अरावली पर्वत श्रृंखला : इतिहास, जीवन, पर्यावरण और वर्तमान चुनौतियाँ
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अरावली पर्वत श्रृंखला : इतिहास, जीवन, पर्यावरण और वर्तमान चुनौतियाँ
अरावली पर्वत श्रृंखला का इतिहास
अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत प्रणालियों में से एक मानी जाती है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार इसकी उत्पत्ति लगभग 250 से 300 करोड़ वर्ष पहले हुई थी, जब पृथ्वी की सतह अभी अपने प्रारंभिक विकास के चरण में थी। यह पर्वतमाला गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली हुई है। प्राचीन काल में अरावली पर्वत न केवल एक प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करता था, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु, वर्षा व्यवस्था और नदियों के प्रवाह को भी नियंत्रित करता था। इतिहास में यह क्षेत्र अनेक सभ्यताओं, जनजातियों और राजवंशों का आश्रय रहा है। अरावली के आसपास बसे क्षेत्र प्राचीन व्यापार मार्गों, सांस्कृतिक संपर्कों और युद्धों के साक्षी रहे हैं।
अरावली पर लोगों की निर्भरता
अरावली पर्वत श्रृंखला पर और इसके आसपास रहने वाले लोगों का जीवन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़ा हुआ है। ग्रामीण समुदायों की आजीविका खेती, पशुपालन, वनोपज संग्रह और पारंपरिक जल स्रोतों पर निर्भर रही है। अरावली की पहाड़ियों में मौजूद जंगल ईंधन, चारा, औषधीय पौधे और छोटी लकड़ी प्रदान करते हैं। यहाँ की चट्टानें वर्षा जल को रोककर धीरे-धीरे भूजल में परिवर्तित करती हैं, जिससे कुएँ, बावड़ियाँ और हैंडपंप लंबे समय तक जलयुक्त रहते हैं। शहरों में रहने वाले लोग भी अरावली से मिलने वाली स्वच्छ हवा, भूजल पुनर्भरण और तापमान संतुलन का लाभ उठाते हैं, भले ही उन्हें इसका प्रत्यक्ष एहसास न हो।
पर्यावरण के लिए अरावली का महत्व
अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ मानी जाती है। यह मरुस्थलीकरण को रोकने में एक प्राकृतिक दीवार की तरह कार्य करती है और थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है। अरावली के जंगल जैव विविधता का भंडार हैं, जहाँ अनेक पक्षी, पशु, सरीसृप और वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। यह पर्वतमाला दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा के औद्योगिक क्षेत्रों के लिए एक प्राकृतिक ‘ग्रीन लंग’ की तरह काम करती है, जो वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक है। इसके अतिरिक्त, अरावली मानसून के दौरान वर्षा जल को रोककर बाढ़ और मृदा अपरदन को नियंत्रित करती है।
सरकार द्वारा अरावली क्षेत्र में कटान और खनन के कारण
सरकार द्वारा अरावली क्षेत्र में पहाड़ियों की कटाई या खनन की अनुमति दिए जाने के पीछे मुख्य तर्क विकास, आधारभूत ढांचे की आवश्यकता और खनिज संसाधनों का उपयोग बताया जाता है। सरकार का कहना है कि कई स्थानों पर अरावली की ऊँचाई 100 मीटर से कम है, इसलिए उन्हें कानूनी रूप से ‘पर्वत’ की श्रेणी में नहीं माना जाता। इसके आधार पर निर्माण कार्य, सड़कें, रियल एस्टेट परियोजनाएँ और खनन गतिविधियाँ वैध ठहराई जाती हैं। इसके अलावा, शहरीकरण, आवासीय जरूरतों और रोजगार सृजन को भी एक प्रमुख कारण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
अरावली के कटान से स्थानीय लोगों को होने वाला नुकसान
अरावली की पहाड़ियों के कटने से सबसे अधिक प्रभाव स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी समुदायों पर पड़ता है। जल स्रोत सूखने लगते हैं, जिससे खेती और पशुपालन संकट में आ जाते हैं। जंगलों के नष्ट होने से ईंधन, चारा और पारंपरिक आजीविका के साधन समाप्त हो जाते हैं। भूमि का कटाव बढ़ता है, जिससे खेत बंजर होने लगते हैं और लोगों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। सामाजिक असंतुलन और आर्थिक असुरक्षा भी इसी प्रक्रिया का परिणाम होती है।
पर्यावरण और पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव
हालाँकि अरावली की अधिकांश पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम ऊँची हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका पर्यावरणीय महत्व कम है। ये छोटी-छोटी पहाड़ियाँ मिलकर एक विशाल पारिस्थितिक तंत्र बनाती हैं। इनके नष्ट होने से भूजल स्तर तेजी से गिरता है, तापमान बढ़ता है और वायु प्रदूषण में वृद्धि होती है। लंबे समय में यह जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को और तेज कर सकता है। अरावली के कमजोर होने से थार मरुस्थल का विस्तार हो सकता है, जिसका प्रभाव केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की जलवायु पर पड़ेगा।
अरावली को बचाने के लिए लोगों के प्रयास
अरावली को बचाने के लिए पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों, स्थानीय समुदायों और कुछ जागरूक नागरिकों द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कई जन आंदोलन अवैध खनन और जंगलों की कटाई के खिलाफ खड़े हुए हैं। न्यायालयों में जनहित याचिकाएँ दायर की गई हैं, जिनके परिणामस्वरूप कुछ क्षेत्रों में खनन पर रोक भी लगी है। वृक्षारोपण अभियान, जनजागरूकता कार्यक्रम और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन जैसे प्रयास भी किए जा रहे हैं। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक मंचों पर अरावली के महत्व को लेकर चर्चा बढ़ रही है, जो भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
निष्कर्ष
अरावली पर्वत श्रृंखला केवल चट्टानों और पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत के जीवन, संस्कृति और पर्यावरण की आधारशिला है। अल्पकालिक विकास और आर्थिक लाभ के लिए इसके दीर्घकालिक महत्व को नजरअंदाज करना पृथ्वी और मानव समाज दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि अरावली आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवनदायिनी बनी रहे।
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