नदियों का मौन

 नदियाँ सूख जाने के पश्चात, 

बदल जाती है, मरुस्थल मे

उसकी नियति मे 

नहीं लिखा था, 

मरुस्थल हो जाना, 

बल्कि मानवीय गतिविधियों और संवेदनाओं ने 

बदल दिया, 

नदियों के शोर को, 

मौन मे, 

कुछ इस तरह 

नदियों के 

मौन ने बना दिया 

उसे, मरुस्थल.

यह फ़क़त  अंत नहीं था, 

नदियों का.

ये तो अंत था, 

नदियों पर निर्भर 

उन सभी प्रजातियों का, 

जिस पर टिकी थी 

संपूर्ण मानव सभ्यता.



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