Wednesday, January 7, 2026

माता-पिता, गुरु और देवता: दोहरी मानसिकता का सच

 माता-पिता, गुरु और देवता: दोहरी मानसिकता का सच


माता, पिता, गुरु और देवता—ये चारों शब्द हमारे जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को गुरु और देवता से भी ऊपर प्रथम स्थान दिया गया है। इसका कारण स्पष्ट है—जीवन में सही और गलत का पहला ज्ञान हमें माता-पिता से ही मिलता है। बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर होता है और माता-पिता उसके प्रथम गुरु। घर-परिवार ही वह स्थान है जहाँ एक बालक के नैतिक संस्कारों की नींव रखी जाती है और उसे समाज का एक उपयोगी नागरिक बनने की दिशा दी जाती है।


इसके बाद जीवन में गुरु का स्थान आता है, जो उस नींव पर ज्ञान, अनुशासन और विवेक का निर्माण करता है। अर्थात बालक के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता और गुरु दोनों की संयुक्त भूमिका होती है।


वर्तमान समय की विडंबना


आज के समय में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिलता है। एक ओर माता-पिता यह दावा करते हैं कि वे अपने बच्चों की परवरिश अच्छे से कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यही माता-पिता यह कहते हुए भी नहीं हिचकिचाते कि आज का युवा बिगड़ रहा है या गलत रास्ते पर जा रहा है। यह स्थिति माता-पिता की दोहरी मानसिकता को उजागर करती है।


यदि हम सचमुच अपने बच्चों की परवरिश सही ढंग से कर रहे हैं, तो फिर युवा पीढ़ी के भटकने का दोष केवल बच्चों पर क्यों? इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि या तो हम अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाने में असफल हो रहे हैं, या फिर हम स्वयं उस मार्ग पर नहीं चल रहे, जिस पर अपने बच्चों को चलने की सीख दे रहे हैं।


पहले और अब का अंतर


यदि हम कुछ दशक पीछे जाएँ, तो पाएँगे कि उस समय परिवार और बच्चे जीवन के केंद्र में हुआ करते थे। घर के अन्य सदस्य—दादा-दादी, चाचा-चाची—भी बच्चों के संस्कार निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते थे। उस दौर में भौतिक सुख-सुविधाओं और धन की दौड़ उतनी प्रभावशाली नहीं थी। जीवन सरल था और संबंधों में अपनापन अधिक।


इसके विपरीत आज का समय भौतिकवाद से घिरा हुआ है। माता-पिता बच्चों के नैतिक विकास और उन्हें अच्छा नागरिक बनाने की बात तो करते हैं, लेकिन स्वयं धन, पद और भौतिक सुखों की दौड़ में पूरी तरह उलझे रहते हैं। आज पैसा जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया है और बच्चे कई बार दूसरी प्राथमिकता। यही कारण है कि पालन-पोषण केवल नाम मात्र का रह गया है।


माता-पिता की वास्तविक जिम्मेदारी


यह कहना गलत होगा कि आज के माता-पिता जानबूझकर अपने बच्चों को गलत रास्ते पर ले जाना चाहते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि वे भौतिक संसार में इतने व्यस्त हो चुके हैं कि बच्चों के साथ समय बिताना, उनसे संवाद करना और उन्हें व्यवहारिक एवं नैतिक शिक्षा देना सीमित होता जा रहा है।


बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं ईमानदारी, संयम, संवेदना और जिम्मेदारी का पालन नहीं करेंगे, तो केवल उपदेश देकर बच्चों को सही मार्ग पर नहीं लाया जा सकता।


निष्कर्ष


जब तक हम अपनी दोहरी मानसिकता से ऊपर नहीं उठते और अपनी मूलभूत जिम्मेदारी को नहीं समझते, तब तक हम बच्चों का सर्वांगीण विकास नहीं कर सकते। माता-पिता को यह स्वीकार करना होगा कि बच्चों के चरित्र और भविष्य का प्रतिबिंब उनके अपने आचरण में दिखाई देता है।


सही अर्थों में अच्छी परवरिश वही है, जिसमें माता-पिता स्वयं आदर्श बनें। जब विचार, व्यवहार और शिक्षा—तीनों में एकरूपता होगी, तभी हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं, जहाँ युवा सही दिशा में आगे बढ़े और राष्ट्र के निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाए।

No comments:

Post a Comment

"एक समाज, अनेक बँटवारे"

  "एक समाज, अनेक बँटवारे" साधारण से दिखने वाले  समाज को चंद लोगों ने बांट दिया,अलग धड़ों मे सर्वप्रथम बंटवारा था  स्त्री और पुरुष ...