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Wednesday, January 14, 2026

स्कूल में परामर्श और मार्गदर्शन की जरूरत क्यों है?

स्कूल में परामर्श और मार्गदर्शन की जरूरत क्यों है?


अक्सर यह मान लिया जाता है कि जैसे-जैसे बच्चा उम्र के साथ शारीरिक रूप से बढ़ता है, वैसे-वैसे उसका मानसिक विकास भी अपने-आप पूरा हो जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग होती है।

बच्चा बाहर से भले ही बड़ा दिखने लगे, लेकिन उसके भीतर एक लगातार संघर्ष चल रहा होता है।


जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके मन में प्रश्न, डर, असमंजस और भावनाएँ भी गहराने लगती हैं। वह इस दुविधा में रहता है कि अपने मन की बात किससे कहे, कौन उसकी बात बिना डाँटे, बिना तुलना किए, बिना जज किए समझेगा। दुर्भाग्यवश, ऐसे समय में समाज और कई बार माता-पिता भी उस पर अपनी अपेक्षाएँ थोपने लगते हैं — अच्छे अंक लाओ, प्रतियोगिता में आगे रहो, हमारी उम्मीदों पर खरे उतरो।


यहाँ सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हम यह समझ ही नहीं पाते कि शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास होना अनिवार्य नहीं है। कई बच्चे मानसिक रूप से उतने मजबूत नहीं होते, जितना उनसे अपेक्षित कर लिया जाता है। परिणामस्वरूप वे चुप हो जाते हैं, भीतर-ही-भीतर घुटने लगते हैं या फिर उनका व्यवहार चिड़चिड़ा और आक्रामक हो जाता है।


ऐसी स्थिति में बच्चे को सबसे अधिक आवश्यकता होती है उस व्यक्ति की, जो उसकी भावनाओं को समझ सके, जो उसकी बात ध्यान से सुने और उसे यह एहसास दिलाए कि उसकी समस्या महत्वपूर्ण है। यही भूमिका परामर्श निभाता है।


स्कूल की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि:


बच्चा अपना अधिकांश समय स्कूल में बिताता है

कई बार वह घर की तुलना में स्कूल में अधिक सुरक्षित महसूस करता है

शिक्षक समस्या देख तो लेते हैं, लेकिन हर समस्या का समाधान कर पाना उनके लिए संभव नहीं होता


ऐसे में स्कूल में प्रशिक्षित परामर्शदाता होना आवश्यक हो जाता है, जो बच्चे की मानसिक स्थिति को समझ सके और समय रहते उसकी मदद कर सके।


मार्गदर्शन और परामर्श मिलकर क्या करते हैं?


मार्गदर्शन बच्चे को सही दिशा दिखाता है — पढ़ाई, विषय चयन और भविष्य के विकल्पों में

परामर्श बच्चे के मन के बोझ को हल्का करता है — डर, तनाव, दबाव और असमंजस को समझकर

दोनों मिलकर बच्चे को यह सिखाते हैं कि

वह अकेला नहीं है, उसकी बात सुनी जाएगी और उसकी समस्या का समाधान संभव है।


निष्कर्ष 


आज के समय में स्कूल केवल ज्ञान देने का केंद्र नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी निभाने वाला स्थान भी होना चाहिए।

अगर हम चाहते हैं कि बच्चे केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ, संतुलित और आत्मविश्वासी बनें, तो स्कूल में परामर्श और मार्गदर्शन की व्यवस्था अनिवार्य है।


बच्चे को सबसे ज्यादा ज़रूरत उस व्यक्ति की होती है,

जो उसकी बात सुने नहीं, बल्कि उसे समझे।

परामर्श और मार्गदर्शन: भ्रम, अंतर और वास्तविकता

 परामर्श और मार्गदर्शन: भ्रम, अंतर और वास्तविकता


आज हमारे समाज में परामर्श (Counselling) और मार्गदर्शन (Guidance) शब्दों का प्रयोग बहुत आम हो गया है। लेकिन अक्सर लोग इन दोनों को एक ही अर्थ में इस्तेमाल कर लेते हैं। कोई शिक्षक अगर किसी छात्र की बात सुन ले, उसे समझा दे या कोई सुझाव दे दे, तो उसे भी परामर्श कह दिया जाता है। यहीं से भ्रांति शुरू होती है।

वास्तव में परामर्श और मार्गदर्शन एक जैसे नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के दो अलग-अलग पहलू हैं।

मार्गदर्शन क्या है?

मार्गदर्शन का अर्थ है — रास्ता दिखाना।

जब किसी व्यक्ति को यह समझ नहीं आता कि उसे क्या करना चाहिए, किस दिशा में जाना चाहिए, तब कोई अनुभवी व्यक्ति अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर उसे दिशा देता है, यही मार्गदर्शन है।

उदाहरण:

  • छात्र को विषय चुनने में मदद करना
  • करियर के विकल्प समझाना
  • पढ़ाई की रणनीति बताना
  • जीवन से जुड़े सामान्य निर्णयों पर सलाह देना

मार्गदर्शन सूचना और सुझाव पर आधारित होता है। इसमें समस्या की गहराई में जाने की बजाय समाधान का रास्ता बताया जाता है।


परामर्श क्या है?

परामर्श इससे थोड़ा अलग और गहरा विषय है।

परामर्श का अर्थ है — व्यक्ति की समस्या को समझना, उसकी भावनाओं को जानना और उसे स्वयं समाधान तक पहुँचने में मदद करना।


उदाहरण:

  • छात्र का तनाव, डर, आत्मविश्वास की कमी
  • अवसाद, गुस्सा, भ्रम, असमंजस
  • पारिवारिक या व्यक्तिगत मानसिक समस्याएँ

परामर्श में सिर्फ सलाह नहीं दी जाती, बल्कि सुनना, समझना और सही तरीके से बातचीत करना सबसे महत्वपूर्ण होता है।

शिक्षक से बात करना: परामर्श या मार्गदर्शन?

अगर कोई छात्र स्कूल में किसी अध्यापक के पास जाकर अपनी समस्या बताता है और अध्यापक उसे समझाकर कोई समाधान सुझा देता है, तो अधिकतर मामलों में वह मार्गदर्शन होता है, न कि पूर्ण परामर्श।


यदि शिक्षक विषय, पढ़ाई या सामान्य जीवन की सलाह दे रहा है → मार्गदर्शन

यदि शिक्षक छात्र की मानसिक स्थिति, भावनात्मक परेशानी को गहराई से समझकर विशेष तरीके से बातचीत करता है → तब यह परामर्श की ओर बढ़ता है


परामर्श और मार्गदर्शन में मुख्य अंतर

बिंदु मार्गदर्शन परामर्श

उद्देश्य रास्ता दिखाना समस्या की जड़ समझना

प्रकृति सामान्य सलाह गहन और संवेदनशील

प्रक्रिया सरल बातचीत वैज्ञानिक व व्यवस्थित

देने वाला शिक्षक, अभिभावक, वरिष्ठ प्रशिक्षित परामर्शदाता

समय कम अपेक्षाकृत अधिक


क्या परामर्श हर कोई दे सकता है?

नहीं।

परामर्श एक संवेदनशील प्रक्रिया है। इसमें व्यक्ति के मन, भावनाओं और मानसिक स्थिति से जुड़ा काम होता है। गलत परामर्श नुकसान भी पहुँचा सकता है।


परामर्श देने के लिए जरूरी है:


मनोविज्ञान की समझ

  • विशेष प्रशिक्षण
  • गोपनीयता बनाए रखने की क्षमता
  • धैर्य और सहानुभूति
  • परामर्श की प्रक्रिया क्या है?
  • परामर्श कोई साधारण बातचीत नहीं होती। इसकी एक प्रक्रिया होती है:
  • समस्या को ध्यान से सुनना
  • व्यक्ति पर विश्वास बनाना
  • उसकी भावनाओं को समझना
  • समस्या की जड़ तक पहुँचना
  • समाधान खोजने में सहायता करना

इसमें परामर्शदाता समाधान थोपता नहीं, बल्कि व्यक्ति को स्वयं सही निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।


कौन परामर्श दे सकता है?

  • प्रशिक्षित काउंसलर
  • मनोवैज्ञानिक
  • स्कूल/कॉलेज के प्रोफेशनल काउंसलर
  • मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ

शिक्षक और अभिभावक मार्गदर्शन दे सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सही परामर्शदाता तक पहुँचने में मदद कर सकते हैं।


निष्कर्ष

परामर्श और मार्गदर्शन दोनों ही जीवन में अत्यंत आवश्यक हैं, लेकिन दोनों को एक जैसा समझना गलत है।

जहाँ मार्गदर्शन दिशा देता है, वहीं परामर्श मन को संभालता है।

आज के बदलते समय में हमें यह समझना होगा कि हर समस्या सिर्फ सलाह से हल नहीं होती, कभी-कभी सही परामर्श जीवन को नई दिशा दे सकता है।


शारीरिक स्वास्थ्य जितना जरूरी है, मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है।

Thursday, January 8, 2026

काउंसलिंग: मानसिक स्वास्थ्य की ओर एक ज़रूरी कदम

 काउंसलिंग: मानसिक स्वास्थ्य की ओर एक ज़रूरी कदम


काउंसलिंग शब्द से हम सभी भली-भांति परिचित हैं, लेकिन इसके वास्तविक अर्थ और इसके सकारात्मक प्रभावों को आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग ठीक से नहीं समझ पाया है। अधिकतर लोगों की धारणा है कि काउंसलिंग केवल मानसिक रूप से कमजोर या “पागल” लोगों के लिए होती है, या फिर दो लोगों के बीच होने वाली सामान्य बातचीत को ही काउंसलिंग मान लिया जाता है। भारतीय समाज की यह सोच न केवल अधूरी है, बल्कि कई बार नुकसानदायक भी साबित होती है।


आज के समय की सच्चाई यह है कि समाज और जीवनशैली में आए तेज़ बदलावों ने हमारे सोचने, महसूस करने और जीने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। बाहर से हम भले ही शारीरिक रूप से मजबूत दिखते हों, लेकिन अंदर से मानसिक रूप से उतने ही कमजोर होते जा रहे हैं। काम का दबाव, प्रतिस्पर्धा, रिश्तों में तनाव, अकेलापन, भविष्य की चिंता और सामाजिक अपेक्षाएँ—ये सभी धीरे-धीरे हमारे मन पर बोझ बन जाती हैं।


लोग काउंसलिंग लेने से क्यों डरते हैं?


सबसे बड़ा कारण है समाज का डर। कई लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने काउंसलिंग ली तो समाज उन्हें “पागल” या “कमज़ोर” का टैग लगा देगा। यही डर उन्हें अपनी मानसिक परेशानी को छुपाने पर मजबूर कर देता है। परिणामस्वरूप, वे भीतर ही भीतर टूटते रहते हैं और कभी-कभी अपनी ज़िंदगी को ऐसे नर्क की ओर धकेल देते हैं, जिसका परिणाम बहुत घातक भी हो सकता है।


काउंसलिंग क्या है?


काउंसलिंग कोई साधारण बातचीत नहीं होती। यह एक वैज्ञानिक और पेशेवर प्रक्रिया है, जिसमें प्रशिक्षित काउंसलर व्यक्ति की बातों को बिना जज किए सुनता है, उसकी भावनाओं को समझता है और उसे सही दिशा में सोचने, निर्णय लेने व समस्याओं से निपटने में मदद करता है।


हमें काउंसलिंग क्यों लेनी चाहिए?

  • मानसिक तनाव और चिंता को समझने व कम करने के लिए
  • अपने विचारों और भावनाओं को स्पष्ट करने के लिए
  • जीवन के कठिन फैसलों में सही मार्गदर्शन पाने के लिए
  • रिश्तों में आ रही समस्याओं को सुलझाने के लिए
  • आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बढ़ाने के लिए

काउंसलिंग कब लेनी चाहिए?

  • जब तनाव या उदासी लंबे समय तक बनी रहे
  • जब नींद, भूख या व्यवहार में लगातार बदलाव दिखे
  • जब गुस्सा, डर या निराशा पर नियंत्रण न रहे
  • जब जीवन में आगे बढ़ने की दिशा समझ न आए

काउंसलिंग की ज़रूरत किसे है?

सच्चाई यह है कि काउंसलिंग की ज़रूरत हर उस व्यक्ति को हो सकती है जो इंसान है। यह केवल बीमार या कमजोर लोगों के लिए नहीं, बल्कि छात्रों, कामकाजी लोगों, माता-पिता, दंपतियों और बुज़ुर्गों—सभी के लिए उपयोगी है।

  • काउंसलिंग के सकारात्मक परिणाम
  • मानसिक शांति और संतुलन
  • समस्याओं से निपटने की बेहतर क्षमता
  • रिश्तों में सुधार
  • आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच
  • जीवन की गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार

निष्कर्ष

समाज के डर से मानसिक पीड़ा को सहते रहना कोई समझदारी नहीं है। जैसे हम शारीरिक बीमारी में डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मानसिक परेशानी में काउंसलर के पास जाना भी उतना ही सामान्य और ज़रूरी होना चाहिए। काउंसलिंग कमजोरी नहीं, बल्कि अपने जीवन को बेहतर बनाने की एक साहसी और समझदार पहल है।

अब समय आ गया है कि हम इस टैबू को तोड़ें और मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही गंभीरता दें, जितनी हम शारीरिक स्वास्थ्य को देते हैं।

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा

कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा चींटी अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके दो बच्चे थे, जो रोज़ स्कूल जाते थे। एक दिन बच्चों ने मासूमियत से ...