स्वच्छता और नागरिक जिम्मेदारी
वैदिक काल से वर्तमान भारत तक
आदरणीय प्रधानाचार्य महोदय/महोदया, सम्मानित शिक्षकगण और मेरे प्रिय साथियों,
आप सभी को मेरा सादर नमस्कार।
आज मैं आप सभी के सामने एक ऐसे विषय पर अपने विचार रखना चाहता हूँ, जो हमारे जीवन, हमारे स्वास्थ्य और हमारे समाज—तीनों से जुड़ा है—“स्वच्छता और नागरिक जिम्मेदारी : वैदिक काल से वर्तमान तक।”
भारत में स्वच्छता की परंपरा कोई नई अवधारणा नहीं है। हमारे प्राचीन चिंतन में शौच, अर्थात् शारीरिक, मानसिक और आसपास के वातावरण की शुद्धता को जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों में माना गया है। योग परंपरा में भी शौच को आंतरिक अनुशासन का हिस्सा माना गया है।
हमारी परंपरा में एक सुंदर विचार मिलता है—
“शौचम्” — अर्थात् बाहरी और आंतरिक पवित्रता।
इसका अर्थ केवल साफ कपड़े पहनना या घर की सफाई करना नहीं है। इसका व्यापक अर्थ है—स्वच्छ शरीर, स्वच्छ मन, स्वच्छ विचार और स्वच्छ वातावरण।
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं—
“अभयं सत्त्वसंशुद्धिः
ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च
स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥”
अर्थात् निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धता, आत्मसंयम, अध्ययन और सरलता जैसे गुण मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाते हैं। यहाँ “सत्त्वसंशुद्धि” को मन की शुद्धता के रूप में समझाया गया है।
इससे हमें एक महत्वपूर्ण संदेश मिलता है—
सच्ची स्वच्छता केवल हमारे आसपास नहीं, हमारे भीतर भी होनी चाहिए।
यदि हमारा घर साफ है लेकिन हम सड़क पर कूड़ा फेंकते हैं, तो हमारी स्वच्छता अधूरी है।
यदि हमारा शरीर स्वच्छ है लेकिन हमारे विचार दूसरों के प्रति नकारात्मक हैं, तो हमारी आंतरिक स्वच्छता अधूरी है।
भारतीय चिंतन में स्वच्छता का संबंध अनुशासन और कर्तव्य से भी जोड़ा गया है। प्राचीन ग्रंथों में शौच को अन्य नैतिक गुणों के साथ रखा गया है।
बाद के समय में महात्मा गांधी ने भी स्वच्छता को व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक जीवन दोनों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। उनके विचारों में स्वच्छता केवल सफाईकर्मियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी थी।
आज जब हम आधुनिक भारत की बात करते हैं, तो स्वच्छता का अर्थ और भी व्यापक हो गया है।
स्वच्छता का मतलब है—
कूड़ा निर्धारित स्थान पर डालना,
प्लास्टिक का कम उपयोग करना,
जलस्रोतों को प्रदूषित न करना,
सार्वजनिक स्थानों को साफ रखना,
और दूसरों को भी स्वच्छता के लिए प्रेरित करना।
यही है नागरिक जिम्मेदारी।
हम अक्सर सोचते हैं कि देश को स्वच्छ बनाना सरकार या नगर निकाय की जिम्मेदारी है। निश्चित रूप से प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका भी उतनी ही आवश्यक है।
हम विद्यार्थी भी बहुत कुछ कर सकते हैं।
हम अपनी कक्षा को साफ रख सकते हैं।
कूड़ा डस्टबिन में डाल सकते हैं।
पानी और बिजली की बर्बादी रोक सकते हैं।
प्लास्टिक के अनावश्यक उपयोग से बच सकते हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—स्वच्छता को केवल अभियान नहीं, अपनी आदत बना सकते हैं।
क्योंकि—
**“स्वच्छ भारत केवल साफ सड़कों से नहीं,
स्वच्छ सोच वाले नागरिकों से बनेगा।”**
आइए, आज हम संकल्प लें कि हम केवल अपने घर को ही नहीं, बल्कि अपनी कक्षा, अपने विद्यालय, अपने मोहल्ले और अपने शहर को भी अपना समझेंगे।
हम दूसरों से स्वच्छ रहने की अपेक्षा करने से पहले स्वयं स्वच्छता का उदाहरण बनेंगे।
अंत में मैं केवल इतना कहना चाहूँगा—
“स्वच्छता बाहर की सुंदरता है,
और जिम्मेदारी भीतर की जागरूकता।”
जब स्वच्छता हमारी आदत और जिम्मेदारी हमारा संस्कार बन जाएगी, तभी हमारा भारत वास्तव में स्वस्थ, सुंदर और सशक्त बनेगा।
धन्यवाद।
जय हिंद!
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