अंधेरे की ओट मे, ये जो दीया जलता है
दुनिया को रोशन करने की चाह मे खुद को वो छलता है
नजाने किस भ्रम मे वो रखता है खुद को
जल कर खुद कतरा कतरा पिघलता है
"एक समाज, अनेक बँटवारे" साधारण से दिखने वाले समाज को चंद लोगों ने बांट दिया,अलग धड़ों मे सर्वप्रथम बंटवारा था स्त्री और पुरुष ...
No comments:
Post a Comment