कहानी :- चींटी की समझदारी की यात्रा
चींटी अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके दो बच्चे थे, जो रोज़ स्कूल जाते थे।
एक दिन बच्चों ने मासूमियत से पूछा,
“पापा, हम रोज़ स्कूल क्यों जाते हैं? क्या यही ज़िंदगी है? रोज़ वही पढ़ाई, वही डाँट… अब तो कुछ नया बचा ही नहीं।”
लगातार पढ़ाई के दबाव और बड़ों की उम्मीदों से चींटी बहुत परेशान रहने लगी। उसे लगने लगा कि ज़िंदगी बस बोझ बन गई है और इससे छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं है। इन्हीं उलझनों के बीच एक दिन वह गहरी सोच में डूब गई।
उसी रात चींटी ने एक अजीब-सा सपना देखा।
सपने में उसे लगा कि वह अपने पुराने शहर से बहुत दूर, एक बिल्कुल नए शहर में पहुँच गई है। वहाँ सब कुछ अलग था—नई जगह, नए नियम, नए लोग। शुरू-शुरू में उसे यह नया शहर बहुत अच्छा लगा। कोई स्कूल नहीं, कोई डाँट नहीं, कोई पढ़ाई नहीं। उसे लगा कि यही तो वह आज़ादी है जिसकी उसे तलाश थी।
लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, हालात बदलने लगे।
नए शहर के लोग उससे सवाल करने लगे—
“तुम कौन हो? कहाँ से आई हो? यहाँ क्यों हो?”
अब उसे वहाँ तरह-तरह के काम भी करने पड़ते थे। आज़ादी अब जिम्मेदारियों में बदलने लगी। धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा कि यह जगह उतनी आसान नहीं है, जितनी शुरुआत में लगी थी।
एक दिन उस शहर में घूमने आई एक चींटी को देखकर चींटी चौंक गई।
वह उसकी पुरानी दोस्त थी!
पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। फिर हिम्मत करके उसने पूछा,
“तुम वही हो न, जो मेरे पुराने शहर में रहती हो?”
दोस्त ने मुस्कुराकर कहा,
“हाँ, मैं वही हूँ। मैं तो यहाँ घूमने आई हूँ।”
चींटी हैरान रह गई।
“घूमने? मुझे तो लगा था कि यहाँ सिर्फ वही आते हैं जो अपनी ज़िंदगी से हार मान लेते हैं।”
दोस्त ने शांत स्वर में कहा,
“नहीं चींटी, ज़िंदगी से भागना समाधान नहीं होता। हर जगह अपनी चुनौतियाँ होती हैं। फर्क बस इतना है कि हम उन्हें समझदारी से स्वीकार करते हैं या डरकर छोड़ देते हैं।”
तभी चींटी को एहसास हुआ कि वह गलत सोच रही थी।
उसे याद आया कि उसके बच्चे, उसका परिवार, और वह शहर—सब उसके अपने थे। वहाँ मुश्किलें थीं, लेकिन साथ भी था।
दोस्त ने कहा,
“चलो, अब लौटते हैं। जब समझ आ जाए, तब रास्ता हमेशा खुला होता है।”
चींटी की आँख खुल गई।
वह सपना था, लेकिन संदेश बिल्कुल साफ।
उस दिन के बाद चींटी ने बच्चों से बात की, उनकी परेशानी समझी और खुद भी समझा कि
ज़िंदगी से भागना नहीं, उसे समझकर जीना ही असली साहस है।
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