"एक समाज, अनेक बँटवारे"

 

"एक समाज, अनेक बँटवारे"


साधारण से दिखने वाले 

समाज को चंद लोगों ने बांट दिया,अलग धड़ों मे

सर्वप्रथम बंटवारा था 

स्त्री और पुरुष का,

और इस समूह मे, 

स्त्री को रखा था 

कमजोर वर्ग मे, और 

पुरुष था डोमिनेंट, 

स्त्री पर

इसके पश्चात, 

समाज का बंटवारा हुआ, 

अमीर और गरीब के मध्य

गरीबों को वंचित रखा गया उनके अधिकारों से, 

फिर वर्ण के नाम पर 

हुआ बंटवारा, 

इस बंटवारे मे भी था 

एक और बंटवारा 

जातियों का

पुनः, समाज के नव निर्माण मे योगदान दिया, चंद विद्वानों ने, 

जिन्होंने बनाये कुछ नियम और  नियमों को दिया नाम मज़हब का.

इस तरह, साधारण से समाज को बना दिया गया 

और जटिल

जहाँ हर एक बंटवारे ने 

खड़ी की समस्या, 

जहाँ समाधान था, युद्ध 

दो अलग समूह के मध्य, 

जीता वही जिसके पास था, बल

और हारने वाली श्रेणि को हमेशा रखा गया वंचित, उनके अधिकारों से

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भूपेंद्र रावत पथिक

Pathikbhupendra.co.in

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