लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन अधिकार, जिम्मेदारी और उचित-अनुचित तरीके

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लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन: अधिकार, जिम्मेदारी और बदलता स्वरूप भारत एक लोकतांत्रिक देश है। हमारे संविधान ने नागरिकों को अपनी बात रखने, विचार व्यक्त करने और सरकार की नीतियों के प्रति असहमति जताने का अधिकार दिया है। लोकतंत्र की खूबसूरती भी इसी में है कि नागरिक सरकार की गलत नीतियों, भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग या जनहित से जुड़े किसी भी मुद्दे पर सवाल उठा सकते हैं। लेकिन अधिकारों के साथ जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। हमें अपनी बात रखने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे किसी व्यक्ति या समुदाय की भावनाओं को अनावश्यक रूप से ठेस पहुँचे, हिंसा को बढ़ावा मिले या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान हो। सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना लोकतंत्र को मजबूत करता है, लेकिन उस आवाज का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में विरोध प्रदर्शन के तरीकों में जिस तरह के बदलाव देखने को मिले हैं, वे निश्चित रूप से विचार करने का विषय हैं। कई बार वास्तविक मुद्दा पीछे छूट जाता है और उसके स्थान पर राजनीतिक हित, व्यक्तिगत स्वार्थ, आरोप-प्रत्यारोप और भीड़ की राजनीति प्रम...

पर्यावरण प्रेम या केवल दिखावा?

पर्यावरण प्रेम या केवल दिखावा?


हर वर्ष की भाँति पिछले वर्ष भी दिल्ली जैसे बड़े शहरों में वृक्षारोपण कार्यक्रमों का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया गया। इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य था — शहरों को प्रदूषण मुक्त बनाना और वातावरण को हरित एवं स्वच्छ करना। बड़े-बड़े अधिकारी, समाजसेवी, प्रतिष्ठित हस्तियाँ और अनेक प्रतिभागी पूरे जोश के साथ इस अभियान में शामिल हुए। हर ओर “पर्यावरण बचाओ” के नारे गूँज रहे थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो समाज वास्तव में प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने लगा हो।

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जगह-जगह पौधे लगाए गए। साथ ही एक नई पहल के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को एक पौधा “गोद” भी दिया गया। इसका अभिप्राय यह था कि जिस पौधे पर जिस व्यक्ति का नाम लिखा गया है, उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी उसी की होगी। क्योंकि केवल पौधा लगा देना ही पर्यावरण प्रेम नहीं कहलाता; वास्तविक तपस्या तो तब है जब कोई व्यक्ति अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर उस पौधे की नियमित देखभाल करे, उसे पानी दे और उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित रखे।


कार्यक्रम के दौरान कुछ पौधे शेष बच गए। अब प्रश्न यह था कि इन पौधों को कहाँ लगाया जाए। आयोजकों ने प्रतिभागियों से सुझाव माँगे, लेकिन कुछ क्षणों के लिए सब मौन हो गए। तभी किसी सज्जन ने सुझाव दिया कि क्यों न इन पौधों को लोगों के घरों या गलियों के बाहर लगाया जाए, ताकि जिनके घर के सामने पौधे लगाए जाएँ, वही उनकी देखभाल भी कर सकें।

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लेकिन यह सुनते ही वातावरण बदल गया। जो लोग कुछ समय पहले तक पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे कर रहे थे, उनकी बोलती बंद हो गई। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद एक महाशय ने हिम्मत जुटाकर कहा —

“अगर हम अपने घर या गली के सामने पेड़ लगाएंगे, तो हमारी गाड़ियाँ कहाँ खड़ी होंगी?”



उनके ये शब्द मानो पूरे कार्यक्रम पर एक कटाक्ष थे। वही लोग, जो हाथों में “पर्यावरण बचाओ” का झंडा लेकर समाज को जागरूक करने निकले थे, वास्तविकता आने पर पीछे हटते दिखाई दिए। उस क्षण ऐसा महसूस हुआ कि पर्यावरण के प्रति हमारा प्रेम कहीं न कहीं केवल दिखावा बनकर रह गया है — एक ऐसा प्रेम जो सोशल मीडिया की पोस्ट, मोबाइल के स्टेटस और एक दिन के अभियान तक सीमित है।


सत्य यह है कि हम भौतिक सुख-सुविधाओं में इतने अधिक उलझ चुके हैं कि प्रकृति के लिए त्याग करने को तैयार नहीं हैं। हम हरियाली चाहते तो हैं, लेकिन अपने हिस्से की जमीन, सुविधा या समय देना नहीं चाहते।


जब तक हम सब मिलकर जमीनी स्तर पर ईमानदारी से प्रयास नहीं करेंगे, जब तक हम अपनी दोहरी मानसिकता से बाहर नहीं आएँगे, और जब तक गमलों में सजे पौधों को वास्तव में धरती पर स्थान नहीं देंगे, तब तक प्रदूषण मुक्त और हरित वातावरण की कल्पना केवल एक सपना बनकर ही रह जाएगी।

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