दोहरी मानसिकता और संघर्ष करता शिक्षक
विद्यालय समाज की एक ऐसी महत्वपूर्ण संस्था है जो केवल छात्रों को किताबी ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला, अनुशासन, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारियों से भी परिचित करवाती है। एक अच्छे और सभ्य समाज के निर्माण की नींव स्कूल में ही रखी जाती है। बच्चों को समाज के नियमों का पालन करना, दूसरों का सम्मान करना, समय का महत्व समझना और अनुशासित जीवन जीना — ये सभी गुण विद्यालय के वातावरण में विकसित होते हैं।
इन सभी जिम्मेदारियों को निभाने का सबसे बड़ा दायित्व शिक्षक के कंधों पर होता है। शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि छात्रों का मार्गदर्शक, सलाहकार और चरित्र निर्माता भी होता है। सीखाने की इस प्रक्रिया में उसे अलग-अलग परिस्थितियों और छात्रों के स्वभाव के अनुसार विभिन्न तरीके अपनाने पड़ते हैं। कभी प्रेम से समझाना पड़ता है तो कभी अनुशासन बनाए रखने के लिए सख्ती भी करनी पड़ती है।
लेकिन वर्तमान समय में स्थिति कुछ बदलती हुई दिखाई देती है। आज कई बार छात्रों और अभिभावकों को ऐसा प्रतीत होने लगता है कि शिक्षक उनके बच्चे के पीछे “हाथ धोकर पड़ गया है।” यदि शिक्षक छात्र को अनुशासन में रहने के लिए टोके, गलत आदतों से रोके या पढ़ाई के प्रति गंभीर होने को कहे, तो इसकी शिकायत सीधे स्कूल प्रशासन तक पहुंच जाती है। दुखद बात यह है कि अधिकतर परिस्थितियों में दोषी शिक्षक को ही मान लिया जाता है।
एक ओर अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा जीवन में सफल हो, ऊँचाइयों को छुए और एक बेहतर इंसान बने। वहीं दूसरी ओर वे यह भी चाहते हैं कि उनके बच्चे को कोई कुछ न कहे, उसे पूरी स्वतंत्रता मिले और उसकी हर गलती को नजरअंदाज कर दिया जाए। यही दोहरी मानसिकता आज शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
अक्सर अभिभावकों की शिकायत होती है कि बच्चा उनकी बात नहीं सुनता, मोबाइल फोन का अत्यधिक प्रयोग करता है, समय पर खाना नहीं खाता या अनुशासन में नहीं रहता। लेकिन जब वही शिक्षक स्कूल में इन आदतों को सुधारने का प्रयास करता है और थोड़ी सख्ती दिखाता है, तब उसी शिक्षक को कठोर, असंवेदनशील या बच्चों का विरोधी समझ लिया जाता है।
यह समझना आवश्यक है कि एक बच्चा स्कूल से अधिक समय अपने घर में बिताता है। ऐसे में उसके व्यवहार, आदतों और संस्कारों के निर्माण में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि घर पर अनुशासन, जिम्मेदारी और सही मार्गदर्शन नहीं मिलेगा, तो केवल स्कूल और शिक्षक से यह अपेक्षा करना कि वे हर कमी को दूर कर देंगे, उचित नहीं कहा जा सकता।
आज समाज में धीरे-धीरे यह धारणा बनती जा रही है कि बच्चों को सुधारने का पूरा ठेका केवल शिक्षक के पास है। यदि बच्चा पढ़ाई में कमजोर हो, अनुशासनहीन हो या गलत आदतों में पड़ जाए, तो सबसे पहले उंगली शिक्षक पर उठाई जाती है। लेकिन क्या वास्तव में यह केवल शिक्षक की जिम्मेदारी है? क्या अभिभावकों और समाज की कोई भूमिका नहीं है?
सच्चाई यह है कि छात्रों को सही दिशा देने के लिए शिक्षक और अभिभावक दोनों का सहयोग आवश्यक है। बिना अभिभावकों के समर्थन के शिक्षक स्वयं को कई बार असहाय महसूस करता है। शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं हो सकती; यह घर और समाज के वातावरण से मिलकर पूर्ण होती है।
इसके साथ ही शिक्षकों की गरिमा और अधिकारों का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। शिक्षक को समाज में आदर और विश्वास की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। वह छात्रों का दुश्मन नहीं, बल्कि उनका हितैषी और भविष्य निर्माता होता है। अनुशासन सिखाना किसी प्रकार की दुश्मनी नहीं, बल्कि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की तैयारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शिक्षक को कठघरे में खड़ा करने के बजाय उसकी भूमिका को समझें और उसका सहयोग करें। यदि शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाएं, तभी हम आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दे पाएंगे और एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकेंगे।
✍️ BHUPENDRA RAWAT (पथिक)
Pathikbhupendra.co.in



