शिक्षक के जीवन का चक्र

 शिक्षक के जीवन का चक्र


शिक्षक का जीवन एक ऐसे मार्ग की तरह होता है जो स्वयं अपनी जगह स्थिर रहता है, लेकिन अपने छात्रों को उनके गंतव्य तक पहुँचा देता है। उसका जीवन चक्र लगभग जीवन भर एक-सा चलता रहता है—निरंतर, शांत और समर्पित।


हर दिन वह भी एक छात्र की तरह अपना झोला उठाकर विद्यालय जाता है। वहाँ बच्चों को पढ़ाता है, उन्हें दिशा देता है और दिन के अंत में उनसे कुछ न कुछ सीखकर ही लौटता है। क्योंकि शिक्षण केवल सिखाने का नहीं, बल्कि सीखते रहने का भी व्यवसाय है। जो शिक्षक सीखना छोड़ देता है, वह अपने पेशे में अधिक समय तक टिक नहीं सकता।


शिक्षक और छात्र का संबंध रेलवे की दो पटरियों जैसा है—दोनों साथ-साथ चलते हैं। यदि एक भी पटरी कमजोर हो जाए, तो पूरी गाड़ी पटरी से उतर सकती है। इसी तरह शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक, छात्र, अभिभावक और समाज—सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं।


जब कोई छात्र असफल होता है, तो उस असफलता की जिम्मेदारी अक्सर एक-दूसरे पर डाल दी जाती है। कई बार अभिभावक अपने बच्चे की असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं, जबकि उन्हें पूरे छात्र समुदाय की चिंता नहीं होती—सिर्फ अपने बच्चे की होती है।


लेकिन शिक्षक ही एक ऐसा व्यक्ति है जो हर छात्र को समान रूप से अपनी जिम्मेदारी मानता है। एक भी बच्चे की असफलता उसे भीतर तक खटकती है। वह स्वयं से प्रश्न करता है—शायद मैं उसे ठीक से समझ नहीं पाया, शायद कहीं मेरी ही कमी रह गई।


विडंबना यह है कि छात्र की असफलता का दोष तो अक्सर शिक्षक को दे दिया जाता है, लेकिन उसकी सफलता का श्रेय शिक्षक को जीवन भर नहीं मिल पाता। वह सम्मान का अधिकारी होते हुए भी समाज, अभिभावकों और व्यवस्था से तिरस्कार ही पाता है।


आज के समय में, जब शिक्षण को कुछ लोग केवल “चुटकी बजाने” जितना आसान समझने लगे हैं, तब शिक्षक का संघर्ष और अधिक गहरा हो गया है। फिर भी वह बिना शिकायत किए, निस्वार्थ भाव से, पीढ़ियों को गढ़ने का कार्य करता रहता है।


शायद यही शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान है—

खुद पीछे रहकर, दूसरों को आगे बढ़ाना।

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