पर्यावरण प्रेम या केवल दिखावा?
हर वर्ष की भाँति पिछले वर्ष भी दिल्ली जैसे बड़े शहरों में वृक्षारोपण कार्यक्रमों का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया गया। इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य था — शहरों को प्रदूषण मुक्त बनाना और वातावरण को हरित एवं स्वच्छ करना। बड़े-बड़े अधिकारी, समाजसेवी, प्रतिष्ठित हस्तियाँ और अनेक प्रतिभागी पूरे जोश के साथ इस अभियान में शामिल हुए। हर ओर “पर्यावरण बचाओ” के नारे गूँज रहे थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो समाज वास्तव में प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने लगा हो।
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जगह-जगह पौधे लगाए गए। साथ ही एक नई पहल के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को एक पौधा “गोद” भी दिया गया। इसका अभिप्राय यह था कि जिस पौधे पर जिस व्यक्ति का नाम लिखा गया है, उसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी उसी की होगी। क्योंकि केवल पौधा लगा देना ही पर्यावरण प्रेम नहीं कहलाता; वास्तविक तपस्या तो तब है जब कोई व्यक्ति अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर उस पौधे की नियमित देखभाल करे, उसे पानी दे और उसे वृक्ष बनने तक संरक्षित रखे।
कार्यक्रम के दौरान कुछ पौधे शेष बच गए। अब प्रश्न यह था कि इन पौधों को कहाँ लगाया जाए। आयोजकों ने प्रतिभागियों से सुझाव माँगे, लेकिन कुछ क्षणों के लिए सब मौन हो गए। तभी किसी सज्जन ने सुझाव दिया कि क्यों न इन पौधों को लोगों के घरों या गलियों के बाहर लगाया जाए, ताकि जिनके घर के सामने पौधे लगाए जाएँ, वही उनकी देखभाल भी कर सकें।
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लेकिन यह सुनते ही वातावरण बदल गया। जो लोग कुछ समय पहले तक पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे कर रहे थे, उनकी बोलती बंद हो गई। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद एक महाशय ने हिम्मत जुटाकर कहा —
“अगर हम अपने घर या गली के सामने पेड़ लगाएंगे, तो हमारी गाड़ियाँ कहाँ खड़ी होंगी?”
उनके ये शब्द मानो पूरे कार्यक्रम पर एक कटाक्ष थे। वही लोग, जो हाथों में “पर्यावरण बचाओ” का झंडा लेकर समाज को जागरूक करने निकले थे, वास्तविकता आने पर पीछे हटते दिखाई दिए। उस क्षण ऐसा महसूस हुआ कि पर्यावरण के प्रति हमारा प्रेम कहीं न कहीं केवल दिखावा बनकर रह गया है — एक ऐसा प्रेम जो सोशल मीडिया की पोस्ट, मोबाइल के स्टेटस और एक दिन के अभियान तक सीमित है।
सत्य यह है कि हम भौतिक सुख-सुविधाओं में इतने अधिक उलझ चुके हैं कि प्रकृति के लिए त्याग करने को तैयार नहीं हैं। हम हरियाली चाहते तो हैं, लेकिन अपने हिस्से की जमीन, सुविधा या समय देना नहीं चाहते।
जब तक हम सब मिलकर जमीनी स्तर पर ईमानदारी से प्रयास नहीं करेंगे, जब तक हम अपनी दोहरी मानसिकता से बाहर नहीं आएँगे, और जब तक गमलों में सजे पौधों को वास्तव में धरती पर स्थान नहीं देंगे, तब तक प्रदूषण मुक्त और हरित वातावरण की कल्पना केवल एक सपना बनकर ही रह जाएगी।

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