अभिभावकों की अपेक्षाएँ और बदलता परिदृश्य

 अभिभावकों की अपेक्षाएँ और बदलता परिदृश्य

आज के सामाजिक परिदृश्य में एक विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है—अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों के प्रति नकारात्मक रवैया रखते हुए भी उनसे अत्यधिक अपेक्षाएँ पाल लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन अपेक्षाओं की कोई सीमा नहीं होती। पढ़ाई हो, खेल-कूद हो, या फिर किसी भी प्रतियोगिता में भागीदारी—हर क्षेत्र में वे बच्चों से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद करते हैं।

लेकिन जब बच्चा किसी कारणवश अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाता, अपने सहपाठियों से पीछे रह जाता है या पढ़ाई में उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं ला पाता, तो जिम्मेदारी लेने की बजाय अभिभावक दोष सीधे स्कूल और अध्यापकों के सिर मढ़ देते हैं। बच्चों की हर असफलता का ठीकरा शिक्षक के सिर पर फोड़ना आज बहुत आम हो गया है।

अभिभावकों का अक्सर यही तर्क होता है—

“हम फीस देते हैं, ट्यूशन भेजते हैं, इतना पैसा खर्च करते हैं, फिर भी बच्चा अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर पा रहा?”

लेकिन इस तर्क में एक महत्वपूर्ण सच्चाई गुम हो जाती है—

पैसा शिक्षा खरीद सकता है, पर संस्कार नहीं। साधन उपलब्ध करा सकता है, पर सीख नहीं।

बच्चों के भीतर अच्छे गुणों, आदतों और शिष्टाचार का निर्माण केवल स्कूल या शिक्षक की जिम्मेदारी नहीं है। इन आदतों और चरित्र निर्माण की नींव घर पर रखी जाती है। परिवार के वातावरण, अभिभावकों के व्यवहार, और घर के सदस्यों की आपसी समझ—ये सभी मिलकर बच्चों की सोच और व्यक्तित्व को आकार देते हैं।

अभिभावक चाहें तो अपने कर्तव्यों की जिम्मेदारी से बचने के लिए स्कूल को सहयोगी संस्था मान सकते हैं, लेकिन अपनी भूमिका किसी भी कीमत पर किसी और पर नहीं डाल सकते।

घर बच्चों का पहला विद्यालय है, और माता-पिता उनके पहले शिक्षक।

स्कूल, शिक्षक और समाज की अन्य संस्थाएँ बच्चे के विकास में निश्चित रूप से समर्थन दे सकती हैं, लेकिन बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण की प्राथमिक जिम्मेदारी अभिभावकों की ही होती है। यदि वे स्वयं सकारात्मक वातावरण, अनुशासन, आदर्श आचरण और समय देने का प्रयास नहीं करेंगे, तो केवल पैसे के बल पर वह विकास संभव नहीं है जिसकी वे उम्मीद करते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावक स्वयं आत्ममंथन करें—

क्या वे केवल अपेक्षाएँ कर रहे हैं, या उन अपेक्षाओं के अनुरूप अपने दायित्व भी निभा रहे हैं?

क्या वे बच्चों की असफलताओं को समझने की कोशिश करते हैं, या सिर्फ आरोप लगाने में जल्दी करते हैं?

क्या वे बच्चों को प्रेरणा देते हैं, या दबाव डालते हैं?


यही सवाल अभिभावकों को समझना होगा, तभी बच्चों का वास्तविक और संतुलित विकास संभव है।

Comments

Post a Comment

Most Popular

Class 7 Chapter – 2 : India and Her Neighbours

कक्षा 10 पास करने के बाद कॉमर्स स्ट्रीम, छात्रों के लिए एक बेहतरीन विकल्प

PRE BOARD-II 2025-26 QUESTION PAPER LINK CLASSES X AND XII

Chapter - 3 The Dynamic Atmosphere and Changing Climate (Class- 9) (GOYAL PRAKASHAN)

Class - 9 Social Science Part - 2 Goyal Prakashan