15 वर्षों के शिक्षण के दौरान, अक्सर मैंने यह अनुभव किया है कि, आजकल के अधिकतर अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों से शिकायत रहती है कि, उनका बच्चा उनकी बातें नहीं सुनता या फिर उन्हें इगनोर कर देता है। अपने से बड़ों के साथ उनका व्यवहार तथा बातचीत का तरीका सही नहीं है, वह दिनभर फोन चलाता रहता है या फिर खाना खाने मे आनाकानी करता है, आदि। इसके अतिरिक्त भी कई तरह के सोच रखने वाले अभिभावकों से समय समय पर मिलना-जुलना लगा रहता है और सभी कि राय या फिर शिकायत कहे आदि सुनने को मिलती रहती है। उनके पास बच्चों के व्यवहार से संबन्धित समस्याएँ तो अनगिनत रहती है लेकिन समाधान के नाम पर उनके पास होता है,एक तरह का डोमिनेटिंग बिहेवियर, उनका मानना है कि बच्चों को डांट या शारीरिक दंड इत्यादि से सुधारा जा सकता है। इसके अलावा समाधान के नाम पर अभिभावक अपने बच्चे कि तुलना उसके हम उम्र बच्चों से करने लगते है। वो ऐसा इसलिए करते है, क्योंकि शायद उन्हें लगता है कि इस तरह एक दूसरे से तुलना करके या फिर शारीरिक दंड आदि से उनका बच्चा सुधार जाएगा या फिर मोटीवेट होगा। लेकिन आज वर्तमान समय मे देखा गया है कि ...