अधूरी रातों का दर्द

 अधूरी रातों का दर्द

सुबह की हल्की-हल्की धूप पेड़ों की पत्तियों से छनकर पार्क की हरी घास पर गिर रही थी। पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण में एक अलग ही शांति घोल रही थी। रोज़ की तरह उस दिन भी एक बुजुर्ग दंपति अपनी सुबह की सैर के लिए पार्क पहुँचे थे। वर्षों से यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था।

दो-तीन चक्कर लगाने के बाद उन्हें थोड़ी थकान महसूस हुई, तो वे पास रखी एक बेंच पर बैठ गए। उम्र के इस पड़ाव पर अब शरीर जल्दी थक जाता था, लेकिन उनके पास एक-दूसरे का साथ था, जो हर थकान को हल्का कर देता था।

अभी वे आपस में कुछ बातें कर ही रहे थे कि थोड़ी दूरी पर एक नौजवान दंपति आकर बैठ गया। उनके चेहरे पर गहरी चिंता साफ दिखाई दे रही थी। माथे पर खिंची हुई लकीरें और आँखों की बेचैनी किसी अनकहे दर्द की कहानी कह रही थीं।

बुजुर्ग दंपति ने एक-दूसरे की ओर देखा।

कुछ अनुभव उम्र के साथ बिना बोले ही समझ आने लगते हैं। कहते हैं, सिर के सफेद बाल केवल उम्र नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों की कहानी भी कहते हैं।

धीरे-धीरे उनकी बातें बुजुर्ग दंपति के कानों तक पहुँचने लगीं।

"डॉक्टर ने कहा है कि इलाज लंबा चलेगा..." युवक ने भारी आवाज़ में कहा।

"अब तक जितनी बचत थी, लगभग सब खर्च हो चुकी है... लेकिन बच्चे के लिए तो सब करना पड़ेगा..." उसकी पत्नी की आवाज़ भर्रा गई।

यह सुनकर बुजुर्ग दंपति के चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

उन्हें पता चला कि उनका छोटा बच्चा एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा था। इलाज में बहुत पैसा खर्च हो चुका था और दूसरी ओर परिवार व समाज की जिम्मेदारियाँ भी थीं। जीवन किसी के लिए नहीं रुकता। समाज में रहते हुए इंसान अपने दायित्वों से मुँह नहीं मोड़ सकता।

बुजुर्ग दंपति उनकी हर बात बहुत ध्यान से सुन रहे थे।

अब उनकी थकान जैसे कहीं गायब हो चुकी थी। वे अपनी परेशानियों से ज्यादा उस मासूम बच्चे के लिए चिंतित थे, जिसे उन्होंने देखा तक नहीं था।

"भगवान उस बच्चे को ठीक कर दे..." वृद्धा ने धीरे से कहा।

लेकिन यह कहते-कहते उनकी आँखें नम हो गईं।

दरअसल, उस नौजवान दंपति की बातें सुनकर उन्हें अपने जीवन का वह अध्याय याद आ गया था जिसे वे कभी पूरी तरह भूल नहीं पाए थे।

आज से कई वर्ष पहले...

जब वे भी जवान थे।

जब उनके कंधों पर भी जिम्मेदारियों का बोझ था।

जब वे भी अपने बच्चे की बीमारी के कारण दिन-रात अस्पतालों के चक्कर लगाते थे।

वह दर्द, वह डर, वह हर रिपोर्ट आने से पहले की घबराहट... सब कुछ आज भी उनकी यादों में जिंदा था।

समय बीत गया था, लेकिन कुछ घाव ऐसे होते हैं जो भर जाते हैं, पर उनके निशान हमेशा रह जाते हैं।

कुछ देर बाद वृद्ध व्यक्ति अपनी जगह से उठे और धीरे-धीरे उस नौजवान दंपति के पास जाकर बैठ गए।

उन्होंने उनके कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा—

"बेटा, मुश्किल समय हमेशा नहीं रहता। हिम्मत मत हारो। भगवान परीक्षा लेता है, लेकिन रास्ते भी वही दिखाता है।"

उनकी पत्नी ने भी उस युवती का हाथ पकड़ लिया।

दोनों ने उन्हें बहुत समझाया, उनका हौसला बढ़ाया, उन्हें उम्मीद दी।

लेकिन अपने आँसुओं को रोकना उनके लिए आसान नहीं था।

उनकी आँखों से कुछ बूँदें चुपचाप बाहर आ गईं।

क्योंकि आज फिर वर्षों बाद उन्हें लग रहा था कि समय ने उन्हें वहीं लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ से वे कभी गुजर चुके थे।

फर्क बस इतना था कि उस समय उनके साथ उनका परिवार था...

और आज...

आज वे दोनों अकेले थे।

उनके बच्चे उनसे मीलों दूर अपने जीवन में व्यस्त थे।

अब जीवन फिर उतना ही कठिन लगने लगा था जितना वर्षों पहले था।

वही दर्द भरी रातें...

वही खामोश दिन...

वही इंतज़ार...

और वही तनहाई।

वे अक्सर खिड़की के पास बैठकर अपने बच्चों की पुरानी तस्वीरें देखते और मुस्कुरा देते थे।

शायद माँ-बाप की जिंदगी भी बड़ी अजीब होती है।

वे अपना पूरा जीवन बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा देते हैं।

अपने सपनों को पीछे छोड़ देते हैं।

अपनी खुशियों का त्याग कर देते हैं।

और अंत में उनके पास बचती हैं—

कुछ पुरानी यादें,

कुछ तस्वीरें,

कुछ अधूरे इंतज़ार,

और कुछ रुके हुए आँसू।

उस दिन घर लौटते समय दोनों बहुत देर तक चुप थे।

फिर अचानक वृद्धा ने धीमी आवाज़ में पूछा—

"क्या तुम्हें लगता है... बच्चे हमें याद करते होंगे?"

वृद्ध ने हल्की मुस्कान के साथ उनकी ओर देखा और बोले—

"माँ-बाप बच्चों को भूल सकते हैं क्या? शायद इसी वजह से वे भी हमें कभी पूरी तरह नहीं भूलते होंगे..."

दोनों फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ गए।

और पीछे छूट गई पार्क की वह बेंच...

जो उस दिन दो नहीं, बल्कि चार लोगों के दर्द की गवाह बनी थी।




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