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"एक समाज, अनेक बँटवारे"

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  "एक समाज, अनेक बँटवारे" साधारण से दिखने वाले  समाज को चंद लोगों ने बांट दिया,अलग धड़ों मे सर्वप्रथम बंटवारा था  स्त्री और पुरुष का, और इस समूह मे,  स्त्री को रखा था  कमजोर वर्ग मे, और  पुरुष था डोमिनेंट,  स्त्री पर इसके पश्चात,  समाज का बंटवारा हुआ,  अमीर और गरीब के मध्य गरीबों को वंचित रखा गया उनके अधिकारों से,  फिर वर्ण के नाम पर  हुआ बंटवारा,  इस बंटवारे मे भी था  एक और बंटवारा  जातियों का पुनः, समाज के नव निर्माण मे योगदान दिया, चंद विद्वानों ने,  जिन्होंने बनाये कुछ नियम और  नियमों को दिया नाम मज़हब का. इस तरह, साधारण से समाज को बना दिया गया  और जटिल जहाँ हर एक बंटवारे ने  खड़ी की समस्या,  जहाँ समाधान था, युद्ध  दो अलग समूह के मध्य,  जीता वही जिसके पास था, बल और हारने वाली श्रेणि को हमेशा रखा गया वंचित, उनके अधिकारों से https://link.amazon/B06xE1J6i   HP 14 Smartchoice, Intel Core Ultra 5 125H 12 TOPS, 24GB DDR5 (Upgradeable) 1TB SSD, Anti-Glare, FHD, 14''/35.6cm,Win11, M...

इस धरा मे, सफर कितना शेष है, कोई नहीं बतायेगा

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 इस धरा मे, सफर कितना शेष है,  कोई नहीं बतायेगा अमर रहा है क्या, कोई?  जो तू रह जायेगा एक दिन ये पार्थिव शरीर इस मिट्टी के  रंग मे मिल जायेगा एक दिन राख बन  चंद मुट्ठी मे समा जायेगा फिर किस से  अपना दर्द कहेगा जब प्रवाह जल मे  किया जायेगा तेरा कर्म भी  तेरे साथ चलेगा अगर तू याद भी आयेगा,  तो चंद कर्मो से जाना जायेगा तेरा कर्म ही,  तेरी पहचान बताएगा कौन रखेगा तुझे याद,  ये तो वक़्त ही बताएगा

नदियों का मौन

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 नदियाँ सूख जाने के पश्चात,  बदल जाती है, मरुस्थल मे उसकी नियति मे  नहीं लिखा था,  मरुस्थल हो जाना,  बल्कि मानवीय गतिविधियों और संवेदनाओं ने  बदल दिया,  नदियों के शोर को,  मौन मे,  कुछ इस तरह  नदियों के  मौन ने बना दिया  उसे, मरुस्थल. यह फ़क़त  अंत नहीं था,  नदियों का. ये तो अंत था,  नदियों पर निर्भर  उन सभी प्रजातियों का,  जिस पर टिकी थी  संपूर्ण मानव सभ्यता.

लुप्त होती सभ्यताएं

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 युद्ध सामाप्त होनेे तक, मिट जाएगी सभ्यताएं और तब्दील हो जाएगी मलबे में कई विरासते , धरोहर के रूप मे शेष रहेगी सुलगती हुई लकड़ियां और राख प्रश्नो की फेहरिस्त मे सबसे पहले होगा, प्रश्न हमारे अस्तित्व का. हमारे पूर्वज कौन थे?  उनका अंत होने का कारण इमारते, इत्यादि संग्रहालय मे रखे मलबे और अस्थियाँ मे खोजेंगे क्यों, क्या, कैसे प्रश्नों के हल कल्पना के सफ़र मे, क्या वो खोज पाएगी, सभ्यता के लुप्त होने, नदियों के सूख जाने की वज़ह, आरम्भ से अंत होने तक की कहानियाँ

माँ

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 माँ कोई एक दिन खास नहीं,  हर दिन तुम्हारा है इस सृष्टि का तुम से ही तो गुज़ारा है कुछ एक लोगों ने तुम्हें एक दिन मे बांध दिया चस्पा करके  फोटो माँ की, बाकी दिन ममता को त्याग दिया शुरुआत तुमसे ही थी,  धरा को तुमने बनाया था जीवन कहाँ था तुम बिन, तुम थी, तभी तो जीवन पनप पाया था अंधकारमय पथ पर  दीपक तुमने जलाया था दुःख सहे जहाँ के तुमने सारे तब सुख हमने पाया था (24*7)दिन रात बिना थके काम करने का ज़ज्बा तुम्हारे पास कहाँ से आया था ज़िंदगी का पहला अक्षर "माँ " तुमने ही सिखाया था समस्त संसार मेरा सिर्फ माँ तुममे ही समाया था.

अरावली : एक विकसित भूल

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 अरावली : एक विकसित भूल जैसे धीरे-धीरे लुप्त हो गईं कई ऐतिहासिक धरोहरें, उसी तरह एक दिन खो जाएगी अरावली भी। पर्यावरण के विद्वानों ने प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ सिद्ध कर दिया— वर्षों से स्थिर खड़ी प्राणदायिनी अरावली अब विकसित भारत के लिए औषधि नहीं, बल्कि समस्या है। कौन कहता है ईश्वर गलती नहीं करते? शायद अरावली के निर्माण के समय ईश्वर से भी कुछ भूल हो गई— सीमाएँ तय करने में अरावली की। विकसित भारत की परिभाषा देने वाले चंद विद्वानों ने तथ्यों के साथ यह सिद्ध कर दिया कि ईश्वर भी गलती करते हैं। काली बाज़ारी, खनन की चोरी, पेड़ों की अंधी कटाई, निर्दोष जीवों को बेघर करना— यही हैं आज विकास के प्रमाण। और अरावली— बस एक बाधा, जिसे मिटा देना है तरक़्क़ी की राह से भूपेंद्र रावत

समानता के नाम पर

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 समानता के नाम पर  निर्धारित की गई सीमाएँ—  पुरुषों को मिला  अनंत आकाश,  और स्त्री के हिस्से आया  वही आकाश का शेष टुकड़ा,  जिसे भी  पुरुषों ने नकार दिया।   खोखली मर्यादाओं ने। समानता के नाम पर ही  स्त्रियों के कंधों पर  थोप दी ज़िम्मेदारियाँ—  परिवार की, समाज की,  और इसे कहा गया कर्तव्यों का पालन। आदर्शवादी समाज में  आदर्श स्त्री को मिली परिभाषा—  वही जो न लड़ी  अपने अधिकारों के लिए,  जो अपनी आवाज़ को  विरोध की गूँज में  बदल न सकी,  बस उम्रभर  सिसकियों को ओढ़ती रही। समानता दिखने के बावजूद  वह झेलती रही अवहेलना—  कभी परिवार से,  कभी समाज से। और आज भी  पुरुष-प्रधान दुनिया में  आज़ाद कहलाकर भी  कैद है वह  विचारों की बेड़ियों में। भूपेंद्र रावत

परंपराओं की बेड़ियों में बँधी आज़ादी

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सामाजिक और सांस्कृतिक  परंपराओं की बेड़ियों मे बांधकर  महिलाओं को दी गयी आजादी,  और निर्धारित की गयी  उनकी सीमाएं।  पंख कुतर कर उन्हे  किया गया कमजोर और  रखा गया वंचित  उन्हें शिक्षा और समानता के  उन सभी अधिकारों से जो  दिये गए पुरुषों को जन्म से।  घर की चार दीवारी मे  सिमटी महिलाओं को  कहा गया संस्कारी।  और बैठाया गया डर  रूढ़िवादी सोच का कि  पढ़ने से हो जाती हैं महिलाएं, विधवा। भूपेंद्र रावत 

वक़्त ने कभी नहीं ओढ़े मुखोटे

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 सुना है, अक्सर लोगों से, कि समय बदल गया है, लेकिन उन्हें कौन समझाए कि वक़्त तो जैसा था, आज भी वैसा ही है बदल गया है चेहरा, नियत, और इरादा इंसानो का वक़्त ने कभी नहीं बदला अपना मार्ग तनिक सा भी बल्कि इंसानो ने बदल लिया स्वयं को अपनी जरूरतों के अनुसार, और दोषी ठहरा दिया, वक़्त को वक़्त ने कभी नहीं ओढ़े मुखोटे,  बल्कि वक़्त ने पढ़ाया पाठ और मार्ग से भूले - बिसरे लोगों को दिखाया आईना। भूपेंद्र रावत

मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ

 मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ मैं अब खुद से ही अनजान हो गया हूँ, मानो अपने ही घर में मेहमान हो गया हूँ। भाग-दौड़ की इस ज़िंदगी में दफ़न कर दीं मैंने, अपनी सारी इच्छाएँ, चलता हूँ मैं, पर भीतर से — मानो चलता-फिरता श्मशान हो गया हूँ। क्या, किसने सुनी कभी मेरी बातें यहाँ? हर जवाब में बस सन्नाटा ही पाया मैंने। मैं इस सफ़र का मुसाफ़िर अब बेजान हो गया हूँ, लोगों की सुनते-सुनते खुद अपनी आवाज़ से अनजान हो गया हूँ। टूट कर गिरा हूँ जब से इस धरा पर, तब से आसमां के लिए मेहमान हो गया हूँ। जिसने भी देखा, मुँह फेर लिया — जबसे मैं ज़रूरतमंद इंसान हो गया हूँ।

मैं लिखूँगा तुम्हें

 मैं लिखूँगा तुम्हें मैं गढ़ूँगा क़सीदे तुम्हारे — तुम्हारे इतराने पर, तुम्हारे रूठ कर चले जाने पर, तुम्हारी मुस्कान में छुपी उजली धूप पर, और तुम्हारे खुशी से गले लग जाने पर। मैं लिखूँगा तुम्हें — उस चाँदनी रात में, जब तुम्हारी घनी ज़ुल्फ़ों में एक मुसाफ़िर की सरसराहट धीरे-धीरे खो जाती है। मैं लिखूँगा तुम्हारे जज़्बातों पर, हम दोनों के हालातों पर, उन लम्हों पर भी जो अनकहे रह जाते हैं। मैं लिखूँगा हर सूक्ष्म बात, हर नन्ही-सी अनुभूति — जब तक कि स्वयं का अस्तित्व नगण्य न हो जाए।

शिक्षक दिवस

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शिक्षक बिन जीवन नहीं  शिक्षक बिन नहीं ज्ञान  शिक्षक बिन अधूरा है हम सब का सम्मान  शिक्षक ने ही तो बढ़ाया है  देश का मान  शिक्षक ही तो है, हम सब की पहचान मामूली से पाषाण को  स्वर्ण बना दिया  निर्थक से जीवन को  तुमने अर्थ है दिया तिमिर से हरकर  राह से हमारी, हमारे जीवन मे तुमने प्रकाश भर दिया।    गलतियों को हमारी स्वीकार किया, जीवन हमारा संवार दिया। ज्ञान का दीप जलाकर तुमने, जीवन को हमारे सार दिया। पथ के काँटों को तुमने क्षण भर में उखाड़ दिया, हर अंधियारे को तुमने उजाले से निखार दिया। विषम परिस्थितियों से लड़ना सिखाया तुमने   जीवन के हर पथ पर डटकर जीना  बताया तुमने । काँटों की बगिया में सदा मुस्कान सजाई तुमने, सपनों की डगर पर राह दिखाई तुमने। सफलता की सीढ़ी को चंद कदमों मे बदलकर  असंभव सी दूरी सरल बनाई तुमने।  आधार हमारा बनाया तुमने  राह पर चलना सिखाया तुमने डगमगाते हुए कदमों को  पथ मे संभलना सिखाया तुमने।   ओ गुरुदेव! तुम हमारे पथ-प्रदर्शक, तुमसे ही जीवन बना उज्ज्वल और दर्पक। तुम्हारे ऋण से ह...

जीत गए नेता जी चुनाव में

  जीत गए नेता जी चुनाव में जीत गए नेता जी चुनाव में, ढोल-नगाड़ों की थाप में, नारे गूंजे, झंडे लहराए, उम्मीदों के दीप जलाए। बदलते आंकड़ों के संग बदलते चेहरों की मुस्कान, जनता सुनती रही हर बार, मंचो से वादों की बौछार। और अंत में... शेष रह गए झूठे वादे, और खोखली बाते मतदाताओं की, टूटती उम्मीदें सड़कें वहीं, गड्ढे वहीं, बस चुनावों में भर दिए गए काग़ज़ी गड्डे।

स्त्री का घर

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 स्त्री का घर ईंट–ईंट जोड़कर उसने, आंसुओं से गारा बनाया, रक्त और पसीने से गढ़ी दीवारें, फिर भी मेहनताना मिला— कौड़े, ताने और तिरस्कार। तन की थकान, मन की पीड़ा, के साथ दर्द से गूंजता, हर स्वर फिर भी त्यागा नहीं उसने अपना घर, क्योंकि उस घर की सांसों में बसा था, उसका अस्तित्व । पुरुष हमेशा की तरह रहे केंद्र में, स्त्री को ठुकराते, दबाते, प्रगतिशीलता के नकाब तले बरसाते रहे उपेक्षा की चोट। समानता के नारे, संसद और चैनलों में गूंजे, पर जमीनी धरातल पर स्त्री धकेली जाती रही गर्त में, बनाई जाती रही वस्तु, सिर्फ उपभोग की । हक़ीक़त में बदलाव था  कल्पनाओं से परे, जैसे होती है कहानी परियों की टूटते तारों की।    इन्सानो की बस्ती मे  बदलाव का झूठा सपना लिए स्त्री हर बार,होती रही शिकार,  वासना का, कभी घरों मे तो कभी समाज मे    छलनी होते समाज मे  बिखरती गयी उम्मीदें  और शेष रहा, दिलासा। जख्म से सने जिस्म,  दबी और कुचली  हुई आवाज़ के साथ  फिर भी उठती,  रही स्त्री हर बार  अपने आँचल में नए सूरज की रोशनी लिए। इतिहास गवाह है कि  घर क...

अब प्यार नहीं जताता कोई अब गले नहीं लगाता कोई

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 अब प्यार नहीं जताता कोई अब गले नहीं लगाता कोई आ गए है उम्र के उस पड़ाव पर अब अपना नहीं बनाता कोई ये कैसी कश्मकश है मन के अंदर अब ज़िया नहीं जलाता कोई प्यार तो अब भी है दरमियाँ अब वैसे नहीं जताता कोई इस क़दर उलझ गए है जीवन के चक्रव्यूह में महफिल मे भी तन्हा रह जाता है कोई

नजाने किस पथ पर, चला जा रहा हूँ

 नजाने किस पथ पर, चला जा रहा हूँ शायद कदमों को अपने, छला जा रहा हूँ ना मंज़िल है अपनी, ना कोई ठिकाना दाएं - बाएँ करता है, मुझे सारा ज़माना रुक कर पथ पर, मैं बाट खोजता हूँ आगे चलता हूँ तो, मैं फिर सोचता हूँ चारों ओर देख कर, खुद को खरोंचता हूँ सोचता हूँ, मंज़िल कहाँ है अपनी चल चल कर क़दम भी अब हो गए जख्मी नाजाने जीवन मे कैसा भ्रम है पाला भ्रमित है जीवन, मृगतृष्णा का जाला

ज़िंदगी मे एक दोस्त तो, ऐसा भी होना चाहिए

ज़िंदगी मे एक दोस्त तो, ऐसा भी होना चाहिए जिसके पास हर दर्द के लिए एक मरहम होना चाहिए कर सको अपने मन की बात जिससे  तुम काँधे मे सिर रख, उसके रो सको तुम दूर हो, फिर भी दूरी का एहसास न हो मौन हो अधर, लेकिन प्यासे जज़्बात न हो अंदर की व्यथा को वो जान ले  हंसी के पीछे छिपे आँसुओ को पहचान ले, रूह की माफिक साथ खड़ा नज़र वो आए  वक़्त की आंधियों में वो साथ निभाए, भूपेंद्र रावत 

कदमो की मदद से लांघा है, पहाड़ों की सबसे

मैंने देखा है, पहाड़ों को और अपने अदने से  कदमो की मदद से  लांघा है, पहाड़ों की सबसे  ऊंची चोटियों को धरातल से जुड़े हुए, घाटी बनाते, तथा ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी, नहीं तोड़ पाये  कभी जज़्बा मेरा लेकिन, पहाड़ की सबसे ऊंची  चोंटीयां भी नहीं छू पाई कभी आसमां  को , बल्कि, उन्हें भी छिपना पड़ा बादलों की ओंट मे गुजरते वक़्त के साथ  कमजोर होते पहाड़ झुके, और भूस्खलन के रूप मे आखिर मिल गए धरातल मे          

"पलायन"

पहाड़  हो गए खोखले,   उनमे शेष रह गया एक जोड़ा,  जो  ब्याह के लाया गया था, वर्षों पूर्व  उन्होने सँजोये थे सपने  पहाड़ को सुंदर बनाने के  उन्होंने रचाए थे रंग पहाड़ की मिट्टी में, सजाया था हर पत्थर अपनी उम्मीदों की बुनियाद से। लेकिन वो अनभिज्ञ थे  भविष्य के सत्य से,  जहाँ सपनों की जड़ें सूख जाती हैं  बेरहम समय के सामने। शहरों ने छीन लिए उनके आंगन के गीत, काम, शिक्षा, और इलाज के बहाने पलायन कर गए उनके बीज। उनके टूटते सपने बिखर कर  पलायन करते रह शहरों की ओर  काम, शिक्षा और चिकित्सा की तलाश मे,  खेत हुए बंजर, पानी ने छोड़ा साथ, खेत मे शेष रह गयी  दो सूखी टहनियाँ  उन बुजुर्ग जोड़े की तरह  जो अब भी देखता है  पहाड़ों की ओर एक नई सुबह की आस में। भूपेंद्र रावत 

पिता — जीवन का आधार

अंगुली पकड़कर पिता ने  चलना सिखाया, हर ठोकर पर आगे बढ़ना सिखाया। कंधों पे बिठा कर दुनिया को दिखाया, हर डर को हंसी के साथ हरना सिखाया। धूप में छाँव बने वो दरख़्त जैसे, खुद दीपक जैसे जलकर,  हमारे जीवन को जगमगाया ।  हर ज़िम्मेदारी को उन्होने हँसकर है निभाया, हमारी खातिर उन्होने  अपने सपनों को भी भुलाया। बचपन की किलकारियों में जिनकी हँसी थी, हर जीत में जिनकी आँखों में नमी थी। खामोश रहकर भी बहुत कुछ कह जाते थे, पिता... शब्दों से नहीं, अपने कर्मों से निभाते थे। न वो कभी स्नेह जताते, न वो शिकायत करते थे, लेकिन हर मोड़ पर हम में संबल भरते थे। उनके कदमों के निशान ने ही तो हमें,  हर मुश्किल से उबरना सिखाया। जीवन की डगर में उन्होने हमें चलना सिखाया।  पिता फ़क़त एक शब्द नहीं,  जीवन का सार है।  पिता हमारे जीवन का आधार है  पिता में ही तो समाया समस्त संसार है।