स्कूल में परामर्श और मार्गदर्शन की जरूरत क्यों है?
अक्सर यह मान लिया जाता है कि जैसे-जैसे बच्चा उम्र के साथ शारीरिक रूप से बढ़ता है, वैसे-वैसे उसका मानसिक विकास भी अपने-आप पूरा हो जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग होती है।
बच्चा बाहर से भले ही बड़ा दिखने लगे, लेकिन उसके भीतर एक लगातार संघर्ष चल रहा होता है।
जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसके मन में प्रश्न, डर, असमंजस और भावनाएँ भी गहराने लगती हैं। वह इस दुविधा में रहता है कि अपने मन की बात किससे कहे, कौन उसकी बात बिना डाँटे, बिना तुलना किए, बिना जज किए समझेगा। दुर्भाग्यवश, ऐसे समय में समाज और कई बार माता-पिता भी उस पर अपनी अपेक्षाएँ थोपने लगते हैं — अच्छे अंक लाओ, प्रतियोगिता में आगे रहो, हमारी उम्मीदों पर खरे उतरो।
यहाँ सबसे बड़ी भूल यह होती है कि हम यह समझ ही नहीं पाते कि शारीरिक विकास के साथ मानसिक विकास होना अनिवार्य नहीं है। कई बच्चे मानसिक रूप से उतने मजबूत नहीं होते, जितना उनसे अपेक्षित कर लिया जाता है। परिणामस्वरूप वे चुप हो जाते हैं, भीतर-ही-भीतर घुटने लगते हैं या फिर उनका व्यवहार चिड़चिड़ा और आक्रामक हो जाता है।
ऐसी स्थिति में बच्चे को सबसे अधिक आवश्यकता होती है उस व्यक्ति की, जो उसकी भावनाओं को समझ सके, जो उसकी बात ध्यान से सुने और उसे यह एहसास दिलाए कि उसकी समस्या महत्वपूर्ण है। यही भूमिका परामर्श निभाता है।
स्कूल की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि:
बच्चा अपना अधिकांश समय स्कूल में बिताता है
कई बार वह घर की तुलना में स्कूल में अधिक सुरक्षित महसूस करता है
शिक्षक समस्या देख तो लेते हैं, लेकिन हर समस्या का समाधान कर पाना उनके लिए संभव नहीं होता
ऐसे में स्कूल में प्रशिक्षित परामर्शदाता होना आवश्यक हो जाता है, जो बच्चे की मानसिक स्थिति को समझ सके और समय रहते उसकी मदद कर सके।
मार्गदर्शन और परामर्श मिलकर क्या करते हैं?
मार्गदर्शन बच्चे को सही दिशा दिखाता है — पढ़ाई, विषय चयन और भविष्य के विकल्पों में
परामर्श बच्चे के मन के बोझ को हल्का करता है — डर, तनाव, दबाव और असमंजस को समझकर
दोनों मिलकर बच्चे को यह सिखाते हैं कि
वह अकेला नहीं है, उसकी बात सुनी जाएगी और उसकी समस्या का समाधान संभव है।
निष्कर्ष
आज के समय में स्कूल केवल ज्ञान देने का केंद्र नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी निभाने वाला स्थान भी होना चाहिए।
अगर हम चाहते हैं कि बच्चे केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी स्वस्थ, संतुलित और आत्मविश्वासी बनें, तो स्कूल में परामर्श और मार्गदर्शन की व्यवस्था अनिवार्य है।
बच्चे को सबसे ज्यादा ज़रूरत उस व्यक्ति की होती है,
जो उसकी बात सुने नहीं, बल्कि उसे समझे।
No comments:
Post a Comment