कहानी:- मैं अरावली हूँ…

 मैं अरावली हूँ…


मैं भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक हूँ।

आप मुझे अरावली के नाम से जानते हैं।


मेरा जन्म तब हुआ था,

जब हिमालय ने अभी आँखें भी नहीं खोली थीं,

जब धरती जवान थी और मनुष्य का नामोनिशान तक नहीं था।


मैं दिल्ली से गुजरात तक फैली हूँ—

हरियाणा और राजस्थान मेरे आँगन हैं।

मेरी गोद में बसे गाँव,

मेरी छाया में पले लोग,

मेरी चट्टानों में छिपा जीवन—

सब मेरा परिवार हैं।


मैं ही हूँ जिसने थार मरुस्थल को रोक रखा है।

सोचो…

अगर मैं न होती तो क्या होता?


रेत की आँधियाँ दिल्ली तक पहुँच जातीं,

खेती की ज़मीन कब्रिस्तान बन जाती,

और जीवन… बस स्मृति बनकर रह जाता।


मेरे जंगलों से

वृक्ष जन्म लेते हैं,

मेरी चट्टानों से

नदियाँ निकलती हैं—

लूनी, बनास, साबरमती

मेरी धमनियाँ हैं।


मेरी मिट्टी में

बीज सिर्फ उगते नहीं,

जीवन पनपता है।


लेकिन आज…

मेरा अस्तित्व दाँव पर है।


मैंने कभी शिकायत नहीं की…


कुछ पूँजीपतियों ने

समय-समय पर

मेरा दोहन किया,

मुझे खोदा,

मुझे तोड़ा।


मैं चुप रही।


मेरे सीने पर

मशीनें चलीं,

मेरी हड्डियाँ

खनिज बनकर बिकती रहीं।


मैं फिर भी चुप रही।


मुझे गुस्सा नहीं है,

न किसी से बैर।


लेकिन मुझे डर है।


डर उन

बेबस पशु-पक्षियों का,

जिनका घर मेरी दरारों में है।


डर उन

दूर-दराज़ के गाँवों का,

जिनकी हर बूँद पानी

मुझसे होकर जाती है।


डर उन

बच्चों का,

जिनका भविष्य

मेरे अस्तित्व से जुड़ा है।


जब मुझे टुकड़ों में बाँट दिया गया…


सुना है—

100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों

को अरावली मानने से

इन्कार कर दिया गया है।


पर क्यों?


क्या मेरी पहचान

सिर्फ ऊँचाई से होती है?


क्या कोई माँ

अपने छोटे बच्चे को

परिवार से निकाल देती है?


वो पहाड़ियाँ भी

मेरे शरीर का हिस्सा हैं।

मेरी नसें हैं।

मेरी साँसें हैं।


पर कुछ तथाकथित विद्वानों ने कहा—

“ये अरावली नहीं हैं।”


नहीं…

वो विद्वान नहीं थे।


वो उद्योगपति थे।


जिन्होंने

अपने स्वार्थ के लिए

नक्शे बदले,

परिभाषाएँ बदलीं,

और प्रकृति को

कानूनी भाषा में

कमज़ोर कर दिया।


जब न्याय भी मौन हो गया…


आप पूछते हैं—

सरकार कुछ क्यों नहीं करती?


क्योंकि यह निर्णय

न्यायालय से आया है।


जिसे आप

न्याय की मूर्ति कहते हैं।


लेकिन जब

कानून

प्रकृति से बड़ा हो जाए,

तो समझो—

कुछ बहुत गलत हो रहा है।


आज

भगवान की बनाई रचना

को

इंसानों के फैसले

गलत ठहरा रहे हैं।


GSM का टूटता संतुलन


मैं सिर्फ पहाड़ नहीं हूँ।


मैं हूँ—


G – Groundwater (भूजल)


S – Soil (मिट्टी)


M – Mountain (पर्वत)


जब मुझे काटा जाता है,

तो भूजल नीचे चला जाता है।


जब मेरी मिट्टी उड़ती है,

तो खेती मर जाती है।


जब मैं टूटती हूँ,

तो पूरा पारिस्थितिक तंत्र

बिखर जाता है।


GSM का संतुलन

जब टूटता है,

तो सिर्फ जंगल नहीं मरते—

सभ्यताएँ मरती हैं।


मैं शिकायत नहीं कर रही…


मैं आपसे

लड़ने को नहीं कह रही।


मैं बस पूछ रही हूँ—


जब मैं नहीं रहूँगी,

तो आप कहाँ रहेंगे?


जब नदियाँ सूख जाएँगी,

तो विकास किस पर खड़ा होगा?


जब धरती बंजर होगी,

तो मुनाफ़ा किस काम आएगा?


मैं अरावली हूँ…


शायद आने वाली पीढ़ियाँ

मुझे किताबों में पढ़ें—


“कभी एक पर्वत श्रृंखला थी…”


काश,

उस ‘कभी’ से पहले

आप मुझे

आज बचा लें।

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