्षा 12 में मनोविज्ञान चुनने का भविष्य और करियर स्कोप

 कक्षा 12 में मनोविज्ञान चुनने का भविष्य और करियर स्कोप

आज के दौर में मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) और व्यवहारिक समझ की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में मनोविज्ञान (Psychology) सिर्फ एक विषय नहीं, बल्कि भविष्य की असीम संभावनाओं का द्वार है। 

मनोविज्ञान पढ़ने के बाद किन क्षेत्रों में प्रवेश की संभावना बढ़ती है?

कक्षा 12 में मनोविज्ञान लेने के बाद छात्र निम्नलिखित क्षेत्रों में आगे बढ़ सकते हैं:

  • क्लिनिकल साइकोलॉजी (Clinical Psychology) – मानसिक रोगों, डिप्रेशन, एंग्जाइटी, ट्रॉमा आदि का इलाज और काउंसलिंग।
  • काउंसलिंग (Counseling Psychology) – स्कूल, कॉलेज या परिवार में मार्गदर्शन और जीवन की समस्याओं के समाधान देना।
  • मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) – गहरी मानसिक प्रक्रियाओं और अवचेतन मन को समझना।
  • ऑर्गेनाइजेशनल/इंडस्ट्रियल साइकोलॉजी – कंपनियों और संगठनों में कर्मचारियों की मानसिक स्थिति व कार्यक्षमता सुधारना।
  • एजुकेशनल साइकोलॉजी – छात्रों की सीखने की प्रक्रिया, रुचियों और व्यवहार को समझना।
  • फॉरेंसिक साइकोलॉजी – अपराध की जांच में मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोग।
  • स्पोर्ट्स साइकोलॉजी – खिलाड़ियों के आत्मविश्वास और मानसिक प्रदर्शन को बेहतर करना।
  • साइंस, कॉमर्स और आर्ट्स – तीनों स्ट्रीम्स में मनोविज्ञान का स्कोप

1. साइंस (Science Stream) के छात्रों के लिए

  • साइंस स्ट्रीम से आने वाले छात्र न्यूरो-साइकोलॉजी, क्लिनिकल रिसर्च, हेल्थ साइकोलॉजी और फॉरेंसिक साइकोलॉजी जैसे क्षेत्रों में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं।
  • उन्हें मेडिकल और बायोलॉजी का ज्ञान पहले से होता है, इसलिए वे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े वैज्ञानिक शोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • आगे चलकर एमबीबीएस + साइकियाट्री (Psychiatry) में भी अवसर मिल सकता है।

2. कॉमर्स (Commerce Stream) के छात्रों के लिए

  • कॉमर्स के छात्रों के लिए मनोविज्ञान का बड़ा स्कोप ऑर्गेनाइजेशनल/इंडस्ट्रियल साइकोलॉजी और ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट (HRM) में है।
  • वे कंपनियों, बैंकों, बिजनेस और कॉर्पोरेट सेक्टर में कर्मचारियों की कार्यकुशलता, तनाव प्रबंधन और मोटिवेशन पर काम कर सकते हैं।
  • कंज्यूमर बिहेवियर (Consumer Behaviour) और मार्केट रिसर्च भी एक मजबूत करियर विकल्प है।

3. आर्ट्स (Arts Stream) के छात्रों के लिए

  • आर्ट्स स्ट्रीम से आने वाले छात्र मनोविज्ञान में पारंपरिक रूप से सबसे बड़ी संख्या में आगे बढ़ते हैं।
  • इनके लिए स्कोप क्लिनिकल साइकोलॉजी, काउंसलिंग, एजुकेशनल साइकोलॉजी और सोशल वर्क में होता है।
  • यह छात्र समाज, शिक्षा और परिवार से जुड़े मनोवैज्ञानिक पहलुओं में गहराई से काम कर सकते हैं।
  • भविष्य में मनोविज्ञान का स्कोप क्यों बढ़ रहा है?
  • बदलती जीवनशैली और तनावपूर्ण दिनचर्या।
  • बच्चों, किशोरों और युवाओं में मानसिक समस्याओं का बढ़ना।
  • कॉर्पोरेट कंपनियों और संस्थानों में वेलनेस प्रोग्राम की मांग।
  • सरकार और निजी संगठनों द्वारा मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता अभियान।
  • विदेशों में तो पहले से ही मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विशाल बाजार है, और भारत में भी यह तेजी से बढ़ रहा है।

कौन-कौन से कोर्स करने चाहिए?

  • यदि आप Psychologist या Counselor बनना चाहते हैं तो आपको इन स्टेप्स का पालन करना होगा:
  • कक्षा 12 (Arts/Science/Commerce) + Psychology Subject – आधारभूत ज्ञान प्राप्त होगा।
  • Graduation (B.A / B.Sc in Psychology) – यह पहला प्रोफेशनल कदम है।
  • Post-Graduation (M.A / M.Sc in Psychology) – इसमें आप अपनी विशेष रुचि के अनुसार विशेषज्ञता (Specialization) चुन सकते हैं – जैसे Clinical, Counseling, Industrial आदि।
  • M.Phil / Ph.D. in Psychology (यदि रिसर्च या उच्च शिक्षा में जाना हो)।
  • डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स – School Counseling, Clinical Counseling, Child Psychology, Forensic Psychology आदि।

एक Psychologist या Counselor बनने के लिए जरूरी कौशल

  • लोगों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनने की क्षमता।
  • सहानुभूति (Empathy) और संवेदनशीलता।
  • समस्याओं का तार्किक विश्लेषण करने की योग्यता।
  • संवाद कौशल (Communication Skills)।
  • गोपनीयता बनाए रखने और पेशेवर दृष्टिकोण।

कक्षा 12 में मनोविज्ञान चुनना सिर्फ एक विषय का चुनाव नहीं, बल्कि एक ऐसे भविष्य की ओर कदम बढ़ाना है जहाँ आप समाज की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। चाहे आप साइंस, कॉमर्स या आर्ट्स किसी भी स्ट्रीम से हों, मनोविज्ञान का दायरा आपके लिए खुला है। इसमें कैरियर, सम्मान और सेवा – तीनों का संगम है। यदि आप समाज मे दूसरों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखते हैं, तो मनोविज्ञान आपके लिए सबसे उत्तम विकल्प है।

Tuesday, August 19, 2025

शिक्षक – राष्ट्र की नींव और बदलता दृष्टिकोण

 शिक्षक – राष्ट्र की नींव और बदलता दृष्टिकोण


“किसी भी देश की नींव उसके शिक्षक होते हैं।” यह वाक्य केवल कहने भर के लिए नहीं बल्कि एक सच्चाई है। शिक्षक ही वह शक्ति हैं जो मिट्टी को आकार देकर इंसान बनाते हैं और इंसानों से मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिस शिक्षक ने अपने कंधों पर देश का भविष्य सँवारने का जिम्मा उठाया, वही आज अपने भविष्य और अस्तित्व के लिए चिंतित है।

त्याग और संघर्ष की अनदेखी

शिक्षक जीवनभर अपने शिष्यों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है। समय, ऊर्जा, ज्ञान और कभी-कभी अपने सपने तक। लेकिन बदले में उसे मिलता क्या है? सम्मान, जो धीरे-धीरे कम होता जा रहा है; सुविधाएँ, जो अन्य पेशों की तुलना में न के बराबर हैं; और सुरक्षा, जो भविष्य की ओर देखते हुए धुंधली-सी लगती है।

जिम्मेदार कौन?:- इस स्थिति के लिए जिम्मेदारी केवल एक पक्ष पर डालना उचित नहीं होगा।

  • बदलता सामाजिक परिवेश – आज की दुनिया में सफलता का पैमाना पैसों और पद से आँका जाने लगा है। ऐसे में शिक्षक का योगदान कमतर आँका जाता है।
  • सरकार – नीतियाँ तो बनती हैं, पर शिक्षक को केंद्र में रखकर नहीं। उसका आर्थिक, सामाजिक और मानसिक विकास अक्सर उपेक्षित रह जाता है।
  • अभिभावक और समाज – पहले जहाँ शिक्षक को “गुरु देवो भवः” की दृष्टि से देखा जाता था, वहीं अब उसे सिर्फ “सेवा प्रदाता” की तरह माना जाने लगा है।
  • शिक्षक स्वयं – कभी-कभी शिक्षक भी अपनी सीमाओं में बंधकर अपने दायित्वों से दूर होते दिखाई देते हैं।

शिक्षा का बदलता स्वरूप

आज शिक्षा का मुख्य उद्देश्य “जिम्मेदार नागरिक” बनाना नहीं बल्कि “सफल कर्मचारी” बनाना भर रह गया है। शिक्षा को मानो एक फैक्ट्री बना दिया गया है, जहाँ से अंक और डिग्रियाँ तो निकल रही हैं, पर मानवीय मूल्य और नैतिकता कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं।

 शिक्षक का असली मूल्य

एक डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक या नेता – हर किसी के पीछे एक शिक्षक खड़ा होता है। अगर शिक्षक न हो तो इन पेशों का जन्म ही संभव नहीं। फिर भी सबसे कम सम्मान और सुविधाएँ उसी को क्यों?

आवश्यक बदलाव

  • अब समय है कि हम फिर से अपने समाज में शिक्षक की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करें।
  • सरकार को चाहिए कि शिक्षक को केवल “नौकरी” नहीं, बल्कि “राष्ट्र निर्माता” के रूप में देखें और उसकी स्थिति सुधारें।
  • अभिभावकों और समाज को यह समझना होगा कि बच्चों के चरित्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका किसी से कम नहीं है।
  • और स्वयं शिक्षक को भी अपने कर्तव्यों और मूल्यों को पुनः जागृत करना होगा, ताकि वह सिर्फ पढ़ाने वाला नहीं बल्कि मार्गदर्शक और प्रेरणास्रोत बन सके।

शिक्षक सिर्फ कक्षा में पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह नींव है जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ और राष्ट्र खड़ा होता है। अगर नींव कमजोर होगी तो भवन कितना भी भव्य क्यों न बने, टिक नहीं पाएगा। इसलिए शिक्षक के व्यवसाय को जीवंत रखने के लिए आवश्यक है कि हम शिक्षक को उसका सही स्थान और सम्मान दें। और आने वाली पीढ़ी शिक्षण को  मजबूरी या टाइम पास की नज़र से ना देख कर, सामाजिक सेवा और रुचि के साथ शिक्षक के पेशे को अपनाए। तभी  देश का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल हो पाएगा।

Saturday, August 16, 2025

शिकायत नहीं, समाधान है असली परवरिश

शिकायत नहीं, समाधान है असली परवरिश

आज के दौर में लगभग हर घर की एक आम कहानी है – बच्चे ठीक से खाना नहीं खाते, पढ़ाई में ध्यान नहीं लगाते और घंटों मोबाइल-फोन या टीवी में व्यस्त रहते हैं। माता-पिता, अपने मन की बात कहने के लिए, कभी दोस्तों से, कभी रिश्तेदारों से और कभी पड़ोसियों से अपने बच्चों की कमियाँ गिनाते रहते हैं।

लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि ऐसा करने से बच्चे पर क्या असर पड़ता होगा?

जब बच्चा बार-बार यह सुनता है कि उसके माता-पिता हर जगह उसकी शिकायत कर रहे हैं, तो उसके दिल और दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि वह केवल “गलत” ही है। धीरे-धीरे वह अपने माता-पिता के प्रति ही नकारात्मक दृष्टिकोण बनाने लगता है। यानी समस्या हल होने की बजाय और गहरी हो जाती है।

असल में, शिकायत करना आसान है लेकिन समाधान खोजना ही सच्ची परवरिश की पहचान है। बच्चे छोटे होते हैं, गलतियाँ करना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अभिभावक का काम केवल कमी ढूँढना नहीं बल्कि उन कमियों को दूर करने के लिए सही रास्ता दिखाना है।

समस्या: शिकायत का दुष्चक्र

  • आत्मविश्वास की कमी – लगातार आलोचना सुनने से बच्चा अपने आप को अयोग्य मानने लगता है।
  • नकारात्मक सोच – उसे लगता है कि वह चाहे कुछ भी करे, माता-पिता संतुष्ट नहीं होंगे।
  • दूरी और विद्रोह – बार-बार शिकायत सुनने से बच्चा माता-पिता से दूरी बनाने लगता है और विरोधी व्यवहार करने लगता है।
  • समाज के सामने हीन भावना – जब रिश्तेदारों या दोस्तों के बीच उसकी बुराई होती है, तो बच्चा खुद को औरों से कमतर महसूस करता है।

समाधान: शिकायत नहीं, संवाद और सहयोग

  • समस्या को समझकर अगर अभिभावक सही दृष्टिकोण अपनाएँ, तो बच्चों का व्यवहार सकारात्मक रूप से बदल सकता है।
  • संवाद और सुनना – बच्चे की बात को ध्यान से सुनें, उसकी समस्या जानें। कई बार बच्चे इसलिए चिड़चिड़े या जिद्दी होते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई उन्हें समझता ही नहीं।
  • उदाहरण प्रस्तुत करें – अगर माता-पिता ही दिन भर मोबाइल पर रहेंगे, तो बच्चे को रोकना कठिन होगा। खुद अच्छा व्यवहार दिखाकर बच्चों को प्रेरित करें।
  • सकारात्मक प्रोत्साहन – केवल गलती पर ध्यान न दें। जब बच्चा अच्छा व्यवहार करता है, तो उसकी प्रशंसा करें।
  • समय और साथ – बच्चे के साथ समय बिताएँ, खेलें, पढ़ाई में रुचि दिखाएँ। अभिभावकों का साथ ही बच्चों को सही दिशा देता है।
  • अनुशासन का संतुलन – न तो अति सख्ती करें, न ही पूरी छूट दें। प्यार और अनुशासन का संतुलित मेल ही बच्चे के व्यक्तित्व को निखारता है।

बच्चों को सुधारने की मनसा से माता - पिता के द्वारा, जाने अनजाने मे की जाने वाली शिकायत उनमें सुधार करने की जगह उनके मनोबल को गिराती हैं। बच्चों की आदतें सुधारने के लिए माता-पिता को धैर्य, संवाद और सकारात्मक दृष्टिकोण की ज़रूरत है। अभिभावक को समझना चाहिए की शिकायत से नहीं, बल्कि समाधान से ही परिवार खुशहाल बनता है और बच्चे आत्मविश्वास के साथ अपने जीवन की राह पर आगे बढ़ते हैं। 

Thursday, August 14, 2025

बच्चों में अच्छी आदतें और अनुशासन का निर्माण – सफलता की पहली सीढ़ी

 बच्चों में अच्छी आदतें और अनुशासन का निर्माण – सफलता की पहली सीढ़ी


हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा पढ़ाई में अच्छा करे, आत्मविश्वासी बने और जीवन में ऊँचाइयों तक पहुँचे। लेकिन केवल प्रतिभा या पढ़ाई ही सफलता की गारंटी नहीं होती—उसके लिए अच्छी आदतें और अनुशासन बेहद जरूरी हैं।

बिना अनुशासन के, बच्चे की ऊर्जा और क्षमता सही दिशा में नहीं जा पाती। अनुशासन वह पुल है जो सपनों को हकीकत से जोड़ता है। लेकिन सवाल यह है—माता-पिता अपने बच्चों में यह गुण कैसे विकसित करें? आइए इस लेख के माध्यम से आज इस विषय पर विस्तार से बात करें।

1. स्वयं उदाहरण बनें – "बच्चे सुनते कम, देखते ज्यादा हैं" :- बच्चे सबसे पहले अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं। यदि आप समय पर उठते हैं, काम में ईमानदारी दिखाते हैं, और लोगों से सम्मानपूर्वक बात करते हैं—तो बच्चा भी इन्हीं गुणों को अपनाएगा।

यदि आप मोबाइल पर समय बर्बाद करते हैं, तो बच्चा भी ऐसा करेगा।

उदाहरण:- अगर आप रोज़ सुबह 6 बजे उठकर व्यायाम करते हैं, तो बच्चे को भी प्रेरणा मिलेगी।

2. दिनचर्या तय करना – जीवन में स्थिरता का आधार:- एक सुव्यवस्थित दिनचर्या बच्चों को अनुशासन सिखाने का सबसे आसान तरीका है। 

  • सुबह उठने का समय तय करें।
  • पढ़ाई, खेलने और आराम के समय को अलग रखें।
  • भोजन और सोने का समय नियमित रखें।

लाभ:

  • बच्चा समय का महत्व समझेगा।
  • पढ़ाई और खेल दोनों में संतुलन रहेगा।

3. स्पष्ट नियम और अपेक्षाएँ – सीमाएँ जरूरी हैं :- बच्चे को यह पता होना चाहिए कि परिवार में क्या सही है और क्या गलत।

  • नियम स्पष्ट और उम्र के अनुसार हों।
  • गलत व्यवहार पर सज़ा से ज्यादा सही मार्गदर्शन दें।

उदाहरण: - "टीवी देखने का समय रोज़ 30 मिनट"—यह स्पष्ट नियम है।

4. प्रोत्साहन और सराहना – सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत :- 

  • अच्छा काम करने पर बच्चे की तारीफ़ करें।
  • यह बच्चे के आत्मविश्वास को बढ़ाता है।
  • वह उस व्यवहार को दोहराने के लिए प्रेरित होता है।

उदाहरण:- "आज तुमने अपना होमवर्क समय पर पूरा किया, मुझे तुम पर गर्व है।"

5. जिम्मेदारी देना – आत्मनिर्भरता की ओर कदम:- 

  • बच्चे को घर के छोटे-छोटे काम दें—
  • अपना बैग खुद तैयार करना।
  • किताबें व्यवस्थित रखना।
  • पौधों को पानी देना।

लाभ:

  • बच्चा जिम्मेदार बनता है।
  • वह सीखता है कि परिवार में सभी का योगदान जरूरी है।

6. धैर्य और निरंतरता – आदतें समय से बनती हैं

  • अच्छी आदतें और अनुशासन एक दिन में नहीं आते।
  • माता-पिता को धैर्य रखना होगा।
  • नियमों का पालन लगातार कराना होगा।

ध्यान रखें:- कभी-कभी बच्चा नियम तोड़ेगा—इसका मतलब यह नहीं कि आप हार मान लें।

7. स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण – बचपन को बचाएँ:- 

  • आज के समय में मोबाइल, टीवी और वीडियो गेम बच्चों के अनुशासन को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
  • स्क्रीन टाइम सीमित करें।
  • इसके बदले किताबें, क्राफ्ट, आउटडोर गेम्स और परिवार के साथ समय बिताने को प्रोत्साहित करें।

8. अनुशासन का मतलब दंड नहीं – सही मार्गदर्शन:-

  • कठोर सज़ा बच्चों में डर पैदा कर सकती है, लेकिन बदलाव नहीं लाती।
  • अनुशासन का मतलब है बच्चों को समझाना, उन्हें आत्मनियंत्रण सिखाना और उनके गलतियों से सीखने में मदद करना।

अंतत: यह कहा जा सकता है कि बच्चों के व्यवहार मे परिवर्तन लाने की प्रक्रिया कठिन जरूर हो सकती है, लेकिन असंभव नहीं। सुचारु और सकारात्म्क रूप से किए गए प्रयास बच्चों में अच्छी आदतों और अनुशासन का निर्माण करते है। लेकिन इसे स्थायी रूप से बनाए रखने के लिए इसमें प्यार, धैर्य, और निरंतरता की जरूरत होती है। जब माता-पिता खुद इन आदतों का पालन करते हैं, तो वे बच्चों के लिए सबसे बड़े प्रेरणास्रोत बनते हैं।

अभिभावकों को यह याद रखना चाहिए कि परिवर्तन कि यह प्रक्रिया धीमी जरूर लेकिन पूर्ण रूप से स्थायी है। अच्छी आदतें और अनुशासन केवल बच्चों के स्कूल जीवन में नहीं, बल्कि उनके पूरे जीवन में सफलता की मजबूत नींव रखते हैं।

Wednesday, August 13, 2025

किशोरावस्था में छात्रों के व्यवहार में बदलाव: कारण, समस्याएँ, समाधान और अभिभावकों का कर्तव्य

 किशोरावस्था में छात्रों के व्यवहार में बदलाव: कारण, समस्याएँ, समाधान और अभिभावकों का कर्तव्य

किशोरावस्था, जिसे टीन एज भी कहा जाता है, जीवन का वह दौर है जब बच्चा धीरे-धीरे वयस्कता की ओर बढ़ रहा होता है। यह उम्र लगभग 13 से 19 वर्ष के बीच मानी जाती है। इस समय शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर कई बड़े बदलाव आते हैं, जो उनके सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने के तरीकों को प्रभावित करते हैं। 

किशोरावस्था के दौरान होने वाले ये परिवर्तन अक्सर किशोरों में तनाव और बेचैनी का कारण भी बन सकते हैं। वे अपने शरीर और भावनाओं में हो रहे बदलावों को लेकर चिंतित हो सकते हैं, और अपने साथियों और परिवार के साथ संबंधों में भी बदलाव का अनुभव कर सकते हैं। यह सबके जीवन मे यह एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन माता-पिता और शिक्षकों के लिए यह आवश्यक है कि वे किशोरों को समझें और इस दौरान उनका समर्थन करें. 

1. बदलाव आने के प्रमुख कारण

शारीरिक परिवर्तन:- इस उम्र में हार्मोनल बदलाव तेज़ी से होते हैं। लड़कों में दाढ़ी-मूंछ, भारी आवाज़ और मांसपेशियों का विकास, वहीं लड़कियों में मासिक धर्म की शुरुआत, शरीर के आकार में परिवर्तन और त्वचा संबंधी समस्याएँ दिखाई देती हैं। इन बदलावों से आत्म-छवि (Self-image) को लेकर संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

मानसिक और भावनात्मक परिवर्तन:- किशोर अपने जीवन में "मैं कौन हूँ" का उत्तर खोजने लगते हैं। वे अपनी पहचान (Identity) बनाने की कोशिश करते हैं। मूड स्विंग्स, भावनात्मक संवेदनशीलता और कभी-कभी चिड़चिड़ापन इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

ध्यान भंग होने के कारण:- आज के समय में मोबाइल, सोशल मीडिया, वीडियो गेम और इंटरनेट पढ़ाई से ध्यान हटाने के सबसे बड़े कारण हैं। इसके अलावा दोस्तों का प्रभाव (Peer Pressure) और एक ही तरह की पढ़ाई में रुचि कम होना भी ध्यान भंग करता है।

विचारों में परिवर्तन:- इस उम्र में किशोर अपने विचार बनाने लगते हैं। वे परिवार के नियमों और परंपराओं पर सवाल उठाते हैं, तुलना करते हैं और नए प्रयोग करना चाहते हैं।

2. सामान्य समस्याएँ

  • पढ़ाई में ध्यान की कमी – पढ़ाई की बजाय मनोरंजन या मोबाइल में अधिक समय देना।
  • विद्रोही स्वभाव – माता-पिता और शिक्षकों की सलाह को अनदेखा करना।
  • गलत संगत – नकारात्मक आदतें और जोखिम भरे व्यवहार अपनाना।
  • तनाव और चिंता – भविष्य, परीक्षा, रिश्ते या शारीरिक दिखावे को लेकर चिंता।
  • अकेलापन और अवसाद – परिवार से दूरी और आत्मविश्वास में कमी।

3. संभावित समाधान

सकारात्मक संवाद:- माता-पिता रोज़ाना कुछ समय अपने बच्चे से खुलकर बात करें। उन्हें सुना जाए और बिना तुरंत आलोचना किए उनके विचारों को समझा जाए।

समय प्रबंधन:- पढ़ाई, खेल, मनोरंजन और आराम के लिए एक संतुलित दिनचर्या बनाई जाए। छोटे-छोटे लक्ष्य तय करके उन्हें पूरा करने पर सराहना की जाए।

डिजिटल अनुशासन:- स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखा जाए। मोबाइल का उपयोग सीमित और निगरानी के साथ हो।

अच्छे आदर्श (Role Models):- घर में बड़े अपने व्यवहार से बच्चों को अनुशासन और सकारात्मक सोच का उदाहरण दें। प्रेरणादायक व्यक्तियों की कहानियाँ साझा करें।

सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ:- खेल, कला, संगीत और सामाजिक कार्य में भागीदारी से आत्मविश्वास और टीमवर्क की भावना बढ़ती है।

मनोवैज्ञानिक परामर्श:- यदि बच्चा लंबे समय तक उदास, गुस्सैल या नकारात्मक सोच में उलझा हो तो काउंसलर की मदद ली जाए।

4. अभिभावकों का कर्तव्य

  • समझ और धैर्य रखना – बदलाव को विकास का स्वाभाविक हिस्सा मानना।
  • विश्वास का माहौल बनाना – ताकि बच्चा अपने मन की बातें बिना डर के कह सके।
  • निजता का सम्मान – उनकी प्राइवेसी बनाए रखते हुए सही मार्गदर्शन देना।
  • सकारात्मक अनुशासन अपनाना – डांट या सज़ा की बजाय समझदारी से नियम लागू करना।
  • निर्णय लेने का अवसर देना – ताकि उनमें जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता विकसित हो।
  • मूल्य शिक्षा देना – नैतिकता, सहानुभूति और जिम्मेदारी का बोध कराना।

किशोरावस्था को  "तूफान और तनाव की अवस्था" भी कहा जाता है यह जीवन की  संवेदनशील  अवस्था के साथ एक महत्वपूर्ण चरण भी है। यदि इस समय बच्चों को सही मार्गदर्शन, विश्वास और प्यार मिले तो वे आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और सकारात्मक सोच वाले वयस्क बन सकते हैं। अभिभावकों का धैर्य, समझ और सहयोग ही इस परिवर्तनशील दौर में उनके सबसे बड़े सहारे होते हैं।


Monday, July 21, 2025

दिव्यांगता (Divyangta) का अर्थ और भारतीय कानून के अनुसार इसके प्रकार

दिव्यांगता (Divyangta) का अर्थ और भारतीय कानून के अनुसार इसके प्रकार 

दिव्यांगता (Divyangta) का अर्थ है—किसी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या संवेदनात्मक क्षमताओं में ऐसा दीर्घकालिक बाधा जो उसके दैनिक जीवन के कार्यों को करने में अड़चन पैदा करती हो। सरल भाषा में कहें तो यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार, संचार, या सामाजिक भागीदारी में कठिनाई होती है।


भारतीय कानून के अनुसार दिव्यांगता की परिभाषा:

  • RPWD Act 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) के अनुसार, दिव्यांग व्यक्ति वह है—
  • "जिसे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या संवेदी दुर्बलता है जो लंबे समय तक बनी रहती है और उसे समाज में बराबरी के आधार पर भाग लेने में बाधा पहुंचाती है।"

भारतीय कानून (RPWD Act, 2016) के अनुसार दिव्यांगता के प्रकार (Types of Disability):

भारत सरकार ने 21 प्रकार की दिव्यांगता को मान्यता दी है। इन्हें मुख्यतः 5 वर्गों में बांटा जा सकता है:

1. शारीरिक दिव्यांगता (Physical Disability):

  • बौनापन (Dwarfism)
  • अस्थि बाधित (Locomotor Disability)
  • मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (Muscular Dystrophy)
  • एसिड अटैक पीड़ित (Acid Attack Victim)
  • सेलीब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy)
  • पोलियो या किसी कारणवश अंग का उपयोग न कर पाना

2. बौद्धिक दिव्यांगता (Intellectual Disability):

  • बौद्धिक मंदता (Intellectual Disability)
  • विशिष्ट शिक्षा सम्बन्धी अक्षमता (Specific Learning Disabilities)
  • जैसे – डिस्लेक्सिया, डिस्कैल्कुलिया
  • स्वायत्तता विकार (Autism Spectrum Disorder)

3. मानसिक व्यवहार संबंधी विकार (Mental Behaviour/Illness):

  • मानसिक रोग (Mental Illness)
  • जैसे – अवसाद (Depression), स्किज़ोफ्रेनिया आदि

4. दृश्य और श्रवण दिव्यांगता (Visual & Hearing Disabilities):

  • दृष्टिहीनता (Blindness)
  • कम दृष्टि (Low Vision)
  • बहरापन (Deafness)
  • कम सुनाई देना (Hard of Hearing)
  • बधिर-बोल न सकने वाले (Deaf and Mute)

5. विविध दिव्यांगता (Multiple & Other Disabilities):

  • विविध दिव्यांगता (Multiple Disabilities) – दो या अधिक दिव्यांगताओं का होना
  • थैलेसेमिया
  • हीमोफीलिया
  • सिकल सेल रोग (Sickle Cell Disease)
  • क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल कंडीशन – जैसे मल्टीपल स्क्लेरोसिस, पार्किंसन रोग
  • स्पीच एंड लैंग्वेज डिसएबिलिटी (बोलने और भाषा में अक्षम)


कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा चींटी अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके दो बच्चे थे, जो रोज़ स्कूल जाते थे। एक दिन बच्चों ने मासूमियत से ...