रेड पेन से ग्रीन पेन तक: मूल्यांकन की बदलती सोच पर एक विमर्श
भूमिका: एक परिचित दृश्य और एक अनकहा प्रभाव
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में वर्षों तक एक दृश्य बेहद सामान्य रहा है—छात्र की उत्तरपुस्तिका, उस पर लाल स्याही के मोटे निशान, जगह-जगह कटे हुए उत्तर और हाशिये पर लिखी गई टिप्पणियाँ। यह केवल कॉपी जाँचने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि शिक्षा की एक गहरी जमी हुई मानसिकता थी।
रेड पेन यहाँ सिर्फ एक रंग नहीं था, बल्कि सत्ता, अनुशासन और निर्णय का प्रतीक था।
आज जब सीबीएसई रेड पेन के प्रयोग से दूरी बनाने की बात करता है, तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल उठते हैं-
क्या केवल पेन का रंग बदल देने से कुछ बदल जाएगा?
जब मूल्यांकन की प्रक्रिया वही है, तो रेड पेन पर आपत्ति क्यों?
इन सवालों के उत्तर रंग में नहीं, बल्कि सोच के बदलाव में छिपे हैं।
पहले की शिक्षा व्यवस्था: डर आधारित अनुशासन
कुछ दशक पहले तक शिक्षा व्यवस्था का मूल ढाँचा बिल्कुल स्पष्ट था। शिक्षक को “अंतिम सत्य” माना जाता था और छात्र का काम था उस सत्य को बिना प्रश्न स्वीकार करना। गलती करना कमजोरी समझी जाती थी और मूल्यांकन का उद्देश्य सीख को सुधारना नहीं, बल्कि छँटनी और नियंत्रण करना था।
रेड पेन इसी सोच का औजार था।
लाल स्याही के निशान यह संदेश देते थे—
“यह गलत है, और गलत होना स्वीकार्य नहीं है।”
यह मान लिया गया था कि डर से अनुशासन आएगा और अनुशासन से सफलता। लेकिन इस प्रक्रिया में यह नहीं देखा गया कि डर के साथ-साथ बच्चे का आत्मविश्वास, जिज्ञासा और सीखने का आनंद भी खत्म हो रहा है।
वर्तमान शिक्षा दृष्टिकोण: सीख केंद्र में, छात्र केंद्र में
आज शिक्षा की दुनिया में दृष्टिकोण बदल रहा है। शिक्षक अब केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक (Facilitator) माना जा रहा है। गलती को कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा समझा जाने लगा है।
मूल्यांकन का उद्देश्य अब यह तय करना नहीं है कि कौन “अच्छा” है और कौन “कमज़ोर”, बल्कि यह देखना है कि छात्र कहाँ खड़ा है और उसे आगे कैसे बढ़ाया जा सकता है।
इसी संदर्भ में रंग और भाषा भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, क्योंकि वे सीधे छात्र के मनोविज्ञान को प्रभावित करते हैं।
शोध यह स्पष्ट करता है कि
डर से सीख सीमित होती है,
जबकि सुरक्षा और प्रोत्साहन से सीख गहरी और टिकाऊ बनती है।
क्या सच में पेन का रंग फर्क डालता है?
अक्सर यह तर्क दिया जाता है—
“चेकिंग तो चेकिंग है। रेड हो या ग्रीन, गलती तो गलती ही रहेगी।”
यह तर्क तकनीकी रूप से सही, लेकिन मानसिक रूप से अधूरा है।
हाँ, गलती वही रहती है।
हाँ, अंक वही रहते हैं।
लेकिन जो बदलता है, वह है छात्र की अनुभूति।
लाल रंग अवचेतन रूप से खतरे, अस्वीकृति और असफलता का संकेत देता है। बच्चा जब अपनी कॉपी में बार-बार लाल निशान देखता है, तो उसे लगता है कि उसकी पहचान ही उसकी गलतियों से जुड़ गई है।
इसके विपरीत, हरा या नीला रंग संवाद, सुधार और मार्गदर्शन का भाव देता है। वही गलती जब सौम्य रंग और सकारात्मक भाषा में बताई जाती है, तो वह अपमान नहीं, सीख बन जाती है।
यह फर्क कागज़ पर नहीं, मन पर पड़ता है।
तो बदलाव की ज़रूरत क्यों पड़ी?
आज का छात्र केवल किताबों के बोझ से नहीं जूझ रहा, बल्कि
प्रतिस्पर्धा, सोशल प्रेशर, करियर की अनिश्चितता और अपेक्षाओं के दबाव से भी घिरा हुआ है। ऐसे में बार-बार लाल निशानों से भरी कॉपियाँ उसके भीतर यह भावना पैदा करती हैं कि वह “काबिल नहीं है”।
इसका सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। कई बच्चे सीखने के बजाय गलती छुपाने लगते हैं। डर आधारित मूल्यांकन समझ को पीछे छोड़कर रटने की संस्कृति को बढ़ावा देता है।
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) इसी समस्या को पहचानते हुए कहती है—
“Assessment should be for learning, not of learning.”
यानी मूल्यांकन सीखने के लिए हो, सीख को जज करने के लिए नहीं।
क्या यह तरीका सच में काम करेगा?
यह मान लेना भोला होगा कि केवल पेन बदल देने से शिक्षा व्यवस्था बदल जाएगी।
सच यह है कि
केवल रंग बदलने से चमत्कार नहीं होगा,
लेकिन यह सोच बदलने की शुरुआत जरूर है।
यदि भाषा वही कठोर रहे,
यदि तुलना और तिरस्कार बना रहे,
यदि ध्यान केवल गलतियों पर ही केंद्रित हो,
तो ग्रीन पेन भी रेड पेन जैसा ही असर करेगा।
लेकिन यदि शिक्षक सुधारात्मक टिप्पणी करें, प्रयास की सराहना करें और गलती के साथ दिशा भी दें, तो वही मूल्यांकन सीखने का सशक्त साधन बन सकता है।
रेड पेन का विरोध, अनुशासन का विरोध नहीं
यह समझना आवश्यक है कि रेड पेन हटाने का अर्थ ढिलापन नहीं है। यह अनुशासन को खत्म करने की नहीं, बल्कि अनुशासन से डर हटाने की कोशिश है।
अनुशासन जब समझ से आता है, तो टिकाऊ होता है।
और जब डर से आता है, तो अस्थायी।
निष्कर्ष: बहस रंग की नहीं, सोच की है
रेड पेन बनाम ग्रीन पेन की बहस दरअसल रंगों की नहीं, दृष्टिकोण की बहस है।
यह स्वीकार करना कि बच्चा मशीन नहीं है,
गलती सीखने की सीढ़ी है,
और मूल्यांकन संवाद हो सकता है—
यही इस बदलाव का असली उद्देश्य है।
“जब शिक्षा डर छोड़ देती है, तभी सीखना शुरू होता है।”
No comments:
Post a Comment