आज के समय का सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य: पेरेंटिंग
यदि आज के वर्तमान समय में कोई मुझसे पूछे कि सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य (Challenging Task) क्या है, तो मेरा सीधा और स्पष्ट उत्तर होगा—पेरेंटिंग (Parenting)।
कई लोगों को यह लग सकता है कि बच्चे पैदा करना और उनका पालन-पोषण करना कोई बड़ी बात नहीं है। वास्तव में, बच्चों का लालन-पालन करना असंभव कार्य नहीं है, लेकिन उन्हें सही दिशा में विकसित करना निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण अवश्य है। मैंने यहाँ "कठिन" शब्द का प्रयोग नहीं किया, क्योंकि मेरा मानना है कि कोई भी कार्य कठिन नहीं होता; हाँ, वह कुछ समय के लिए मुश्किल अवश्य हो सकता है। उचित प्रयास, धैर्य और निरंतरता से किसी भी चुनौती को सरल बनाया जा सकता है।
मैं पेरेंटिंग को चुनौतीपूर्ण इसलिए मानता हूँ क्योंकि आज के समय में कई अभिभावक अपने बच्चों से उन गुणों और व्यवहारों की अपेक्षा रखते हैं, जिन्हें अपनाने में वे स्वयं पूरी तरह सक्षम नहीं होते। उदाहरण के लिए, अधिकांश माता-पिता की शिकायतें कुछ इस प्रकार होती हैं—
- हमारा बच्चा दिनभर मोबाइल देखता रहता है।
- वह ठीक से खाना नहीं खाता।
- वह बड़ों की बात नहीं सुनता या मानता।
- वह हर बात पर तर्क (Argument) करता है।
- वह अपना काम स्वयं नहीं करता।
- वह सुबह स्कूल जाने के लिए जल्दी नहीं उठता।
कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है मानो बच्चा उनका अपना नहीं, बल्कि कोई विरोधी हो। जितनी शिकायतें कई माता-पिता अपने बच्चों से करते हैं, उतनी शिकायत शायद लोग अपने शत्रुओं से भी नहीं करते। और आश्चर्य की बात यह है कि यही वह बच्चा है जिसकी कामना उन्होंने स्वयं ईश्वर से की थी। किंतु समय के साथ वे उसकी अच्छाइयों को अनदेखा कर केवल कमियों पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं।
अब मेरा सभी अभिभावकों से एक स्वाभाविक प्रश्न है—क्या उन्होंने अपने बचपन में ऐसी गलतियाँ नहीं की थीं?
निस्संदेह, उनका समय आज के समय से अलग था। हमारे बचपन में मोबाइल फोन और आधुनिक तकनीक इतनी सुलभ नहीं थी। लेकिन यह भी सत्य है कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता। हमारे माता-पिता भी कभी हमारी शिकायतें करते थे, और आज हमने अनजाने में वही पद्धति अपनानी शुरू कर दी है।
समाज में अक्सर यह धारणा बना दी जाती है कि बड़े कभी गलत नहीं होते और गलती हमेशा छोटे ही करते हैं। परंतु क्या यह सच है?
मेरा उत्तर है—नहीं, बिल्कुल नहीं।
गलतियाँ हर इंसान से होती हैं, चाहे वह बच्चा हो या बड़ा। अंतर केवल इतना है कि कई बड़े लोग अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उन पर पर्दा डाल देते हैं; जबकि बच्चों की गलतियों का सार्वजनिक रूप से उल्लेख करने में संकोच नहीं करते।
अब समय केवल समस्याओं का वर्णन करने का नहीं, बल्कि उनके समाधान पर विचार करने का है।
अक्सर माता-पिता कहते हैं कि बच्चे उनकी बात नहीं सुनते या उन्हें अनदेखा कर देते हैं। किंतु क्या हमने कभी बच्चों के मन की बात जानने का प्रयास किया? क्या हमने उनकी भावनाओं और विचारों को उतना महत्व दिया, जितना हम उनसे अपेक्षा करते हैं?
जब बच्चे बार-बार यह अनुभव करते हैं कि उनकी बातों को टाल दिया जाता है या अनसुना कर दिया जाता है, तो वे भी धीरे-धीरे वही व्यवहार सीख लेते हैं। वे सोचते हैं कि यदि बड़े हमारी बात नहीं सुनते, तो हमें भी उनकी बात सुनने की क्या आवश्यकता है?
बच्चों के अत्यधिक मोबाइल उपयोग की समस्या भी आज गंभीर विषय है। लेकिन यह समझना होगा कि कोई भी बच्चा जन्म से मोबाइल चलाना नहीं जानता। वह अपने आसपास के वातावरण से सीखता है। जब वह देखता है कि परिवार के सदस्य घंटों तक मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो वह उसी व्यवहार को सामान्य मान लेता है।
आज स्थिति यह हो गई है कि बच्चा रोए तो मोबाइल दे दो, खाना न खाए तो मोबाइल दिखा दो, और शांत रखना हो तो भी मोबाइल पकड़ा दो। धीरे-धीरे मोबाइल एक सुविधा नहीं, बल्कि आदत बन जाता है।
सच्चाई यह है कि बच्चों के हाथों से खिलौने छीनकर और उन्हें स्क्रीन सौंपकर हमने अनजाने में उनके बचपन का एक हिस्सा कम कर दिया है। फिर जब वही आदत उनके व्यवहार का हिस्सा बन जाती है, तो हम उसका पूरा दोष बच्चों पर डाल देते हैं।
यदि हम चाहते हैं कि बच्चों में अनुशासन, संवेदनशीलता, सम्मान, आत्मनिर्भरता और अच्छी आदतें विकसित हों, तो उसकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी। क्योंकि बच्चे हमारे कहे हुए से कम और हमारे किए हुए से अधिक सीखते हैं।
यदि माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे पुस्तकें पढ़ें, तो उन्हें स्वयं भी पढ़ना होगा। यदि वे चाहते हैं कि बच्चे मोबाइल कम चलाएँ, तो उन्हें स्वयं भी स्क्रीन समय सीमित करना होगा। यदि वे चाहते हैं कि बच्चे सम्मानपूर्वक व्यवहार करें, तो उन्हें स्वयं भी वैसा ही व्यवहार प्रदर्शित करना होगा।
अच्छी पेरेंटिंग के कुछ सरल लेकिन प्रभावी उपाय हो सकते हैं—
- बच्चों के साथ प्रतिदिन गुणवत्तापूर्ण समय बिताएँ।
- परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन करें।
- घर में संवाद की संस्कृति विकसित करें।
- मोबाइल और स्क्रीन समय के स्पष्ट नियम बनाएँ।
- बच्चों के साथ पुस्तकें पढ़ें और चर्चा करें।
- बच्चों की बातों को ध्यान से सुनें और उनकी भावनाओं का सम्मान करें।
- तुलना करने के बजाय प्रोत्साहन और मार्गदर्शन दें।
यह समझना आवश्यक है कि समस्या का वर्णन करना बहुत सरल है, लेकिन समाधान ढूँढना और उस पर कार्य करना अपेक्षाकृत कठिन होता है। बच्चों का सर्वांगीण विकास (All-round Development) केवल विद्यालय या माता-पिता अकेले नहीं कर सकते; इसके लिए परिवार, समाज और विद्यालय—सभी की साझा भूमिका होती है।
अंततः, मेरा मानना है कि अच्छी पेरेंटिंग वह नहीं है जो बच्चों को बदलने से शुरू हो, बल्कि वह है जो माता-पिता के स्वयं को बदलने से प्रारंभ हो।
क्योंकि सच यही है—
"बच्चे हमारे शब्दों से कम, हमारे व्यवहार से अधिक सीखते हैं। इसलिए यदि हम भविष्य बदलना चाहते हैं, तो शुरुआत स्वयं से करनी होगी।"
— भूपेंद्र रावत 'पथिक'
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